बांदा में दुर्गा प्रतिमाओं की मांग घटी:कारीगर बोले- 15 साल से बना रहे मूर्तियां, अब लागत भी नहीं निकल रही
बांदा में शारदीय नवरात्र को लेकर मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार करने का काम तेज हो गया है। मूर्तिकार दिन-रात मेहनत कर देवी प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। हालांकि, इस बार प्रतिमाओं की मांग में बढ़ोतरी नहीं हुई है। बांदा के मूर्तिकार श्याम जी शर्मा का कहना है कि पिछले साल की तुलना में इस बार प्रतिमाओं की संख्या बराबर रहने के बजाय कुछ कम हुई है। आयोजक पहले की अपेक्षा कम प्रतिमाएं बनवा रहे हैं। इससे मूर्ति निर्माण के काम से जुड़े कारीगरों की आमदनी पर असर पड़ रहा है। श्याम जी शर्मा पिछले करीब 15 साल से मूर्ति निर्माण का काम कर रहे हैं। वह बताते हैं कि उनके यहां अप्रैल से ही काम शुरू हो जाता है, जो करीब छह महीने तक चलता है। इस दौरान दुर्गा प्रतिमाओं के साथ गणेश प्रतिमाएं भी तैयार की जाती हैं। दुर्गा प्रतिमाओं के ऑर्डर पहले से मिलने लगते हैं, इसलिए इन्हें प्राथमिकता देकर तैयार किया जाता है। मूर्ति बनाने में चाक मिट्टी के अलावा जोड़ मजबूत करने के लिए थोड़ी मात्रा में प्लास्टर, जूट, बांस और बल्लियों समेत कई तरह की सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। 51 हजार रुपये तक की प्रतिमा बनाई प्रतिमाओं को आकार देने से लेकर उनकी सजावट और अंतिम रूप देने तक कारीगरों को काफी मेहनत करनी पड़ती है। श्याम जी शर्मा के यहां सामान्य तौर पर 11 हजार से 25 हजार रुपये तक की प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं। विशेष ऑर्डर मिलने पर करीब 51 हजार रुपये तक की प्रतिमा बनाई जाती है। प्रतिमा की कीमत उसके आकार और ऑर्डर के अनुसार तय होती है। मूर्ति निर्माण के इस काम में करीब 10 कारीगर लगे हुए हैं। छह महीने तक चलने वाला यह कारोबार उनके लिए रोजगार का जरिया है। हालांकि, लागत और मेहनत के मुकाबले आमदनी कम होने से परेशानी भी है। मजदूरों की मजदूरी निकल जाती श्याम जी शर्मा कहते हैं कि मूर्ति बनाने में काफी मेहनत लगती है, लेकिन उतनी कमाई नहीं हो पा रही है। किसी तरह परिवार का खर्च और मजदूरों की मजदूरी निकल जाती है। उनके मुताबिक, काम चल तो रहा है, लेकिन मेहनत के हिसाब से आमदनी नहीं मिल रही।
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