तेल-गैस संकट से बढ़ी दुनिया की बेचैनी, होर्मुज मार्ग पर बड़ा दांव खेलने जा रहा भारत
ईरान युद्ध के बाद पैदा हुए तेल और गैस संकट के बीच भारत अब होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते दोबारा तेल टैंकर भेजने की तैयारी कर रहा है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और महंगे वैकल्पिक मार्गों ने भारत की चिंता बढ़ा दी है।
द राइजिंग न्यूज | विश्व , 20 मई 2026
भारत के सामने क्यों खड़ा हुआ बड़ा संकट
मध्य पूर्व में जारी तनाव और ईरान युद्ध के बाद पूरी दुनिया एक बड़े ऊर्जा संकट की आशंका से घिर गई है। तेल और गैस की सप्लाई पर मंडरा रहे खतरे ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बड़ा और रणनीतिक कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। खबरों के मुताबिक, भारत अब एक बार फिर होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल टैंकर भेजने की योजना पर काम कर रहा है। यह फैसला ऐसे समय में लिया जा रहा है जब खाड़ी क्षेत्र में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और दुनिया के कई देश वैकल्पिक समुद्री मार्ग तलाशने में जुटे हैं।
महंगे विकल्पों ने बढ़ाई मुश्किल
होर्मुज जलडमरूमध्य को दुनिया का सबसे अहम तेल व्यापारिक मार्ग माना जाता है। वैश्विक स्तर पर सप्लाई होने वाले कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। भारत सहित एशिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था काफी हद तक इसी मार्ग पर निर्भर करती है। लेकिन ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते टकराव ने इस रास्ते को बेहद संवेदनशील बना दिया है। युद्ध जैसी परिस्थितियों और सुरक्षा खतरों के कारण कई तेल कंपनियों और शिपिंग एजेंसियों ने यहां से अपने जहाजों की आवाजाही कम कर दी थी। इसका असर सीधे तेल की कीमतों और वैश्विक बाजार पर देखने को मिला।
खाड़ी देशों से लगातार संपर्क में भारत
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, जिसमें खाड़ी देशों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। ऐसे में अगर होर्मुज मार्ग बंद होता है या यहां खतरा बढ़ता है, तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है। यही वजह है कि केंद्र सरकार, तेल कंपनियां और सुरक्षा एजेंसियां लगातार हालात पर नजर बनाए हुए हैं। माना जा रहा है कि भारत ने जोखिमों का आकलन करने के बाद दोबारा इसी मार्ग का इस्तेमाल शुरू करने का फैसला लिया है ताकि तेल सप्लाई सामान्य बनी रहे और देश में ईंधन संकट जैसी स्थिति पैदा न हो।
दुनिया की नजर भारत के फैसले पर
ईरान युद्ध के बाद कुछ समय के लिए भारत ने वैकल्पिक समुद्री मार्गों पर भी विचार किया था। हालांकि ये रास्ते काफी लंबे और महंगे साबित हुए। लंबे समुद्री सफर के कारण तेल पहुंचने में ज्यादा समय लग रहा था और परिवहन लागत भी तेजी से बढ़ रही थी। इसका असर सीधे आयात बिल पर पड़ रहा था। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत लंबे समय तक वैकल्पिक मार्गों पर निर्भर रहता, तो पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल सकता था। यही वजह है कि अब भारत संतुलित रणनीति अपनाते हुए दोबारा होर्मुज मार्ग पर भरोसा जता रहा है।
भारत इस पूरे मामले में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों के साथ लगातार संपर्क में है। समुद्री सुरक्षा को लेकर भी कई स्तरों पर चर्चा चल रही है। भारतीय एजेंसियां इस बात को सुनिश्चित करने में जुटी हैं कि तेल टैंकरों की आवाजाही सुरक्षित तरीके से जारी रह सके। साथ ही सरकार रणनीतिक तेल भंडारण को मजबूत करने की दिशा में भी तेजी से काम कर रही है ताकि किसी आपात स्थिति में देश के भीतर तेल और गैस की कमी न हो। भारत का यह कदम केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक बाजार पर भी पड़ सकता है। अगर भारत सफलतापूर्वक होर्मुज मार्ग के जरिए तेल आयात जारी रखता है तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थिरता का संदेश जाएगा। वहीं दूसरी ओर, अगर खाड़ी क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतों में फिर बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है। पूरी दुनिया की नजर भारत के इस फैसले और मध्य पूर्व के बदलते हालात पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक व्यापार के लिए राहत का रास्ता बनेगा या फिर दुनिया को एक और बड़े ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ेगा।