ब्रिक्स में ईरान की ‘बहादुरी’ और सऊदी की ‘चुप्पी’, क्यों बदला पश्चिम एशिया का खेल?

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की एक मंच पर मौजूदगी ने पश्चिम एशिया के बदलते शक्ति संतुलन को चर्चा में ला दिया है। गाजा युद्ध, होर्मुज और बाब अल-मंदीब में तनाव तथा क्षेत्रीय सुरक्षा के बीच ईरान की सक्रियता और सऊदी अरब के संयमित रुख की तुलना की जा रही है।

Sep 12, 2026 - 19:36
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ब्रिक्स में ईरान की ‘बहादुरी’ और सऊदी की ‘चुप्पी’, क्यों बदला पश्चिम एशिया का खेल?

दि राइजिंग न्यूज | नई दिल्ली | 12 सितंबर 2026

भारत की राजधानी नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को हो रहे अठारहवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पश्चिम एशिया की राजनीति का एक अलग ही चेहरा देखने को मिला। एक ही मंच पर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद और संयुक्त अरब अमीरात के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान मौजूद रहे। तीनों देशों के बीच क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा को लेकर कई मतभेद हैं। इसके बावजूद ब्रिक्स मंच पर उनकी मौजूदगी बदलते वैश्विक समीकरणों का संकेत मानी जा रही है।

संयुक्त बयान पर सहमति के लिए लंबी बातचीत

ब्रिक्स के संयुक्त बयान को लेकर सदस्य देशों के बीच काफी देर तक बातचीत चली। भारत ने शाम करीब चार बजे तक चली चर्चा के बाद सभी पक्षों के बीच सहमति बनाने की दिशा में काम किया। ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच पश्चिम एशिया से जुड़े मुद्दों पर मतभेद इस प्रक्रिया को कठिन बना रहे थे। ऐसे में भारत की कोशिश रही कि क्षेत्रीय विवादों का असर ब्रिक्स के व्यापक एजेंडे और सम्मेलन की सफलता पर न पड़े।

गाजा युद्ध के बाद ईरान की बदली छवि

गाजा में 7 अक्टूबर 2023 के बाद शुरू हुए युद्ध ने पश्चिम एशिया की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है। फिलिस्तीन के मुद्दे पर लंबे समय तक अरब देशों का प्रभाव अधिक दिखाई देता था, लेकिन गाजा युद्ध के बाद ईरान ने खुद को इजरायल विरोधी प्रतिरोध के प्रमुख केंद्र के रूप में पेश किया। ईरान ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के माध्यम से फिलिस्तीन के मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश की। इसी वजह से कुछ मुस्लिम बहुल देशों में आम लोगों के बीच ईरान की छवि पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली दिखाई देने लगी है।

ईरान को ‘रखवाले’ के रूप में क्यों देखा जाने लगा

ईरान स्वयं को फिलिस्तीन और मुस्लिम हितों के समर्थन में खड़ा देश बताता रहा है। गाजा युद्ध के दौरान उसके सहयोगी संगठनों की सक्रियता ने इस छवि को और मजबूत किया। शिया और सुन्नी दोनों समुदायों के कुछ लोगों के बीच ईरान को लेकर समर्थन बढ़ने की बात विभिन्न अध्ययनों और विश्लेषणों में सामने आई है। हालांकि यह धारणा पूरे मुस्लिम जगत की एक समान राय नहीं है, लेकिन पश्चिम एशिया में ईरान के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को नजरअंदाज करना मुश्किल है।

सऊदी अरब की छवि को लेकर सवाल

सऊदी अरब लंबे समय से सुन्नी मुस्लिम दुनिया के सबसे प्रभावशाली देशों में गिना जाता है। हालांकि गाजा युद्ध के दौरान उसका रुख ईरान की तुलना में अधिक संयमित रहा। इजरायल के साथ संभावित संबंध सामान्य करने की चर्चाओं ने भी सऊदी अरब के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी की। कई सर्वेक्षणों में सऊदी जनता के बड़े हिस्से ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने का विरोध किया है, जिससे सरकार के सामने घरेलू जनभावना और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बीच संतुलन की चुनौती बनी हुई है।

ईरान-इजरायल टकराव ने बदली क्षेत्रीय तस्वीर

ईरान और इजरायल के बीच सीधे सैन्य टकराव ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को और जटिल बना दिया। इस संघर्ष का असर खाड़ी देशों पर भी पड़ा और सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़ा। सऊदी अरब ने क्षेत्रीय तनाव के बीच सीधे टकराव से बचने की कोशिश की। इसी वजह से उसके आलोचक उसकी नीति को अपेक्षाकृत शांत और सावधान रुख के रूप में देखते हैं, जबकि ईरान को अधिक आक्रामक और सक्रिय शक्ति के तौर पर पेश किया जाता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य बना ईरान की बड़ी ताकत

होर्मुज जलडमरूमध्य पश्चिम एशिया की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक राहों में से एक है। खाड़ी क्षेत्र से दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक जाने वाले बड़ी मात्रा में तेल और ऊर्जा संसाधनों का परिवहन इसी मार्ग से होता है। ईरान की भौगोलिक स्थिति उसे इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रभाव देती है। क्षेत्रीय संघर्ष के दौरान इस मार्ग को लेकर पैदा होने वाला कोई भी संकट सऊदी अरब समेत कई तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल सकता है।

सऊदी तेल निर्यात पर बढ़ा दबाव

होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े तनाव का असर सऊदी अरब के तेल निर्यात पर भी पड़ने की बात सामने आई है। चीन सऊदी तेल का एक बड़ा खरीदार है और समुद्री मार्गों में किसी भी तरह की बाधा से आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। सऊदी अरब ने अपनी पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन के जरिए लाल सागर तक तेल पहुंचाने का विकल्प इस्तेमाल किया है। हालांकि क्षेत्रीय सुरक्षा संकट बढ़ने पर वैकल्पिक मार्ग भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माने जा सकते।

हूती विद्रोहियों से सऊदी अरब की चुनौती

यमन के हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थित संगठन माना जाता है और उन्होंने लंबे समय से सऊदी अरब के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की है। लाल सागर और बाब अल-मंदीब जलडमरूमध्य के आसपास उनकी गतिविधियों ने समुद्री सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ाई है। सितंबर 2026 में सऊदी अरब के कुछ क्षेत्रों में मिसाइल और मानवरहित विमानों से हमले किए जाने की बात सामने आई। इन घटनाओं ने सऊदी अरब की सुरक्षा चुनौतियों को और गंभीर बना दिया है।

बाब अल-मंदीब पर तनाव का असर

बाब अल-मंदीब जलडमरूमध्य लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा पर क्षेत्रीय संघर्ष का सीधा असर पड़ सकता है। हूती विद्रोहियों की ओर से समुद्री मार्गों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं ने सऊदी अरब सहित कई देशों की चिंता बढ़ाई है। यदि यहां लंबे समय तक अस्थिरता रहती है तो इसका असर तेल, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी पर भी पड़ सकता है।

ईरान का क्षेत्रीय सहयोगी तंत्र

ईरान ने पश्चिम एशिया में कई ऐसे क्षेत्रीय संगठनों और सशस्त्र समूहों के साथ संबंध विकसित किए हैं, जिनके जरिए वह अपना प्रभाव बढ़ाता रहा है। इराक और यमन में सक्रिय ईरान समर्थित समूहों को इसी व्यापक क्षेत्रीय रणनीति का हिस्सा माना जाता है। इन समूहों की मौजूदगी के कारण ईरान अपने प्रत्यक्ष सैन्य प्रभाव से आगे भी दबाव बनाने की क्षमता रखता है। यही नेटवर्क सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों के लिए सुरक्षा संबंधी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

ब्रिक्स में ईरान और सऊदी अरब की अलग-अलग भूमिका

ब्रिक्स के विस्तार के बाद ईरान और सऊदी अरब दोनों इस समूह के महत्वपूर्ण सदस्य बन गए हैं। दोनों देशों की आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग हैं, लेकिन एक ही बहुपक्षीय मंच पर उनकी मौजूदगी पश्चिम एशिया के बदलते समीकरण को दर्शाती है। ईरान अपने राजनीतिक प्रभाव और क्षेत्रीय मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश कर रहा है। वहीं सऊदी अरब अपनी आर्थिक शक्ति और निवेश क्षमता के जरिए वैश्विक प्रभाव बढ़ाने पर जोर देता रहा है।

सऊदी अरब की ‘विजन 2030’ के सामने चुनौतियां

सऊदी अरब की महत्वाकांक्षी आर्थिक परिवर्तन योजना का उद्देश्य तेल पर निर्भरता कम करना और पर्यटन, उद्योग, तकनीक तथा निवेश के नए क्षेत्रों को बढ़ावा देना है। लेकिन पश्चिम एशिया में लंबे समय तक चलने वाला सैन्य तनाव इस आर्थिक परिवर्तन के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। समुद्री मार्गों और तेल आपूर्ति से जुड़ा संकट निवेशकों के भरोसे को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सऊदी अरब के लिए क्षेत्रीय स्थिरता केवल सुरक्षा का नहीं बल्कि आर्थिक विकास का भी महत्वपूर्ण विषय है।

सऊदी की चुप्पी और ईरान की सक्रियता पर बहस

पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों में ईरान की सक्रिय सैन्य और राजनीतिक रणनीति ने उसकी क्षेत्रीय भूमिका को मजबूत किया है। इसके विपरीत सऊदी अरब ने सीधे युद्ध में उतरने के बजाय कूटनीतिक और सुरक्षा संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। समर्थकों के लिए यह सऊदी अरब की सावधानी है, जबकि आलोचक इसे कमजोरी के रूप में देखते हैं। इसी अंतर ने दोनों देशों की क्षेत्रीय छवि को लेकर नई बहस को जन्म दिया है।

क्या ईरान सऊदी अरब की जगह ले सकता है

ईरान और सऊदी अरब की तुलना केवल सैन्य ताकत के आधार पर नहीं की जा सकती। सऊदी अरब के पास विशाल आर्थिक संसाधन, ऊर्जा शक्ति और अंतरराष्ट्रीय निवेश का प्रभाव है, जबकि ईरान के पास मजबूत क्षेत्रीय नेटवर्क और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति है। दोनों देशों की ताकत का स्वरूप अलग है और दोनों के सामने अपनी-अपनी सीमाएं भी हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईरान ने मुस्लिम दुनिया में सऊदी अरब की जगह पूरी तरह ले ली है, लेकिन क्षेत्रीय प्रभाव के समीकरण जरूर बदल रहे हैं।

ब्रिक्स से पश्चिम एशिया को क्या संदेश

ब्रिक्स में ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की एक साथ मौजूदगी यह दिखाती है कि वैश्विक राजनीति अब कई नए शक्ति केंद्रों की ओर बढ़ रही है। जिन देशों के बीच क्षेत्रीय मतभेद हैं, वे भी आर्थिक और कूटनीतिक मंचों पर साथ बैठने की कोशिश कर रहे हैं। भारत की मेजबानी में हुई यह बैठक इसी बदलते समीकरण का महत्वपूर्ण उदाहरण है। आने वाले समय में ब्रिक्स पश्चिम एशिया के देशों के बीच संवाद और आर्थिक सहयोग के लिए एक अतिरिक्त मंच बन सकता है।

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