69000 शिक्षक भर्ती पर सुप्रीम कोर्ट में 2 घंटे बहस:बीएड हटाने की दलील पर कोर्ट ने कहा- ज्यादा अंक वाले को कैसे बाहर करेंगे

Oct 06, 2026 - 19:17
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69000 शिक्षक भर्ती पर सुप्रीम कोर्ट में 2 घंटे बहस:बीएड हटाने की दलील पर कोर्ट ने कहा- ज्यादा अंक वाले को कैसे बाहर करेंगे
69000 सहायक शिक्षक भर्ती में 19 हजार सीटों पर आरक्षण में गड़बड़ी के आरोप से जुड़े मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में करीब दो घंटे सुनवाई हुई। जस्टिस एसबीएन भट्टी और जस्टिस एनबी अंजारिया की बेंच ने दोपहर 12 बजे मामले को टेकअप किया। लंच से पहले करीब एक घंटे और लंच के बाद करीब एक घंटे सुनवाई हुई। दोपहर 3 बजे बेंच उठ गई। मामले में बुधवार को भी सुनवाई जारी रहेगी। आरक्षित वर्ग की ओर से अधिवक्ता मनीष गोस्वामी अपनी दलीलें आगे रखेंगे। अनारक्षित वर्ग ने बीएड की पात्रता पर उठाया सवाल अनारक्षित वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने पिछली सुनवाई में अधूरी रह गई अपनी दलीलें पूरी कीं। उन्होंने देवेश शर्मा जजमेंट का हवाला देते हुए कहा कि डबल बेंच ने इस मुद्दे को सुना था, लेकिन इसे सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा विषय मानते हुए हस्तक्षेप नहीं किया। उन्होंने कहा कि 69000 भर्ती की नियुक्तियां महेंद्र पाल की याचिका के अधीन थीं और भर्ती की नियुक्तियां 'सब्जेक्ट टू द आउटकम' थीं। हेगड़े ने कहा कि यदि चयन सूची पर दोबारा विचार होता है तो बीएड को हटाकर बीटीसी को ही पात्र माना जाए। भर्ती के समय एनसीटीई के नोटिफिकेशन के आधार पर बीएड पात्र था और नोटिफिकेशन रद्द होने तक प्रभावी था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि क्या उनका पूरा आग्रह यही है कि सही आदेश होने की स्थिति में बीएड को इस भर्ती से बाहर कर दिया जाए। कोर्ट ने कहा कि बीएड इस भर्ती में शामिल है और करीब 35 हजार बीएड अभ्यर्थी शिक्षक के रूप में चयनित होकर नौकरी कर रहे हैं। कोर्ट ने पूछा– ज्यादा अंक वाले बीएड को कैसे बाहर करेंगे? बेंच ने कहा कि एटीआरई परीक्षा के आधार पर चयन हुआ है। यदि बीएड अभ्यर्थी के अंक अधिक हैं तो केवल बीएड होने के आधार पर उसे बाहर कर कम अंक वाले बीटीसी अभ्यर्थी का चयन कैसे किया जा सकता है। इसी दौरान चयनित पक्ष की ओर से अधिवक्ता अमित भदौरिया ने अपनी बात रखने का अनुरोध किया, लेकिन बेंच ने उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी। एटीआरई सिर्फ पात्रता परीक्षा, चयन का हिस्सा नहीं आरक्षित वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष गोस्वामी ने कहा कि एटीआरई केवल पात्रता परीक्षा है। इसे चयन का हिस्सा नहीं माना जा सकता, क्योंकि परीक्षा पास करने मात्र से नियुक्ति की गारंटी नहीं होती। इस पर बेंच ने राज्य सरकार के एओआर अंकित गोयल से कहा कि उन्हें कोर्ट के सवालों का सामना करने की तैयारी करनी चाहिए। गोस्वामी ने रामशरण मौर्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि नोटिफिकेशन जारी होने से पहले एनसीटीई के नोटिफिकेशन को चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए उस समय बीएड पात्र था। उन्होंने कहा कि 18 नवंबर 2020 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी 69000 भर्ती में बीएड को चयन के लिए वैध और पात्र माना गया था। इस पर बेंच ने कहा कि इस मुद्दे पर पहले ही 11 अधिवक्ता अपनी दलीलें रख चुके हैं। कोर्ट ने कहा कि नए अधिवक्ताओं को सुनने का मतलब यह नहीं है कि पहले रखी गई दलीलें रिकॉर्ड से हट जाएंगी। कोर्ट ने कहा कि जो बातें रखी जा चुकी हैं, वे रिकॉर्ड में सुरक्षित हैं और अंतिम निष्कर्ष से पहले उन्हें पढ़ा जाएगा। साथ ही बेंच ने कहा कि हर दिन वही बात दोहराने की जरूरत नहीं है। EWS की दलील पर कोर्ट बोला, नई बात है तो बताइए ईडब्ल्यूएस की ओर से अधिवक्ता ने सबमिशन लेने का अनुरोध किया। बेंच ने पूछा कि उनका क्या कहना है। अधिवक्ता ने कहा कि उन्हें भी ईडब्ल्यूएस का लाभ मिलना चाहिए। कोर्ट ने पूछा कि क्या इस पर कोई नई बात है। जवाब 'नहीं' मिलने पर बेंच ने आगे सुनवाई नहीं की। शिक्षामित्र बोले, पासिंग मार्क हटें, वेटेज दिया जाए शिक्षामित्रों की ओर से अधिवक्ता ने रामशरण मौर्य केस का हवाला देते हुए एटीआरई और चयन प्रक्रिया को समझाया। उन्होंने कहा कि एटीआरई पात्रता परीक्षा है। इसके बाद एकेडमिक मेरिट जोड़ी जाती है और फिर चयन होता है। अधिवक्ता ने पासिंग मार्क हटाने और शिक्षामित्रों को वेटेज देने की मांग की। उनका कहना था कि राज्य ने पूर्वाग्रह के साथ हाई पासिंग मार्क तय किए और अंतिम चरण में वेटेज नहीं दिया। उन्होंने कहा कि राज्य को कटऑफ तय करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के तेज प्रकाश पाठक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भर्ती प्रक्रिया के बीच में नियम नहीं बदले जा सकते। साथ ही अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल की स्थिति में शिक्षामित्रों को भी राहत देने की मांग की। 1994 के आरक्षण कानून और शासनादेश पर हुई लंबी बहस मनीष गोस्वामी ने उत्तर प्रदेश आरक्षण अधिनियम, 1994 की धारा 3(6) और अन्य प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि माइग्रेशन रोकने का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने धारा 8 को 23 मार्च 1994 के शासनादेश के साथ पढ़ने की मांग की। उन्होंने कहा कि आरक्षित वर्ग को मिलने वाली 5 प्रतिशत छूट से 'लेवल प्लेइंग फील्ड' प्रभावित नहीं होगा। इस पर बेंच ने कहा कि यह तर्क अभी ठोस नहीं है। हालांकि, धारा 3(6) की व्याख्या किए जाने की जरूरत पर अधिवक्ता ने सहमति जताई। कोर्ट ने 23 मार्च 1994 के आदेश को शासनादेश मानने पर सवाल उठाया बहस के दौरान 23 मार्च 1994 के दस्तावेज को लेकर बेंच ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह शासनादेश नहीं, बल्कि एक पत्र या कार्यालयी आदेश प्रतीत होता है। बेंच ने कहा कि सरकारी अधिवक्ता अंकित गोयल इस बारे में स्थिति स्पष्ट करेंगे। मनीष गोस्वामी ने कहा कि लखनऊ हाईकोर्ट की डबल बेंच ने इसे शासनादेश माना है। इस पर जस्टिस भट्टी ने कहा कि यदि पहले कोई गलती हुई है तो उसे जारी रखना जरूरी नहीं है। बेंच ने कहा कि हिंदी में जारी आदेश की भाषा से यह कार्यालयी आदेश प्रतीत होता है। जस्टिस भट्टी ने टिप्पणी की कि कार्यालयी भाषा में अनुरोध या आग्रह नहीं होता, बल्कि सीधे क्या करना है और किस तरीके से करना है, यह बताया जाता है। अधिवक्ताओं की सूची मांगी, लंच के बाद क्रम तय हुआ बेंच ने कहा कि सभी पक्ष अपने-अपने वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नाम लिखकर दें, ताकि बाद में यह शिकायत न हो कि किसी पक्ष को सुना नहीं गया। एओआर मंदीप कालरा ने कहा कि लंच में वे कोर्ट को शॉर्ट नोट देकर बताएंगे कि किस मामले में कौन अधिवक्ता बहस करेगा। लंच के बाद मंदीप कालरा ने आरक्षित वर्ग के अधिवक्ताओं की क्रमवार सूची दी। बेंच ने उसी क्रम में सुनवाई आगे बढ़ाने की अनुमति दी। आरक्षित वर्ग ने कहा- 3(6) सिर्फ इसी भर्ती के लिए नहीं मनीष गोस्वामी ने कहा कि धारा 3(6) कोई विशेष प्रावधान नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की सभी भर्तियों में लागू होने वाली सामान्य धारा है। उन्होंने कहा कि रूल 14 पर पहले भी कई अधिवक्ताओं ने दलील दी है, लेकिन कोर्ट उनके नजरिये से भी इसे सुने। उन्होंने उम्र और फीस में छूट तक इस प्रावधान को सीमित नहीं रखने और इसे संबंधित शासनादेश के साथ पढ़ने की मांग की। उन्होंने कहा कि इसके लिए 23 मार्च 1994 के शासनादेश को भी देखा जाना चाहिए। क्या है पूरा मामला? 69000 सहायक शिक्षक भर्ती में आरक्षण में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने भर्ती प्रक्रिया के शुरुआती दौर में ही लखनऊ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत के बजाय 3.86 प्रतिशत और एससी वर्ग को 21 प्रतिशत के बजाय 16.2 प्रतिशत आरक्षण मिला। मामले में 18 नवंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने बीएड अभ्यर्थियों की पात्रता से जुड़े पहलू पर आदेश दिया था। वहीं, 7 दिसंबर 2020 को लखनऊ हाईकोर्ट ने भर्ती को संबंधित याचिका के परिणाम के अधीन रखा था। इसके बाद 29 मई 2023 को लखनऊ हाईकोर्ट की डबल बेंच ने अंतरिम आदेश में कहा था कि उपलब्ध लाभ संबंधित याचिकाकर्ताओं पर लागू होंगे। 13 अगस्त 2024 को लखनऊ हाईकोर्ट की डबल बेंच ने आरक्षण से जुड़ी गड़बड़ियों के आधार पर चयन सूची को रद्द करते हुए राज्य सरकार को नई सूची तैयार करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भर्ती की मूल चयन सूची में अभ्यर्थियों के अंक, कैटेगरी और सब-कैटेगरी का पूरा विवरण होना चाहिए था, लेकिन ऐसी सूची अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। उनका यह भी कहना है कि पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से मूल चयन सूची से जुड़े दस्तावेज मांगे थे, लेकिन सरकार की ओर से अभी तक वे दस्तावेज पेश नहीं किए गए हैं। बुधवार को भी इस मामले की सुनवाई जारी रहेगी।

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