अकबरपुर में आज तक नहीं खिला कमल:2027 में इतिहास बदलने की चुनौती, 1980 से जीत का इंतजार, 2022 में दूसरे नंबर पर पहुंची पार्टी

Oct 17, 2026 - 10:59
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अकबरपुर में आज तक नहीं खिला कमल:2027 में इतिहास बदलने की चुनौती, 1980 से जीत का इंतजार, 2022 में दूसरे नंबर पर पहुंची पार्टी
प्रदेश की सत्ता पर कई बार काबिज हो चुकी भाजपा के लिए अकबरपुर विधानसभा सीट अब भी चुनौती बनी हुई है। चुनाव दर चुनाव प्रत्याशी और सियासी समीकरण बदलते रहे, लेकिन पार्टी इस सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी। अब 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा इस पुराने रिकॉर्ड को बदलने की तैयारी में जुटी है। पार्टी को केंद्र और प्रदेश सरकार की योजनाओं, लाभार्थियों तक पहुंच, युवा कार्यकर्ताओं और बूथ स्तर पर मजबूत प्रबंधन से उम्मीद है। हालांकि, समाजवादी पार्टी के मौजूदा जनाधार के बीच भाजपा के लिए राह आसान नहीं मानी जा रही है। चार दशक से ज्यादा समय से जीत का इंतजार उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड के मुताबिक, 1980 से 2022 तक अकबरपुर विधानसभा सीट पर भाजपा का कोई प्रत्याशी विधायक नहीं बना। इस दौरान कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), शिवसेना, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी जीत दर्ज करते रहे। ऐसे में भाजपा के सामने केवल सपा को चुनौती देने का लक्ष्य नहीं है, बल्कि सीट पर पहली बार जीत दर्ज करने की भी चुनौती है। कभी वामपंथ का प्रभाव, फिर राम अचल राजभर का दबदबा अकबरपुर की सियासत में अलग-अलग दौर में कई दलों का प्रभाव रहा है। 1980 में कांग्रेस (आई) के प्रियदर्शी जेटली ने जीत दर्ज की। 1985 और 1989 में माकपा के अकबर हुसैन बाबर विधायक बने। 1991 में शिवसेना के पवन कुमार पांडेय ने जीत हासिल की। इसके बाद 1993 से 2007 तक बसपा के राम अचल राजभर ने लगातार चार चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की। 2012 में सपा के राममूर्ति वर्मा विधायक बने। 2017 में राम अचल राजभर ने बसपा के टिकट पर जीत दर्ज की, जबकि 2022 में सपा प्रत्याशी के रूप में उन्होंने फिर विधानसभा सीट हासिल की। 2022 में भाजपा दूसरे स्थान पर पहुंची पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने धर्मराज निषाद को प्रत्याशी बनाया था। सपा के राम अचल राजभर को 81,931 वोट मिले, जबकि भाजपा के धर्मराज निषाद को 69,595 मत हासिल हुए। दोनों के बीच 12,336 वोटों का अंतर रहा। बसपा के चंद्र प्रकाश वर्मा को 53,398 वोट मिले। चुनाव परिणाम से स्पष्ट हुआ कि भाजपा इस सीट पर मुकाबले में दूसरे स्थान तक पहुंच गई है, लेकिन जीत के लिए उसे अपने समर्थन आधार का विस्तार करना होगा। पार्टी के सामने चुनौती है कि पिछले चुनाव में मिले वोटों को बरकरार रखते हुए नए मतदाताओं और वर्गों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाए। सरकारी योजनाओं और लाभार्थियों पर भरोसा भाजपा जिला उपाध्यक्ष विवेक मौर्य का कहना है कि 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने और 2017 में प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद गरीबों, वंचितों और जरूरतमंदों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं लागू की गईं। उनके मुताबिक, योजनाओं का क्रियान्वयन, आधारभूत ढांचे का विकास और कानून-व्यवस्था में सुधार पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में मददगार हो सकते हैं। भाजपा की रणनीति में सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से संपर्क, युवा कार्यकर्ताओं की सक्रियता और बूथ स्तर पर माइक्रो मैनेजमेंट को अहम माना जा रहा है। हालांकि, इन प्रयासों का चुनावी परिणाम पर कितना असर पड़ेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। सपा के सामने भी जनाधार बचाने की चुनौती अकबरपुर में सपा के सामने अपनी मौजूदा राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की चुनौती होगी। वहीं, बसपा भी अपने पुराने प्रभाव को वापस पाने की कोशिश कर सकती है। ऐसे में 2027 का चुनावी मुकाबला केवल प्रत्याशियों के बीच नहीं, बल्कि दलों के संगठनात्मक नेटवर्क, सामाजिक समीकरणों और मतदाताओं तक पहुंच पर भी निर्भर करेगा। 2022 में दूसरे स्थान पर पहुंचने के बाद भाजपा के पास अपनी चुनावी स्थिति मजबूत करने का आधार जरूर है, लेकिन अकबरपुर में पहली जीत दर्ज करने के लिए उसे अपने दावों को वोटों में बदलना होगा। अब देखना होगा कि बूथ स्तर की तैयारी, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से संपर्क और संगठन की सक्रियता पार्टी के लिए कितनी कारगर साबित होती है।

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