'भाई इस दुनिया में नहीं, दोषी पुलिसवालों को फांसी हो':प्रापर्टी डीलर बोले- थाना प्रभारी फ्री में मांग रहे थे प्लॉट, CBCID ने दर्ज कराई थी FIR
‘तत्कालीन थाना प्रभारी विद्या सागर तिवारी हमसे 400 वर्ग गज का प्लॉट मुफ्त में मांग रहे थे। हमने देने से मना किया तो मेरे भाई पर लूट का मुकदमा लिख दिया। पुलिस घर से चार लोगों को उठाकर ले गई और अगले दिन जेल भेज दिया।’ यह कहना है 1991 के कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में फंसाए गए राकेश पाठक के बड़े भाई देव प्रसाद पाठक का। देव प्रसाद ने दैनिक भास्कर एप टीम से बातचीत में कहा कि उन्होंने पुलिस अधिकारियों को पूरी बात बताई, लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी। भाई की जमानत हाईकोर्ट से करानी पड़ी। इसके बाद उन्होंने शासन से मामले की जांच कराने की मांग की। अब 35 साल बाद 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज हुई है। देव प्रसाद ने कहा कि उनके भाई की 13 साल पहले मौत हो चुकी है, लेकिन वह उन्हें कथित तौर पर फंसाने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ आखिरी दम तक लड़ेंगे। उनकी मांग है कि बेगुनाह को फंसाने वाले पुलिसकर्मियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले। ‘रात में घर से उठाकर ले गई पुलिस, अगले दिन जेल भेज दिया’ देव प्रसाद पाठक ने बताया कि 22 अगस्त 1991 की रात परिवार के लोग खाना खाने के बाद सो रहे थे। देर रात पुलिस घर पहुंची और उनके भाई राकेश समेत चार लोगों को अपने साथ ले गई। परिवार के लोग थाने पहुंचे और तत्कालीन थाना प्रभारी से बात की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। देव प्रसाद के मुताबिक, पुलिस ने उनके भाई समेत 11 लोगों को लूट के मामले में जेल भेज दिया। उन्होंने भाई की जमानत हाईकोर्ट से कराई। इसके बाद शासन को पत्र लिखकर पूरे मामले की CBCID से जांच कराने की मांग की। देव प्रसाद ने आरोप लगाया कि पुलिस उनके घर से पिता के नाम की लाइसेंसी डबल बैरल बंदूक और राइफल भी ले गई थी। उन्होंने कहा कि इस कार्रवाई से उनके भाई का करियर खराब हो गया और परिवार को लंबे समय तक मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी। ‘भाई को इंसाफ दिलाने में 35 साल लग गए’ महाराजपुर पुलिस ने 22 अगस्त 1991 को कानपुर-प्रयागराज हाईवे पर वाहनों से लूटपाट कर रहे बदमाशों के साथ मुठभेड़ का दावा किया था। पुलिस ने राकेश पाठक और उनके 11 साथियों को गिरफ्तार कर अवैध हथियार और विस्फोटक सामग्री बरामद होने की बात कही थी। सभी आरोपी करीब 40 दिन जेल में रहे। वर्ष 1996 में साक्ष्यों के अभाव में उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया। देव प्रसाद ने मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए जांच की मांग की थी। CBCID की जांच के दौरान उस डीसीएम चालक का बयान भी सामने आया, जिसके साथ पुलिस की कहानी में लूट और मारपीट की घटना का जिक्र था। चालक ने पुलिस की बताई घटना से अलग जानकारी दी। जांच रिपोर्ट के आधार पर 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई। देव प्रसाद ने इस मामले में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की आशंका भी जताई। उनका कहना है कि वह कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष थे और विधानसभा चुनाव में एक प्रत्याशी को चुनाव लड़ा रहे थे। उनका प्रत्याशी हार गया था। देव प्रसाद ने आरोप लगाया कि इस मामले में बाद में निर्वाचित हुए विधायक की भी भूमिका रही। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई उन्होंने बताया कि जेल से छूटने के बाद राकेश गांव चले गए थे। 8 मई 2003 को कानपुर आने पर कृष्णा नगर में सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। देव प्रसाद ने कहा कि अदालत से भाई को 1996 में राहत मिल गई थी, लेकिन उन्हें फंसाने के आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। इसी वजह से वह इतने वर्षों तक संघर्ष करते रहे। देव प्रसाद ने कहा, ‘मेरा भाई अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसे बेगुनाह फंसाने वालों के खिलाफ मेरी लड़ाई जारी रहेगी। इस घटना से हमारा परिवार मानसिक रूप से टूट गया और सामाजिक नुकसान भी उठाना पड़ा। मेरी मांग है कि आरोपी पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा हो।’ इन 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दरोगा बीडी सारस्वत, योगेंद्र नाथ सिंह, रमेश चंद्र, हेड कांस्टेबल हृदय नारायण तिवारी, कांस्टेबल तेज नारायण तिवारी, बैजनाथ, बृजेश कुमार, चंद्रबली, विद्याकांत शुक्ला, रामआसरे, रमेश कुमार तिवारी और ड्राइवर जागेश्वर यादव के खिलाफ FIR दर्ज की गई है।
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