50 साल से रावण-मेघनाथ के पुतले बना रहा मुस्लिम परिवार:संभल में तीन पीढ़ियों से कर रहे काम, बोले- तानों की परवाह नहीं; मेहनत से चलाता है घर
गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की मिसाल संभल में एक मुस्लिम परिवार पिछले करीब 50 सालों से रावण और मेघनाथ के पुतले बनाता आ रहा है। समाज के कुछ लोगों के ताने सुनने के बावजूद परिवार ने अपने पुश्तैनी काम को नहीं छोड़ा। परिवार का कहना है कि उनके लिए यह किसी धार्मिक विवाद का विषय नहीं, बल्कि मेहनत-मजदूरी करके रोजी-रोटी कमाने का जरिया है। कारीगर मोहम्मद आसिफ ने बताया कि उनके परिवार में पुतले बनाने की परंपरा उनके दादा से शुरू हुई थी। इसके बाद उनके पिता ने यह काम किया और अब तीसरी पीढ़ी के रूप में वह खुद इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। आसिफ के मुताबिक, परिवार को पूरे साल दशहरे का इंतजार रहता है, क्योंकि इसी अवसर पर पुतले बनाने से कुछ अतिरिक्त आमदनी होती है। इसी कमाई से बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च चलता है। तीन तस्वीरें देखें उन्होंने बताया कि रावण और मेघनाथ के पुतले तैयार करने की तैयारी करीब डेढ़ महीने पहले शुरू कर दी जाती है। इन्हें बनाने में पांच से छह कारीगर जुटते हैं और तैयार पुतले जिले के अलग-अलग इलाकों में भेजे जाते हैं। आसिफ का कहना है कि उन्हें अपने काम से मतलब है और दूसरे लोग क्या कहते हैं, इस पर वह ध्यान नहीं देते। वहीं, पुतले बनाने के काम में जुटे एक कारीगर ने बताया कि कुछ लोग इस काम को लेकर सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि रावण के पुतले में जान डालनी पड़ेगी। हालांकि, कारीगर का कहना है कि वह मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता है और इसी काम से उसकी रोजी-रोटी चलती है। परिवार के पड़ोसी डॉ. शेख इकबाल अहमद ने भी इस काम को कारोबार बताते हुए कहा कि हर व्यक्ति का अपना नजरिया होता है। उनके मुताबिक, यह परिवार काफी समय से मेहनत करके अपना जीवनयापन कर रहा है। उन्होंने कहा कि पुतले बनाना भी दूसरे कामों की तरह मेहनत-मजदूरी का काम है, जिसके बदले कारीगरों को मेहनताना मिलता है। संभल का यह परिवार बताता है कि धर्म और समुदाय से परे, मेहनत और रोजगार भी जिंदगी की अहम जरूरतें हैं। तीन पीढ़ियों से जारी यह काम आपसी सम्मान और सामाजिक सौहार्द की एक मिसाल पेश करता है।
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