बर्थ एनिवर्सरी- कादर खान:मस्जिदों में भीख मांगते थे, कब्रिस्तान में डायलॉग चिल्लाते हुए पहला ऑफर मिला, 'सर जी' न कहने पर अमिताभ से दोस्ती टूटी

Oct 22, 2026 - 04:45
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बर्थ एनिवर्सरी- कादर खान:मस्जिदों में भीख मांगते थे, कब्रिस्तान में डायलॉग चिल्लाते हुए पहला ऑफर मिला, 'सर जी' न कहने पर अमिताभ से दोस्ती टूटी
“हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है…” ये डायलॉग अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया, लेकिन हिंदी सिनेमा के ऐसे कई यादगार संवादों के पीछे कादर खान की कलम थी। पर्दे पर अपनी अदाकारी और संवादों से कभी हंसाने, कभी रुलाने, तो कभी खलनायक बनकर डराने वाले कादर खान की निजी जिंदगी संघर्षों से भरी थी। काबुल में जन्मे कादर खान का परिवार अनहोनी के डर से भारत आ गया। बॉम्बे के कमाठीपुरा की तंग गलियों में गरीबी का आलम ये था कि बचपन में उन्हें मस्जिद के बाहर बैठकर भीख मांगनी पड़ी। लेकिन जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं, उस उम्र में कादर खान अपने हुनर को आवाज दे रहे थे। कब्रिस्तान में खड़े होकर फिल्मी डायलॉग बोलते कादर पर एक थिएटरकर्मी की नजर पड़ी और यहीं से उनके रंगमंच तक पहुंचने का रास्ता खुला। आगे चलकर यही हुनर उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित संवाद लेखकों और अभिनेताओं में ले आया। आज कादर खान की बर्थ एनिवर्सरी पर पढ़िए, संघर्षों से शोहरत तक पहुंचे उस कलाकार की जिंदगी के चुनिंदा किस्से, जिसने पर्दे पर लाखों चेहरों पर मुस्कान बिखेरी, लेकिन खुद की जिंदगी में कई मुश्किलों का सामना किया- किस्सा- 1 3 भाइयों की मौत हुई, मां की जिद पर अफगानिस्तान से भारत आया परिवार 22 अक्टूबर 1937, कादर खान का जन्म काबुल, अफगानिस्तान में हुआ। पिता मौलवी थे। कादर खान के 3 बड़े भाई थे। सबसे बड़ा भाई 8 साल का हुआ, तो उसकी मौत हो गई। दूसरे, तीसरे के साथ भी ठीक यही हुआ। ऐसे में जब कादर की उम्र बढ़ने लगी, तो मां डर गईं। उन्होंने पति से साफ कहा- ये जगह मेरे बच्चों के लिए ठीक नहीं, कहीं दूर चलते हैं। उनकी फिक्र समझकर पिता ने एक फौजी गाड़ी में जरूरत का सामान रखा और परिवार के साथ बॉम्बे आ गए। तंगहाली के दिन थे, ऐसे में परिवार ने बॉम्बे की कमाठीपुरा बस्ती में पनाह ली। ये बॉम्बे का सबसे बदनाम इलाका माना जाता था। हर रोज चोरी-चकारी, हत्या होना आम बात थी। प्रोस्टिट्यूशन के लिए भी ये इलाका बदनाम था। किस्सा- 2 तंगहाली के बीच पिता छोड़कर गए, मस्जिदों में भीख मांगते थे कादर खान बदलती तारीखों के साथ जमापूंजी खत्म होने लगी। पिता और मां के भी गुरबत में झगड़े बढ़ने लगे और जब कादर 2 साल के हुए, तो पिता उन्हें छोड़कर चले गए और बॉम्बे में ही रहकर एक मस्जिद के इमाम बन गए। पिता के जाने की खबर जब बलूचिस्तान में ननिहाल पहुंची, तो नाना-मामूजान एक फरमान के साथ बॉम्बे आ गए। साफ कहा गया, अकेली जवान औरत एक बच्चे के साथ इस बदनाम मोहल्ले में अकेली नहीं रहेगी। यहां रहना है, तो दूसरा निकाह करना होगा। आनन-फानन में जबरदस्ती मां का दूसरा निकाह करवाया गया। सौतेले पिता के पास भी कोई कमाई का जरिया नहीं था। भूख से परेशान मां ने आसपास के लोगों से मांगकर गुजारा किया। कादर ने होश संभाला, तो मां ने बताया कि उनके पिता डोंगरी के टेनटेनपुरा की मस्जिद के इमाम हैं। जब भी घर में खाना नहीं होता, तो कादर कई किलोमीटर पैदल चलकर पिता के पास जाते और उनसे 2 रुपए मांगते। पिता से जवाब मिलता- मेरे पास भी पैसे नहीं हैं। ऐसे में कादर मस्जिद के बाहर ही भीख मांगते। दिन भर में जो भी भीख या खाना मिलता, उससे गुजारा होता। कुछ दिन खाना मिलता, तो कुछ दिन भूखे पेट ही रात गुजरती। कुछ महीने बाद सौतेले पिता भी उन्हें छोड़कर चले गए। किस्सा- 3 मजदूरी करने निकले, तो मां ने कहा- मैं मुसीबत से लड़ूंगी, तू पढ़ तंगहाली में मां ने उनका दाखिला स्कूल में करवाया, लेकिन तब घर की हालत और बिगड़ने लगी। एक दिन पड़ोस में रहनेवाले लड़कों ने कहा- ‘क्या रखा है पढ़ाई में, कारखाने चल, साथ में मजदूरी कर, 2-5 रुपए मिलेंगे।’ कादर ने उस दिन घर आकर बस्ता फेंका और कारखाने के लिए निकलने लगे, तभी मां के हाथ ने कंधा रोक दिया। पलटे तो मां ने तुरंत कहा- ‘मैं जानती हूं, तू कहां जा रहा है। तू इनके साथ 4-5 रुपए कमाने जा रहा है। बेटा, इस 4-5 रुपए से घर में खुशियां- रोटी नहीं आएंगी। तुझे वाकई हमदर्दी है, तो तू खुशियां ला सकता है। तू पढ़, तू कुछ मत कर, मैं हूं, मैं मुसीबतों से जंग करूंगी।’ मां की समझाइश पर कादर खान ने पढ़ाई में खूब मन लगाया। बचपन के ये किस्से कादर खान ने लहरें रेट्रो को दिए इंटरव्यू में सुनाए थे। किस्सा- 4 कब्रिस्तान में जाकर डायलॉग बोलते थे, तभी मिला पहले प्ले का ऑफर कादर खान को बचपन से ही लोगों की नकल उतारने में बड़ा मजा आता था। लेकिन वो ये काम अकेले में करते थे। मां जब भी उन्हें नमाज पढ़ने मस्जिद भेजती, तो वो बस्ती की भीड़ से बचते हुए कब्रिस्तान जाते और कब्रों के बीच खड़े होकर जोर-जोर से लोगों की आवाजों की नकल उतारते और फिल्मी डायलॉग बोलते। 8 साल की उम्र में एक दिन वो तेज-तेज फिल्म का डायलॉग बोल रहे थे, तभी कब्रिस्तान की दीवार की आड़ में खड़े अशरफ खान ने उनकी आवाज सुन ली, जो थिएटर से जुड़े थे और प्ले करते थे। आवाज की भारीपन उन्हें नजदीक ले गई। उन्हें कादर का हुनर भांपने में देर न लगी और उन्होंने झट से पूछ लिया- नाटक में काम करोगे। कादर ने भी तुरंत हामी भर दी और ऐसे उनका परिचय मंच से हुआ। चंद रुपए भी मिलने लगे, घर की माली हालत भी सुधरने लगी, लेकिन कादर ने पढ़ाई को भी पूरी तवज्जो दी और म्युनिसिपल स्कूल से मैट्रिक पास कर उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग के जरिए पढ़ाई जारी रखी। साथ ही वो प्ले का भी हिस्सा बनते रहे। पढ़ाई पूरी करते हुए वो बायकला के एम.एच.साबू सिद्दीक कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ाने लगे। कॉलेज में वो अनोखे और आसान अंदाज में पढ़ाने के लिए जाने जाते थे। दूसरी तरफ प्ले में अभिनय करने के साथ वो प्ले लिखने और डायरेक्शन का काम करने से भी चर्चा में आ रहे थे। किस्सा- 5 प्ले करते हुए फिल्ममेकर ने डायलॉग लिखने का दिया मौका, 3 घंटे में लिखी फिल्म कादर अपने प्ले से मशहूर हो रहे थे। उन्हें महीने के 300-350 रुपए मिलते। तभी एक प्ले कॉम्पिटिशन की घोषणा हुई। कादर ने साफ कहा, वो हिस्सा नहीं लेंगे। उन्हें बताया गया कि जीतने वाले को 1500 रुपए मिलेंगे। कादर ने न चाहते हुए भी फॉर्म भरा। उन्होंने प्ले लिखा, लोकल ट्रेन। खुद अभिनय किया और खुद डायरेक्ट भी किया। फाइनल कॉम्पिटिशन के दिन डायरेक्टर नरेंद्र बेदी और एक्ट्रेस कामिनी कौशल जज की कुर्सी पर आए। जैसे ही कादर ने प्ले किया, तालियों की गूंज से थिएटर भर गया। कामिनी कौशल और नरेंद्र बेदी तुरंत कादर से मिलने बैकस्टेज गए और कहा- ‘तुम फिल्मों में क्यों नहीं आते। तुम्हारे पास हुनर है, तुम जैसे लोगों की जरुरत होती है।’ कादर ने जवाब दिया- ‘मुझे फिलहाल फिल्मों में अभिनय करने में दिलचस्पी नहीं है।’ इतने में डायरेक्टर नरेंद्र बेदी ने कहा- ‘मैं जया भादुड़ी, रणधीर कपूर के साथ फिल्म बना रहा हूं, जवानी दीवानी। मैं चाहता हूं तुम उसके डायलॉग लिखो।’ कादर खान ने जवाब दिया- ‘मुझे नहीं पता कि फिल्मों के डायलॉग कैसे लिखते हैं।’ इस पर नरेंद्र बेदी ने कहा- ‘हम जानते हैं कि तुम लिख लोगे। हमने आपके लिखे ड्रामा देखे हैं।’ अगले दिन कादर खान को ऑफिस बुलाकर एक स्क्रिप्ट थमा दी और कहा कि आप इसके डायलॉग लिखकर लाना। दिमाग लगाने का कोई ठिकाना नहीं था, तो कादर खान लोकल ट्रेन पकड़कर मरीन ड्राइव पर जाकर बैठे। डायरी पेन निकाला और लिखना शुरू कर दिया। पास में बच्चे फुटबॉल खेल रहे थे, बॉल बार-बार आकर लग रही थी, लेकिन कादर ने संयम बनाए रखा। 3 घंटे बाद वो दोबारा नरेंद्र बेदी के ऑफिस में पहुंचे। इतनी जल्दी कादर को देख वो खीझ गए और सोचा- इस लड़के को लिखने भेजा था, ये फिर सवाल लेकर आ गया। उन्होंने कड़े लहजे में पूछा- ‘अब क्या है?’ कादर खान ने जवाब दिया- ‘आपने डायलॉग लिखने कहा था…’ नरेंद्र बेदी ने कहा- 'तो?' कादर ने इस पर कहा- ‘मैं पूरे डायलॉग लिख लाया।’ नरेंद्र बेदी सकते में थे कि महीनों में होने वाला काम ये लड़का 3 घंटे में कैसे कर सकता है, जरूर ऊल-जलूल कुछ लिख लाया होगा। उन्होंने डायरी थामी और पढ़ना शुरू किया। आखिरी डायलॉग खत्म हुआ, तो नरेंद्र बेदी ने कुर्सी से उठकर कादर खान को सीने से लगा लिया। इससे पहले शायद किसी ने 3 घंटे की फिल्म के डायलॉग 3 घंटे में नहीं लिखे थे। इस काम के उन्हें 1500 रुपए मिले। आगे उन्हें कई फिल्मों के डायलॉग लिखने के ऑफर मिले। किस्सा- 6 प्ले की बदौलत दिलीप कुमार ने दिया फिल्मों में अभिनय करने का मौका एक दिन कादर खान ने ताश के पत्ते प्ले किया। मशहूर कॉमेडियन-एक्टर आगा भी दर्शक दीर्घा में बैठे थे। अभिनय देखकर लौटे, तो उन्होंने दिलीप कुमार से कहा- आपको उस लड़के का प्ले जरूर देखना चाहिए। अगले दिन कादर खान, कॉलेज में पढ़ा रहे थे, तभी एक चपरासी दौड़ता हुआ क्लास में आ पहुंचा। उसने कहा- ‘सर जल्दी चलिए आपके लिए कॉल आया है।’ वो ऑफिस पहुंचे, तो देखा सारा स्टाफ खड़े होकर खुसुर-फुसुर कर रहा था। कादर खान ने रिसीवर उठाते हुए कहा- ‘हैलो…,कौन बोल रहा है?’ जवाब मिला- 'मैं यूसुफ बोल रहा हूं।' कादर ने फिर पूछा- ‘कौन यूसुफ?’ इस बार जवाब मिला- ‘फिल्म इंडस्ट्री मुझे दिलीप कुमार नाम से जानती है।’ कादर खान के हाथ से रिसीवर छूट गया। कॉल की दूसरी तरफ सुपरस्टार दिलीप कुमार थे। उन्होंने जैसे ही दोबारा रिसीवर कान पर लगाया तो दिलीप कुमार ने कहा- ‘मैंने आपके प्ले की बहुत तारीफ सुनी है। मैं आपका प्ले देखना चाहता हूं।’ कादर खान ने झट से 2 शर्तें रख दीं। पहली शर्त, प्ले शुरू होने से पहले पहुंचना होगा और दूसरी शर्त- प्ले पूरा देखना होगा। दिलीप कुमार मान गए। वो अगले दिन समय से पहले पहुंचे। जब प्ले खत्म हुआ, तो उनकी आंखें लाल थीं। तालियां बजनी बंद हुईं, तो दिलीप कुमार ने कादर खान से कहा- मैं अभी तो कुछ नहीं कर सकता, लेकिन चाहता हूं आप मेरी अगली दोनों फिल्मों सगीना और बैराग में काम करें। कादर खान ने झट से हामी भर दी। इसी समय कादर खान ने कुछ और फिल्मों के ऑफर कबूल किए। उनकी बतौर एक्टर पहली राजेश खन्ना स्टारर फिल्म दाग (1973) रही, जिसमें उन्होंने वकील का किरदार निभाया। समय के साथ कादर खान की पॉपुलैरिटी बढ़ती गई। उन्होंने 300 फिल्मों में अभिनय किया और साथ ही 250 से ज्यादा फिल्मों के डायलॉग लिखे। फिल्म रोटी (1974) लिखने के लिए राजेश खन्ना और मनमोहन देसाई ने उन्हें 121000 रुपए फीस दी थी, जो उस समय में रिकॉर्ड थी। उन्होंने धरम वीर, गंगा जमुना सरस्वती, कूली, देश प्रेमी, सुहाग, परवरिश, अमर अकबर एंथोनी, शराबी, लावारिस, मुकद्दर का सिकंदर, सत्ते पे सत्ता, कूली नंबर 1, मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी, साजन चले ससुराल, आंटी नंबर 1 जैसी कई फिल्मों के डायलॉग लिखे। किस्सा- 7 सर जी नहीं कहा, तो टूट गई अमिताभ बच्चन से दोस्ती कादर खान और अमिताभ बच्चन ने कई कूली, सुहाग जैसी कई फिल्मों में काम किया। कादर खान ने ही अमिताभ की हिट फिल्मों मिस्टर नटवरलाल, सत्ते पे सत्ता, हम, अग्निपथ जैसी फिल्मों के डायलॉग लिखे। साथ काम करते हुए दोनों की दोस्ती गहरी होती चली गई। एक दिन जब कादर खान को पता चला कि अमिताभ बच्चन राजनीति में जाने वाले हैं, तो उन्होंने चेताया कि ऐसा न किया जाए। राजनीति अच्छे-अच्छों को बदल देती है। अमिताभ ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया। एक दिन मजाकिया अंदाज में कादर खान ने कहा, अगर तुम राजनीति में जाओगे, तो मैं तुम्हारे खिलाफ चुनाव लड़ूंगा और सबसे कहूंगा कि तुम्हें वोट न दिया जाए। बात आई-गई हो गई और अमिताभ बच्चन सांसद बन गए। कुछ दिनों बाद कादर खान और अमिताभ बच्चन किसी प्रोग्राम में पहुंचे। तभी साउथ का एक प्रोड्यूसर कादर खान के पास आया और कहा- ‘आप सर जी से मिले?’ कादर खान ने पूछा- ‘कौन सर जी?’ प्रोड्यूसर ने अमिताभ बच्चन की तरफ इशारा कर कहा- ‘वो जो लंबा सा शख्स दिख रहा है वो। हमारे सर जी।’ कादर खान ने कहा- ‘वो मेरे लिए अमित है। हम दोस्त हैं।’ प्रोड्यूसर ने टोकते हुए कहा, ‘हम सब उन्हें सर जी कहते हैं। आप भी उन्हें अब से सर जी ही कहना।’ कादर खान शांत खड़े रहे। सब वहां अमिताभ बच्चन को सर जी कह रहे थे। ये बात जब अमिताभ बच्चन तक पहुंची कि कादर खान ने उन्हें सर कहने से इनकार कर दिया, तो दोनों के बीच दूरियां आ गईं। कादर खान ने एक इंटरव्यू में कहा कि अमिताभ बच्चन भी चाहते थे कि वो उन्हें सर कहें। कादर खान से जुड़े ये फैक्ट्स भी पढ़िए-

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