वर्दी उतरी, जज्बा नहीं, रिटायर्ड सूबेदार ने बचाईं 7 जिंदगियां:आधी रात घर बना आग का गोला, चीखते रहे बच्चे-महिलाएं, रिटायर्ड सूबेदार ने संभाला मोर्चा
एक सैनिक की वर्दी उतर सकती है लेकिन उसका जोश और जज्बा कभी रिटायर नहीं होता। टीपीनगर के शिवकुंज कॉलोनी में 5/6 अक्टूबर की आधी रात इसका ऐसा उदाहरण सामने आया, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। घर में आग लगा दी गई थी। अंदर दो परिवारों के सात लोग धुएं और लपटों के बीच जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे। बच्चे और महिलाएं चीख रहे थे। बाहर खड़े लोग चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे। तभी रिटायर्ड सूबेदार नवनीत दुहन ने मोर्चा संभाला। तीन तस्वीरें देखें… उन्होंने कॉटन की चादर में खुद को लपेटा और आग के बीच कूद गए। आग की लपटों के बीच रास्ता बनाते हुए पहले प्रथम तल पर फंसे परिवार तक पहुंचे। हाथ झुलसने के बावजूद पीछे नहीं हटे। घर के भीतर बने जाल का सहारा लिया और एक-एक कर परिवार के सदस्यों को निकालते चले गए। छत पर पहुंचकर पड़ोसी की सीढ़ी लगाई और सभी सात लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। पूरा रेस्क्यू ऑपरेशन महज सात-आठ मिनट में पूरा हुआ। मौत सामने थी लेकिन सूबेदार नहीं डिगे
आग लगने के बाद घर में तेजी से धुआं भर गया था। दम घुटने लगा तो परिवारों की नींद खुली। शोर मचाया गया फिर भी तत्काल मदद नहीं पहुंच सकी। किराएदार अश्विनी ने सबसे पहले अपने बुजुर्ग पिता सुरेंद्र सिंह को बचाया। पिता को लेकर वह बाहर खड़ी गाड़ी की छत पर कूद गए। इस दौरान उनके दोनों पैर फ्रैक्चर हो गए। इसके बाद अश्विनी दोबारा घर के अंदर पहुंचे लेकिन पत्नी और दो बच्चों के साथ खुद भी फंस गए। दूसरी मंजिल पर मकान मालिक नवनीत दुहन और उनकी पत्नी ममता भी आग और धुएं के बीच घिर चुके थे। एक तरफ आग थी और बीच में सात जिंदगियां
सामने साक्षात मौत से सामना हो रहा था। तभी नवनीत ने अपने सैन्य प्रशिक्षण को याद किया। उन्होंने कॉटन की चादर ढूंढकर उससे खुद को ढका और आग के बीच अंदर दाखिल हो गए। धुआं इतना घना था कि सांस लेना मुश्किल था लेकिन नवनीत एक बार अंदर जाने के बाद पीछे नहीं हटे। जाल बना जिंदगी की सीढ़ी, एक-एक कर सभी को निकाला
नवनीत ने सबसे पहले प्रथम तल पर फंसे अश्विनी के परिवार तक पहुंच बनाई। घर के भीतर बने जाल की मदद से उन्हें पहले प्रथम तल और फिर दूसरी तल तक पहुंचाया। बच्चे और महिलाएं लगातार चीख रहे थे। नवनीत ने उन्हें संभाला और सुरक्षित छत तक पहुंचाया। छत पर पहुंचने के बाद पड़ोसी की छत तक सीढ़ी लगाई गई। इसके बाद सभी सात लोगों को एक-एक कर सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। बाहर खड़े लोगों ने जब सातों को जिंदा बाहर आते देखा तो राहत की सांस ली। लोगों का कहना है कि अगर कुछ मिनट की भी और देरी होती तो हालात बेहद भयावह हो सकते थे। नवनीत बोले- अंतिम सांस तक लड़ता है सैनिक
आग की इस घटना के बाद नवनीत ने अपने सैन्य जीवन की कठिन परिस्थितियों को याद किया। दैनिक भास्कर डिजीटल से बातचीत में उन्होंने 15-16 जून 2020 की उस रात का भी जिक्र किया, जब पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। नवनीत उस घटना के प्रत्यक्ष गवाह रहे हैं। उनका कहना है कि सैनिक आखिरी सांस तक लड़ता है। सेना से रिटायर होने के बाद भी मुश्किल वक्त में यही जज्बा उनके भीतर कायम रहा। शिवकुंज की आग में जब सात जिंदगियां खतरे में थीं तो उन्होंने भी वही किया जो एक सैनिक करता है। खतरे को देखा लेकिन उससे पीछे नहीं हटे। राख और धुएं से भर गया नवनीत का घर
नवनीत ने ड्यूटी के दौरान मेहनत से यह घर तैयार किया था। सपना था कि सेवानिवृत्ति के बाद इसी घर में परिवार के साथ सुख-शांति से जिंदगी बिताएंगे। मगर आग ने उस सपने को बड़ा झटका दे दिया। पूरा घर धुएं से काला हो गया। कीमती सामान जल गया। नीचे खड़े दो दोपहिया वाहन आग में स्वाहा हो गए। प्रथम और द्वितीय तल की गैलरी में रखा सामान भी जलकर खाक हो गया। अब घर को दोबारा रहने लायक बनाने के लिए उन्हें फिर मेहनत करनी होगी। आग ने घर झुलसाया, सैनिक का जज्बा और चमका
शिवकुंज की इस घटना में आग ने एक घर को नुकसान पहुंचाया। सामान जला दिया और नवनीत के उस सपने को झटका दिया जिसे उन्होंने वर्षों की मेहनत से बनाया था। लेकिन उसी आग के बीच एक रिटायर्ड सैनिक ने यह साबित कर दिया कि सेना से सेवानिवृत्ति सिर्फ नौकरी से होती है, साहस से नहीं। नवनीत दुहन ने उस रात सात लोगों को सिर्फ आग से नहीं बचाया, उन्होंने अपने सैन्य संस्कारों की ताकत भी दिखा दी।
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