'एक्सीडेंट के बाद शुरुआती घंटा अहम,समय पर इलाज बचाएगा जान':SGPGI में विश्व ट्रॉमा डे पर कार्यक्रम, मानसिक आघात से बचाव पर जोर
सड़क हादसे के बाद शुरुआती एक घंटा घायल की जान बचाने के लिए बेहद अहम होता है। इस दौरान प्राथमिक उपचार, खून बहने पर घाव पर सीधे दबाव डालने और 108 एंबुलेंस को सूचना देने से जान बचाई जा सकती है। वहीं, हादसे का मानसिक आघात भी पीड़ित को लंबे समय तक परेशान कर सकता है। बुरे सपने आना, घबराहट और दोबारा सफर करने से डर लगना इसके लक्षण हैं। यह जानकारी SGPGI के निदेशक डॉ. आरके धीमान ने दी। शनिवार को विश्व ट्रॉमा डे पर PGI के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में सड़क सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें 170 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। डॉ. धीमान ने कहा कि अस्पताल पहुंचने से पहले सही देखभाल और शुरुआती पुनर्जीवन से कई जानें बचाई जा सकती हैं। घायल को सावधानी से अस्पताल पहुंचाना जरूरी कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने बताया कि हादसे के बाद सबसे पहले घटनास्थल को सुरक्षित करना चाहिए। घायल को सावधानी से स्थानांतरित करना जरूरी है, ताकि रीढ़ की चोट का खतरा न बढ़े। चेहरे, नाक और जबड़े में चोट लगने पर प्राथमिक उपचार और तुरंत अस्पताल पहुंचने की जरूरत के बारे में भी जानकारी दी गई। हादसे के बाद मानसिक परेशानी को न करें नजरअंदाज विशेषज्ञों ने पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) के लक्षणों और मानसिक परामर्श की जरूरत पर भी चर्चा की। बताया गया कि हादसे के बाद बुरे सपने, घबराहट और दोबारा सफर करने में डर जैसी परेशानियां होने पर मदद लेनी चाहिए। डॉ.सुरुचि ने ब्रेन डेथ के बाद अंगदान के महत्व की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अंगदान से आठ लोगों की जान बचाई जा सकती है। कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों ने हेलमेट और सीट बेल्ट लगाने, नशे में गाड़ी नहीं चलाने और सड़क हादसे के पीड़ितों की मदद करने की शपथ ली।
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