18वीं मंज़िल से गिरने वाले किशोर की बची जान:यशोदा मेडिसिटी में 2 महीने तक क्रिटिकल हालत में रहा भर्ती

Oct 15, 2026 - 15:04
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18वीं मंज़िल से गिरने वाले किशोर की बची जान:यशोदा मेडिसिटी में 2 महीने तक क्रिटिकल हालत में रहा भर्ती
गाजियाबा के वसुंधरा का रहने वाला 15 साल का एक लड़का 18वीं मंज़िल से गिरने के बाद ठीक हो गया। उसका इंदिरापुरम के यशोदा मेडिसिटी में लगभग 2 महीने तक इलाज चला। जब उसे हॉस्पिटल लाया गया था, तो वह हाइपोटेंसिव शॉक में था। उसका बहुत ज़्यादा खून बह चुका था और रीढ़ की हड्डी, छाती, फेफड़ों, लीवर, अन्य अंगों तथा सॉफ्ट टिश्यू में गंभीर चोटें आई थीं। रीढ की हड्डी तक टूट गई किशोर की हालत को स्थिर करने के लिए उसे तुरंत इंट्यूबेशन, वेंटिलेटर सपोर्ट, कई बार ब्लड और फ़्लूड ट्रांसफ़्यूज़न और इनोट्रोपिक दवाओं की ज़रूरत पड़ी। यशोदा मेडिसिटी के डॉक्टरों ने पाया कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूटी हुई थी और अपनी जगह से हट गई थी, साथ ही चोट, हीमोथोरैक्स और कई पसलियों में फ्रैक्चर, लीवर में चोट, दाहिने हाथ और बाएं पैर में फ्रैक्चर, सिर की त्वचा पर गहरा घाव, नाक की हड्डी टूटना और कूल्हे के हिस्से और दाहिनी जांघ पर त्वचा और ऊतकों का बड़े पैमाने पर उखड़ना जैसी समस्याएं थीं। जोखिम भरा रहा इलाज मरीज़ की हालत इतनी गंभीर थी कि एक साथ कई सर्जरी नहीं की जा सकती थीं। इसलिए इलाज करने वाली टीमों को यह तय करना पड़ा कि किस चोट का इलाज सबसे पहले ज़रूरी है। परिवार के साथ विस्तार से बातचीत करने और जोखिम भरे इलाज के लिए उनकी सहमति ली। यशोदा मेडिसिटी में न्यूरोसर्जरी के प्रिंसिपल डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. राजेंद्र कुमार ने मल्टी-डिसिप्लिनरी ट्रॉमा और सर्जिकल टीमों के साथ मिलकर पहली बड़ी प्रक्रिया के तौर पर स्पाइनल फिक्सेशन किया। बाद में जब हालत स्थिर हो गई, तो बाकी चोटों का इलाज अलग-अलग चरणों में किया गया। सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना था कि मरीज़ के गहरे शॉक में होने के बावजूद सबसे पहले किस चीज़ का इलाज किया जाए। रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर, डिसलोकेशन और कॉर्ड की चोट को देखते हुए मरीज़ की अस्थिर हालत के बावजूद रीढ़ की हड्डी को सुरक्षित रखने के लिए स्पाइनल फिक्सेशन यानी रीढ़ की हड्डी को स्थिर करना सबसे ज़रूरी इलाज था। चरण के हिसाब से हुआ इलाज एक बार जब रीढ़ की हड्डी स्थिर हो गई, तो हम बाकी चोटों का इलाज चरण-दर-चरण कर सके। टीम में मेडिसिन के डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. ब्रजेश कौशले शामिल थे। ICU टीम में यशोदा मेडिसिटी के पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. करण अहलूवालिया और पीडियाट्रिक इंटेंसिविस्ट कंसल्टेंट डॉ. अनुज ध्यानी शामिल थे। यशोदा मेडिसिटी में प्लास्टिक, एस्थेटिक और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी के प्रिंसिपल कंसल्टेंट डॉ. शोभित शर्मा ने कहा- सॉफ्ट टिश्यूज शरीर के मुलायम ऊतको में गंभीर चोटें होने के कारण यह मामला काफी चुनौतीपूर्ण था। नाक की हड्डी टूटने के साथ-साथ त्वचा छिलने से बड़े घाव भी हो गए थे। लगभग दो महीने तक अस्पताल में भर्ती रहने के बाद किशोर को छुट्टी दे दी गई है। अब उसे आगे भी नियमित फॉलो-अप और रिहैबिलिटेशन की आवश्यकता होगी। उम्मीद के बाद बची जान किशोर के ठीक होने का यह मामला गंभीर रूप से घायल मरीजों के इलाज में तेजी से उनकी हालत स्थिर करने, विशेषज्ञों की देखरेख और अलग अलग विभागों के बीच बेहतर तालमेल के महत्व को दर्शाता है। यशोदा मेडिसिटी में मरीज की बदलती स्थिति के अनुसार इलाज की योजना सावधानीपूर्वक बनाई गई।

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