एसएन मेडिकल कॉलेज से कैदी फरार हुआ था कैदी:पुलिसकर्मियों की थी लापरवाही, सबूत न मिलने से सिपाही हुए बरी
आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज से 2015 में फरार हुए उम्रकैद के कैदी के मामले में अदालत ने चार पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने माना कि कैदी के भागने में पुलिसकर्मियों की लापरवाही तो थी, लेकिन उसे भगाने या मदद करने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला। अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर सका। अपर सत्र न्यायाधीश न्यायालय संख्या-23 अमित कुमार यादव ने संदेह का लाभ देते हुए फैसला सुनाया। 2015 में अस्पताल से फरार हुआ था कैदी मामला 24 जून 2015 का है। मथुरा के राधा निवास, हैजा निवासी सीटी लाला उर्फ गोपाल हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा था। उसे इलाज के लिए एसएन मेडिकल कॉलेज के सर्जिकल वार्ड में भर्ती कराया गया था। उसकी सुरक्षा में कांस्टेबल सतेंद्र सिंह, पवन कुमार, सुशील कुमार और अनिल कुमार तैनात थे। दोपहर करीब एक बजे कैदी अस्पताल से फरार हो गया था। घटना के बाद प्रतिकार निरीक्षक प्रथम परशुराम सिंह की तहरीर पर थाना एमएम गेट में चारों पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिसकर्मियों पर कैदी की सुरक्षा में लापरवाही बरतने और उसके फरार होने में भूमिका होने का आरोप था। 9 गवाहों के बयान में कमजोर पड़ा अभियोजन पक्ष सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने वादी और डॉक्टरों समेत 9 गवाह पेश किए। वादी ने जिरह में बताया कि उसे सिपाहियों की मिलीभगत की कोई जानकारी नहीं मिली थी, हालांकि उनकी लापरवाही जरूर थी। डॉ. चंद्र प्रकाश पाल और डॉ. अक्षुनी सिंह की गवाही से भी आरोप कमजोर हुए। एक डॉक्टर ने कैदी के भागने की सूचना देने की पुष्टि की। इससे घटना छिपाने का आरोप साबित नहीं हो सका। बचाव पक्ष ने दलील दी कि घटना वाले दिन कैदी का ऑपरेशन होना था। उसे ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया था और सुरक्षाकर्मियों को बाहर रहने के लिए कहा गया था। डॉक्टरों की गवाही में यह संभावना भी सामने आई कि कैदी उन्हें चकमा देकर भागा हो। लापरवाही पर विभागीय कार्रवाई संभव अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 222 के तहत केवल लापरवाही पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना था कि पुलिसकर्मियों ने जानबूझकर कैदी को भगाया या उसकी मदद की। लेकिन ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला। अदालत ने माना कि पुलिसकर्मियों की लापरवाही पर विभागीय कार्रवाई हो सकती है, लेकिन आपराधिक आरोप साबित नहीं होने के कारण उन्हें सजा नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर चारों पुलिसकर्मियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)