एशियन-गेम्स में कांस्य जीतकर लौटे रोहित का जौनपुर में स्वागत:बांस-लकड़ी के भाले से शुरू सफर एशियन गेम्स तक पहुंचा, 84.35 मीटर थ्रो से रोहित ने जीता कांस्य
जापान के नागोया में आयोजित 20वें एशियाई खेलों में जेवलिन थ्रो में कांस्य पदक जीतकर लौट रहे अंतरराष्ट्रीय एथलीट रोहित यादव का शुक्रवार को जौनपुर में भव्य स्वागत किया जाएगा। रोहित सुबह करीब 7 बजे वाराणसी एयरपोर्ट पहुंचेंगे। इसके बाद बरसठी बाजार क्षेत्र के मीयांचक पहुंचेंगे, जहां से करीब 11 बजे रोड शो शुरू होगा। रोड शो करीब 15 किलोमीटर तक चलेगा। मीयांचक से शुरू होकर यह बंधवा बाजार पहुंचेगा। इसके बाद रोहित यादव अपने गांव अदारी (डभीया) स्थित घर जाएंगे। स्वागत को लेकर क्षेत्र में उत्साह का माहौल है। रास्ते में जगह-जगह स्वागत की तैयारियां की गई हैं। गांव में भी परिजन और ग्रामीण रोहित के स्वागत की तैयारियों में जुटे हैं। एशियाई खेलों में पदक जीतकर लौट रहे अपने लाल के स्वागत को लेकर ग्रामीणों में खासा उत्साह है। ग्रामीणों का कहना है कि रोहित की उपलब्धि ने जौनपुर और पूरे क्षेत्र को गौरवान्वित किया है। पिता ने बांस-लकड़ी से बनाया भाला, घर से शुरू हुई जैवलिन की ट्रेनिंग रोहित यादव के पिता सभाजीत यादव ने बेटे के शुरुआती संघर्ष को याद करते हुए बताया कि जैवलिन की शुरुआत घर से ही हुई थी। वर्ष 2013-14 के आसपास उन्होंने रोहित को भाला फेंकने का अभ्यास कराना शुरू किया। उस समय अच्छे जैवलिन की कीमत ज्यादा थी और परिवार के पास उसे खरीदने की क्षमता नहीं थी। ऐसे में सभाजीत ने बांस और लकड़ी से भाला तैयार किया और उसी से रोहित को अभ्यास कराया। कभी-कभी खेल की दुकान से करीब 50 से 100 रुपए वाला लकड़ी का जैवलिन भी लाकर अभ्यास कराया जाता था। गांव की मिट्टी से शुरू हुआ यही सफर आज एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंच चुका है। रोहित ने 84.35 मीटर के थ्रो के साथ कांस्य पदक जीता। पिता बोले- रास्ता दिखाया, असली मेहनत रोहित ने की सभाजीत यादव का कहना है कि बेटे को मैदान तक पहुंचाने में उन्होंने सिर्फ रास्ता दिखाया, असली मेहनत रोहित ने खुद की। उन्होंने बताया कि संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। परिवार के तीनों बच्चे जैवलिन थ्रो से जुड़े हैं और उन्हें खेल के लिए प्रेरित करने वाले सभाजीत खुद भी खेल से जुड़े रहे हैं। रोहित की सफलता का पल परिवार ने टीवी और मोबाइल पर देखा। सभाजीत बताते हैं कि उस समय खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्हें रोहित का एक थ्रो विशेष रूप से शानदार लगा, लेकिन वह तार से टकरा गया। उनके मुताबिक अगर वह थ्रो सफल होता तो पदक का रंग अलग हो सकता था। अधिकारियों ने रोहित को एक और मौका दिया, लेकिन वह थ्रो सेक्टर से बाहर चला गया। इसके बावजूद कांस्य पदक जीतना परिवार के लिए गर्व का क्षण रहा। पिता को 2028 ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद सभाजीत यादव को उम्मीद है कि रोहित आने वाले समय में विश्व चैंपियनशिप और 2028 के अमेरिका ओलंपिक में भी देश के लिए बेहतर प्रदर्शन करेंगे। उनके लिए यह सिर्फ बेटे की जीत नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष का परिणाम है। उनका कहना है कि रोहित ने जौनपुर के साथ पूरे देश का नाम दुनिया में रोशन किया है। भाई बोले- शुरुआत में जरूरी उपकरण तक आसानी से नहीं मिलते थे रोहित के बड़े भाई राहुल यादव ने बताया कि शुरुआती दौर बेहद कठिन था। उस समय जरूरी खेल उपकरण आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाते थे। घर में जो व्यवस्था हो पाती थी, उसी से अभ्यास किया जाता था। गांव में भी खेल को लेकर ज्यादा माहौल और जानकारी नहीं थी। राहुल के मुताबिक जैवलिन के लिए किस तरह का वर्कआउट करना है और क्या शेड्यूल होना चाहिए, इसकी भी परिवार को ज्यादा जानकारी नहीं थी। पिता जितना जानते थे, वही बच्चों को बताते थे और वे उसी के अनुसार मेहनत करते रहे। इसी संघर्ष के बीच रोहित ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई और एशियन गेम्स में देश के लिए कांस्य पदक हासिल किया।
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