कपास की खेती से किसानों का मोहभंग
हरियाणा में कपास की खेती लगातार संकट का सामना कर रही है। कीटों के बढ़ते हमले, मौसम की मार और लागत के मुकाबले कम आमदनी के कारण किसान कपास छोड़कर दूसरी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। इस वर्ष कपास का रकबा घटकर 2.82 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले सात वर्षों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।
दि राइजिंग न्यूज़। चंडीगढ़। 7 जून 2026
सात वर्षों में सबसे कम हुआ कपास का रकबा
हरियाणा में कपास की खेती का क्षेत्र लगातार सिकुड़ता जा रहा है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार इस खरीफ मौसम में कपास का रकबा केवल 2.82 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है। यह पिछले सात वर्षों का सबसे निचला स्तर है। वर्ष 2019-20 में राज्य में लगभग 8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती होती थी। इसके बाद लगातार गिरावट का दौर शुरू हुआ। पिछले वर्ष यह रकबा 3.9 लाख हेक्टेयर था, जबकि इस वर्ष इसमें लगभग 28 प्रतिशत की और गिरावट दर्ज की गई है।
प्रमुख कपास उत्पादक जिले भी प्रभावित
सिरसा, हिसार, फतेहाबाद, भिवानी, चरखी दादरी, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ जैसे जिले कभी हरियाणा में कपास उत्पादन के बड़े केंद्र माने जाते थे। लेकिन अब इन इलाकों में भी किसान कपास की खेती से दूरी बनाते दिखाई दे रहे हैं। कई किसान अब धान, बाजरा और अन्य फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं क्योंकि उन्हें कपास की तुलना में अधिक स्थिर आय की उम्मीद दिखाई देती है।
कीटों और मौसम ने बढ़ाई परेशानी
विशेषज्ञों के अनुसार कपास की खेती में गिरावट का सबसे बड़ा कारण लगातार होने वाला फसल नुकसान है। पिछले कुछ वर्षों में भारी बारिश, जलभराव और बाढ़ जैसी परिस्थितियों ने कपास की फसल को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। इसके अलावा गुलाबी सुंडी जैसे कीटों का प्रकोप किसानों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। इन हमलों के कारण पैदावार में भारी कमी आई है और किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।
किसानों को नहीं मिल रहा लागत का उचित मूल्य
कपास उत्पादकों की आर्थिक स्थिति भी लगातार कमजोर होती जा रही है। कृषि विशेषज्ञों के अध्ययन के अनुसार कपास की खेती की औसत लागत लगभग 40 हजार रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच चुकी है। इसके मुकाबले किसानों को फसल बेचने से औसतन केवल 24 हजार रुपये प्रति एकड़ की आय प्राप्त हो रही है। अन्य आय को जोड़ने के बाद भी किसानों को प्रति एकड़ लगभग 15 हजार रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
सरकारी योजनाएं भी नहीं रोक सकीं गिरावट
कपास उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने कई योजनाएं लागू की थीं। किसानों को सूक्ष्म पोषक तत्वों के लिए प्रति एकड़ 2 हजार रुपये तथा देसी कपास की खेती के लिए 4 हजार रुपये प्रति एकड़ की सहायता राशि भी दी गई। इसके अलावा कपास उत्पादक जिलों के लिए विशेष प्रकोष्ठ बनाया गया, लेकिन इसके बावजूद खेती के रकबे में गिरावट का सिलसिला नहीं थम सका।
विशेषज्ञों ने जताई भविष्य को लेकर चिंता
कृषि विभाग के अधिकारियों और विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को बेहतर मूल्य, प्रभावी कीट नियंत्रण और मौसम से होने वाले नुकसान के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिली तो आने वाले वर्षों में कपास की खेती और अधिक प्रभावित हो सकती है। कपास को कम पानी वाली महत्वपूर्ण नकदी फसल माना जाता है। ऐसे में इसकी खेती में लगातार गिरावट न केवल किसानों बल्कि कृषि अर्थव्यवस्था और कपड़ा उद्योग के लिए भी चिंता का विषय बनती जा रही है।