अरब स्प्रिंग से बांग्लादेश तक, सरकारें तो गिरीं लेकिन लोकतंत्र क्यों नहीं जीता

अरब स्प्रिंग ने ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया और यमन जैसे देशों में सत्ता परिवर्तन की राह खोली, लेकिन कई जगह लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सका। बांग्लादेश में 2024 के छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना की सरकार गिरी और आगे चुनाव हुए। जानिए इन घटनाओं में समानताएं, अंतर और लोकतंत्र के लिए जरूरी सबक।

Oct 16, 2026 - 15:24
Updated: 3 hours ago
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अरब स्प्रिंग से बांग्लादेश तक, सरकारें तो गिरीं लेकिन लोकतंत्र क्यों नहीं जीता

दि राइजिंग न्यूज़ | ढाका | 16 अक्टूबर 2026

अरब स्प्रिंग ने दुनिया को दिखाया कि जनता का व्यापक आंदोलन वर्षों से सत्ता में बैठी सरकारों को गिरा सकता है। ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया और यमन में सत्ता परिवर्तन हुआ, लेकिन कई देशों में लोकतंत्र की जगह गृहयुद्ध, सैन्य शासन और अस्थिरता ने ले ली। वर्ष 2024 में बांग्लादेश में छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना की सरकार गिर गई। इन घटनाओं से एक बड़ा सवाल उठता है—क्या केवल सरकार बदलने से लोकतंत्र स्थापित हो जाता है, या इसके लिए मजबूत संस्थाओं, जवाबदेह नेतृत्व और स्थिर व्यवस्था की भी आवश्यकता होती है

अरब स्प्रिंग क्या था और इसकी शुरुआत कैसे हुई

अरब स्प्रिंग वर्ष 2010 और 2011 के दौरान पश्चिम एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका के कई देशों में फैला जन आंदोलन था। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, राजनीतिक दमन और लंबे समय से चले आ रहे निरंकुश शासन के खिलाफ लोगों ने सड़कों पर उतरकर विरोध किया। शुरुआत ट्यूनीशिया से हुई, लेकिन कुछ ही समय में इसकी लहर मिस्र, लीबिया, यमन, सीरिया और बहरीन तक पहुंच गई। इन आंदोलनों में लोगों की प्रमुख मांग राजनीतिक सुधार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और जवाबदेह सरकार थी।इस आंदोलन की शुरुआत के पीछे ट्यूनीशिया के एक फल विक्रेता मोहम्मद बूअजीजी की घटना को महत्वपूर्ण माना जाता है। 17 दिसंबर 2010 को सिदी बूजिद शहर में उन्होंने कथित प्रशासनिक उत्पीड़न और अपमान से परेशान होकर खुद को आग लगा ली थी। इस घटना ने पहले से नाराज लोगों के गुस्से को व्यापक विरोध में बदलने में बड़ी भूमिका निभाई। देखते ही देखते स्थानीय प्रदर्शन देशव्यापी आंदोलन बन गया और फिर दूसरे देशों में भी सरकारों के खिलाफ विरोध तेज हो गया।

अरब स्प्रिंग के दौरान किन देशों में गिरीं सरकारें

ट्यूनीशिया: आंदोलन की शुरुआत और राष्ट्रपति का पतन

ट्यूनीशिया में बढ़ते जन आक्रोश के कारण राष्ट्रपति ज़ीन अल आबिदीन बेन अली की सत्ता समाप्त हो गई। वह वर्ष 1987 से देश पर शासन कर रहे थे और जनवरी 2011 में उन्हें देश छोड़ना पड़ा। जनता की नाराजगी का प्रमुख कारण बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक स्वतंत्रता पर पाबंदियां थीं। शुरुआत में इस सत्ता परिवर्तन से लोकतांत्रिक व्यवस्था की उम्मीद जगी, लेकिन बाद के वर्षों में देश को आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ा।

 मिस्र: तीस साल पुराने शासन का अंत

मिस्र में राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर हजारों की संख्या में लोग जुटे और राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के इस्तीफे की मांग करने लगे। लगातार बढ़ते विरोध और राजनीतिक दबाव के बीच 11 फरवरी 2011 को मुबारक को पद छोड़ना पड़ा। यह सत्ता परिवर्तन अरब स्प्रिंग की सबसे बड़ी घटनाओं में गिना गया। हालांकि, इसके बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकी और वर्ष 2013 में सेना ने सत्ता पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

लीबिया: गद्दाफी का अंत और लंबे संकट की शुरुआत

लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी के शासन के खिलाफ वर्ष 2011 में विद्रोह शुरू हुआ। विरोध ने जल्द ही सशस्त्र संघर्ष का रूप ले लिया और अंतरराष्ट्रीय सैन्य हस्तक्षेप भी हुआ। अगस्त 2011 में विद्रोहियों ने राजधानी त्रिपोली पर कब्जा कर लिया और अक्टूबर में गद्दाफी की मृत्यु हो गई। लेकिन उनके पतन के बाद मजबूत केंद्रीय शासन स्थापित नहीं हो पाया और विभिन्न सशस्त्र गुटों के बीच संघर्ष ने देश को लंबे समय तक अस्थिर बनाए रखा।

यमन: राष्ट्रपति को छोड़नी पड़ी सत्ता

यमन में भी वर्ष 2011 में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक दमन के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। लंबे समय से सत्ता में रहे राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह को अंततः पद छोड़ना पड़ा। हालांकि, सत्ता परिवर्तन के बाद भी देश में राजनीतिक समझौता कायम नहीं रह सका। विभिन्न गुटों के बीच संघर्ष बढ़ा और यमन लंबे गृहयुद्ध तथा गंभीर मानवीय संकट की चपेट में आ गया।

 सीरिया: विरोध से गृहयुद्ध तक का सफर

सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के शासन के खिलाफ वर्ष 2011 में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। शुरुआत में प्रदर्शनकारी राजनीतिक सुधार और दमन समाप्त करने की मांग कर रहे थे, लेकिन सरकारी कार्रवाई और सशस्त्र संघर्ष के कारण स्थिति बिगड़ती चली गई। संघर्ष में कई स्थानीय और विदेशी पक्ष शामिल हो गए, जिससे युद्ध और अधिक जटिल हो गया। सीरिया का अनुभव बताता है कि राजनीतिक संकट का शांतिपूर्ण समाधान न निकलने पर पूरा देश लंबे समय तक हिंसा और विस्थापन झेल सकता है।

अरब स्प्रिंग के बाद लोकतंत्र मजबूत क्यों नहीं हुआ

अरब स्प्रिंग के दौरान कई देशों में पुराने शासकों का पतन हुआ, लेकिन इससे अपने आप स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं बन सकी। सत्ता परिवर्तन के बाद कई जगह राजनीतिक संस्थाएं कमजोर थीं, अलग-अलग गुटों के बीच सहमति नहीं बन पाई और सुरक्षा बलों की भूमिका भी निर्णायक रही। कुछ देशों में सेना ने दोबारा सत्ता पर प्रभाव बढ़ाया, जबकि अन्य देशों में सशस्त्र संगठनों ने ताकत हासिल कर ली। इससे स्पष्ट हुआ कि किसी शासक को हटाना और उसके स्थान पर जवाबदेह शासन स्थापित करना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं।इस दौर में उग्रवादी संगठनों के विस्तार ने भी हालात बिगाड़े। इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों ने हिंसा और आतंक का विस्तार किया, जबकि यजीदी समुदाय के खिलाफ वर्ष 2014 में बड़े पैमाने पर अत्याचार और नरसंहार हुए। लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े और कई क्षेत्रों में सामान्य जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ। इस पूरे अनुभव ने दिखाया कि कमजोर शासन व्यवस्था का लाभ उठाकर हिंसक संगठन तेजी से मजबूत हो सकते हैं।

बांग्लादेश में छात्र आंदोलन ने कैसे बदली सत्ता

Protests against quotas: Students go for ‘Bangla Blockade’ | The Daily Star


 आरक्षण के विरोध से शुरू हुआ आंदोलन

बांग्लादेश में वर्ष 2024 के जून महीने में सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था को लेकर छात्र आंदोलन तेज हुआ। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग भर्ती व्यवस्था में सुधार करना था। शुरुआत में यह आंदोलन एक नीतिगत विवाद तक सीमित था, लेकिन सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव बढ़ने से इसका दायरा फैल गया। छात्रों के साथ आम नागरिक भी जुड़ने लगे और विरोध धीरे-धीरे सरकार के खिलाफ व्यापक जन आंदोलन में बदल गया।

 जुलाई में हिंसा ने आंदोलन को नया मोड़ दिया

जुलाई 2024 में प्रदर्शनकारियों और सरकार समर्थक समूहों के बीच टकराव बढ़ गया। सुरक्षा बलों की कार्रवाई और लोगों की मौतों ने आंदोलन को और व्यापक बना दिया। रंगपुर में बेगम रोकेया विश्वविद्यालय के छात्र अबू सईद की 16 जुलाई को गोली लगने से हुई मौत आंदोलन का महत्वपूर्ण मोड़ बनी। इसके बाद छात्रों के साथ आम नागरिकों की भागीदारी भी बढ़ी और विरोध का केंद्र केवल आरक्षण का मुद्दा नहीं रहा।

पांच अगस्त 2024 को शेख हसीना ने छोड़ी सत्ता

बांग्लादेश में अगस्त 2024 की शुरुआत तक सरकार के खिलाफ विरोध अपने चरम पर पहुंच गया था। पांच अगस्त को बड़े पैमाने पर लोग राजधानी ढाका की ओर बढ़े और राजनीतिक संकट निर्णायक स्थिति में पहुंच गया। प्रधानमंत्री शेख हसीना ने पद छोड़ दिया और देश से बाहर चली गईं। इसके बाद सेना की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई और सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई। यह घटनाक्रम बताता है कि बड़े जन आंदोलन के साथ-साथ सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर समर्थन का कमजोर होना भी सरकार के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।

मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार

शेख हसीना के इस्तीफे के बाद बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के गठन का रास्ता खुला। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस को इस सरकार का नेतृत्व सौंपा गया। उनसे राजनीतिक स्थिरता बहाल करने, प्रशासनिक सुधार करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अपेक्षाएं की गईं। हालांकि, अंतरिम सरकार के सामने कानून-व्यवस्था, राजनीतिक मतभेद और संस्थाओं में विश्वास बहाल करने जैसी चुनौतियां भी थीं।

वर्ष 2026 में बांग्लादेश की राजनीति कहां पहुंची

उपलब्ध समाचार सामग्री के अनुसार, बांग्लादेश में फरवरी 2026 में आम चुनाव हुए। इसमें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने 212 सीटें हासिल कीं, जबकि जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन को 77 सीटें मिलीं। तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार बनी और देश ने अंतरिम शासन से निर्वाचित सरकार की ओर कदम बढ़ाया। इस घटनाक्रम को सत्ता परिवर्तन के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।हालांकि, चुनाव हो जाना अपने आप में लोकतंत्र की सफलता का अंतिम प्रमाण नहीं है। राजनीतिक विरोधियों को चुनाव में भाग लेने का अवसर, स्वतंत्र संस्थाओं की भूमिका, नागरिक स्वतंत्रता और सत्ता की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। शेख हसीना की अवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोकने से संबंधित परिस्थितियां भी राजनीतिक समावेशिता पर सवाल खड़े करती हैं। बांग्लादेश के सामने अब यह चुनौती है कि नई सरकार राजनीतिक स्थिरता के साथ लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा कैसे करती है।

अरब स्प्रिंग और बांग्लादेश के आंदोलन में क्या समानता है

दोनों घटनाओं में जनता का असंतोष सड़कों पर दिखाई दिया और छात्रों तथा युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही। अरब स्प्रिंग में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और निरंकुश शासन के खिलाफ विरोध हुआ, जबकि बांग्लादेश में आरक्षण विवाद से शुरू हुआ आंदोलन व्यापक राजनीतिक संकट में बदल गया। दोनों उदाहरण बताते हैं कि जब लोगों को लगता है कि उनकी मांगों को अनसुना किया जा रहा है, तो स्थानीय असंतोष बड़े जन आंदोलन का रूप ले सकता है।लेकिन दोनों के परिणाम एक जैसे नहीं रहे। अरब स्प्रिंग के बाद कई देशों में गृहयुद्ध, सैन्य हस्तक्षेप और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी, जबकि बांग्लादेश में अंतरिम शासन के बाद चुनाव हुए और नई सरकार बनी। फिर भी वहां लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती, राजनीतिक भागीदारी और अधिकारों की सुरक्षा की परीक्षा जारी है। इसलिए किसी आंदोलन की सफलता केवल पुरानी सरकार के पतन से नहीं, बल्कि उसके बाद बनने वाली व्यवस्था से भी मापी जानी चाहिए।

सैम पित्रोदा की टिप्पणी और भारत में लोकतंत्र पर बहस

अरब स्प्रिंग की चर्चा अक्टूबर 2026 में भारत के संदर्भ में भी सामने आई, जब सैम पित्रोदा ने भारतीय युवाओं के आंदोलन की तुलना अरब स्प्रिंग से की। इस तुलना ने जन आंदोलनों, राजनीतिक बदलाव और लोकतंत्र की स्थिरता को लेकर बहस को तेज किया। हालांकि, अलग-अलग देशों के राजनीतिक और सामाजिक हालात एक जैसे नहीं होते। इसलिए किसी विदेशी आंदोलन से तुलना करते समय दोनों देशों की संस्थाओं, कानूनों, राजनीतिक परिस्थितियों और जनता की मांगों को अलग-अलग समझना जरूरी है।भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में किसी आंदोलन के प्रभाव का आकलन उसके उद्देश्यों, भागीदारी, संवैधानिक दायरे और सरकार की प्रतिक्रिया के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल सड़कों पर भीड़ जुटने या नारों के तेज होने से यह तय नहीं होता कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कितना बदलाव आएगा। महत्वपूर्ण यह है कि असहमति व्यक्त करने के अधिकार की रक्षा हो, संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम करें और समस्याओं का समाधान संवैधानिक तरीकों से निकले।

अरब स्प्रिंग से दुनिया ने क्या सीखा

अरब स्प्रिंग का सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि किसी सरकार का पतन और लोकतंत्र की स्थापना एक ही बात नहीं है। सत्ता परिवर्तन के बाद यदि स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था, मजबूत प्रशासन और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तो राजनीतिक अस्थिरता दोबारा पैदा हो सकती है। जनता की भागीदारी परिवर्तन की शुरुआत कर सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था को टिकाऊ बनाने के लिए संस्थागत सुधार और व्यापक राजनीतिक सहमति जरूरी होती है।बांग्लादेश का अनुभव भी इसी प्रश्न को सामने रखता है। छात्र आंदोलन ने पुरानी सत्ता को चुनौती दी और आगे चलकर चुनाव के माध्यम से नई सरकार बनी, लेकिन असली कसौटी शासन की जवाबदेही और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा होगी। किसी भी देश में आंदोलन के बाद का दौर कठिन होता है, क्योंकि उस समय उम्मीदों को वास्तविक नीतियों और संस्थागत सुधारों में बदलना पड़ता है। लोकतंत्र की मजबूती इसी बात से तय होती है कि सत्ता बदलने के बाद नागरिकों के जीवन में कितना स्थायी सुधार आता है।

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