2022 से 2026 तक 111 नेताओं ने बदली पार्टी, नगालैंड सबसे आगे!

2022 से 2026 के बीच 111 सांसदों और विधायकों ने अपना राजनीतिक दल बदला। इनमें 78 विधायक, 26 लोकसभा सदस्य और 7 राज्यसभा सदस्य शामिल हैं। नगालैंड में सबसे ज्यादा 32 दल-बदल के मामले सामने आए, जबकि पश्चिम बंगाल 20 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर रहा।

Sep 25, 2026 - 16:34
0
2022 से 2026 तक 111 नेताओं ने बदली पार्टी, नगालैंड सबसे आगे!

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 25 सितंबर 2026

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच के विश्लेषण के अनुसार, 2022 से 2026 के बीच चुनाव जीतने के बाद 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने अपना राजनीतिक दल बदला। इनमें 78 विधायक, 26 लोकसभा सदस्य और 7 राज्यसभा सदस्य शामिल हैं। नगालैंड में 32 मामले सामने आए, जबकि पश्चिम बंगाल 20 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर रहा।

2022 से 2026 के बीच 111 जनप्रतिनिधियों ने बदला दल

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 से 2026 के बीच चुनाव जीतने के बाद कुल 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने अपना राजनीतिक दल बदल लिया। यह विश्लेषण लोकसभा, राज्यसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों तथा संबंधित उपचुनावों के आंकड़ों पर आधारित है। इन 111 जनप्रतिनिधियों में 78 विधानसभा सदस्य, 26 लोकसभा सदस्य और 7 राज्यसभा सदस्य शामिल हैं। रिपोर्ट में विधानसभा के 78 मामलों में 70 ऐसे जनप्रतिनिधियों का उल्लेख है जिन्होंने चुनाव जीतने के बाद दल बदला, जबकि 8 मामलों में इस्तीफे या अयोग्यता के बाद उपचुनाव जीतने के बाद दल परिवर्तन हुआ।

नगालैंड में सबसे ज्यादा दल-बदल

राज्यवार आंकड़ों में नगालैंड सबसे ऊपर रहा। यहां कुल 32 जनप्रतिनिधियों ने दल बदला, जो कुल मामलों का करीब 29 प्रतिशत है। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 20, तेलंगाना में 9, गोवा और पंजाब में 8-8 तथा महाराष्ट्र और मेघालय में 6-6 मामले सामने आए। इसके अलावा मणिपुर में 5, गुजरात में 4, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में 2-2 तथा कर्नाटक, मध्य प्रदेश, सिक्किम और उत्तर प्रदेश में एक-एक मामले दर्ज किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, दल-बदल के मामले कुल 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सामने आए।

किन राजनीतिक दलों से सबसे ज्यादा जनप्रतिनिधि अलग हुए

दल बदलने वाले जनप्रतिनिधियों में सबसे अधिक संख्या नागालैंड की नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी से अलग होने वालों की रही। रिपोर्ट के अनुसार, इस दल के 25 जनप्रतिनिधियों ने पार्टी छोड़ी। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के 20 और कांग्रेस के 19 जनप्रतिनिधियों ने दल बदला। इसके अलावा भारत राष्ट्र समिति के 9, आम आदमी पार्टी के 7, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के 7, शिवसेना के उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट के 6, जनता दल यूनाइटेड के 5 और नेशनल पीपुल्स पार्टी के 4 जनप्रतिनिधियों ने भी दल बदला। इन आंकड़ों के अनुसार, एनडीपीपी, तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस से अलग हुए जनप्रतिनिधियों की संख्या 64 रही, जो कुल मामलों का करीब 58 प्रतिशत है।

किन दलों में सबसे ज्यादा जनप्रतिनिधि शामिल हुए

रिपोर्ट में दल बदलने के बाद नए राजनीतिक दल में शामिल होने वाले जनप्रतिनिधियों का भी विवरण दिया गया है। इसके अनुसार, नागा पीपुल्स फ्रंट में 32 जनप्रतिनिधि शामिल हुए, जबकि भारतीय जनता पार्टी में 29 और नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में 20 जनप्रतिनिधि पहुंचे। इसके अलावा कांग्रेस में 9, शिवसेना में 8, नेशनल पीपुल्स पार्टी में 6 और पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में 4 जनप्रतिनिधियों के शामिल होने का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार, इन तीन प्रमुख दलों—नागा पीपुल्स फ्रंट, भारतीय जनता पार्टी और नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया—में कुल 81 जनप्रतिनिधि शामिल हुए, जो 111 मामलों का लगभग 73 प्रतिशत है।

पश्चिम बंगाल में भी बड़े पैमाने पर हुआ दल परिवर्तन

पश्चिम बंगाल 20 मामलों के साथ दल-बदल के आंकड़ों में दूसरे स्थान पर रहा। रिपोर्ट के अनुसार, यहां दल परिवर्तन करने वाले जनप्रतिनिधियों में तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सदस्य भी शामिल हैं। एडीआर के विश्लेषण के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सदस्यों ने 14 जून 2026 को नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया का रुख किया। इस विलय के अनुरोध पर लोकसभा अध्यक्ष की ओर से निर्णय लंबित होने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।

दल-बदल से राज्यों के राजनीतिक समीकरण पर असर

एडीआर के विश्लेषण में कहा गया है कि हाल के वर्षों में कुछ राज्यों में जनप्रतिनिधियों के दल बदलने से राजनीतिक समीकरणों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए। कुछ मामलों में विधायकों के दल बदलने को सरकारों के गिरने या नई सरकारों के गठन से भी जोड़ा गया है। हालांकि ऐसे घटनाक्रम का प्रभाव राज्य और मामले की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग रहा है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दल-बदल के मामलों में व्यक्तिगत रूप से पार्टी छोड़ना, राजनीतिक दलों का विलय, इस्तीफे के बाद उपचुनाव जीतना और अयोग्यता के बाद दोबारा निर्वाचित होना जैसी अलग-अलग परिस्थितियां शामिल हैं। इसलिए सभी मामलों को एक ही प्रकार के राजनीतिक बदलाव के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

दल-बदल विरोधी कानून पर फिर उठे सवाल

भारत में राजनीतिक दल बदलने से जुड़े मामलों पर संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी प्रावधान लागू होते हैं। एडीआर ने अपनी रिपोर्ट में इन प्रावधानों में बदलाव समेत कई चुनावी सुधारों की सिफारिश की है। इनमें दल बदलने वाले जनप्रतिनिधियों को दोबारा निर्वाचित होने तक सार्वजनिक पद संभालने से रोकने और अयोग्यता संबंधी फैसलों की प्रक्रिया में बदलाव जैसे सुझाव शामिल हैं। एडीआर ने यह भी सुझाव दिया है कि अयोग्यता संबंधी मामलों में निर्णय लेने की व्यवस्था में निर्वाचन आयोग की भूमिका बढ़ाई जाए। इसके अलावा राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार से जुड़े सार्वजनिक प्राधिकरणों के दायरे में लाने का सुझाव भी रिपोर्ट में दिया गया है।

मुख्य आंकड़े एक नजर में

  • कुल दल बदलने वाले जनप्रतिनिधि — 111
  • विधानसभा सदस्य — 78
  • लोकसभा सदस्य — 26
  • राज्यसभा सदस्य — 7
  • सबसे ज्यादा मामले — नगालैंड, 32
  • दूसरे स्थान पर — पश्चिम बंगाल, 20
  • सबसे ज्यादा जनप्रतिनिधि खोने वाला दल — एनडीपीपी, 25
  • सबसे ज्यादा नए जनप्रतिनिधि पाने वाला दल — नागा पीपुल्स फ्रंट, 32

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User