हिसार में प्रेम विवाह पर पंचायत का फरमान, क्या यह कानूनन मान्य है

हरियाणा के हिसार में सामाजिक पंचायत ने प्रेम विवाह के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर ऐसे विवाह करने वाले जोड़ों के सामाजिक बहिष्कार की बात कही है। हालांकि, भारतीय कानून के तहत बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार है और किसी पंचायत को विवाह पर रोक लगाने या गैर-कानूनी फरमान जारी करने का अधिकार नहीं है।

Sep 23, 2026 - 10:41
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हिसार में प्रेम विवाह पर पंचायत का फरमान, क्या यह कानूनन मान्य है

दि राइजिंग न्यूज़ |हरियाणा | 23 सितंबर 2026

हरियाणा के हिसार जिले के आर्य नगर गांव में एक सामाजिक पंचायत ने एक ही गांव के युवक-युवती के बीच होने वाले प्रेम विवाह के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया है। प्रस्ताव में ऐसे विवाह करने वाले लोगों और उनका समर्थन करने वालों के सामाजिक बहिष्कार की बात कही गई है। हालांकि, संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों के अनुसार, बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार प्राप्त है।

हिसार में प्रेम विवाह के खिलाफ पंचायत का प्रस्ताव

हरियाणा के हिसार जिले के आर्य नगर गांव में ग्रामीणों की एक सामाजिक पंचायत में प्रेम विवाह को लेकर प्रस्ताव पारित किया गया। बताया गया कि बैठक में करीब एक हजार ग्रामीण शामिल हुए थे। प्रस्ताव में एक ही गांव के युवक-युवती के बीच होने वाले ऐसे विवाह का विरोध करने और संबंधित परिवारों के सामाजिक बहिष्कार की बात कही गई।पंचायत में यह भी कहा गया कि प्रेम विवाह का समर्थन करने वाले परिवार के सदस्यों या अन्य लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए एक समिति बनाए जाने की बात सामने आई है, जो घर-घर जाकर ग्रामीणों की राय लेने वाली है। यह निर्णय हाल के महीनों में गांव में हुई तीन शादियों के बाद लिए जाने की जानकारी सामने आई है।

चुनी हुई ग्राम पंचायत ने फैसले से बनाई दूरी

आर्य नगर गांव के सरपंच रतन सिंह भी इस बैठक में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनी हुई ग्राम पंचायत की इस प्रस्ताव में कोई भूमिका नहीं है। उनके अनुसार, हाल में गांव में तीन ऐसी शादियां हुई थीं, जिनके बाद सामाजिक पंचायत में इस मुद्दे पर चर्चा की गई।बताया गया कि इन तीन विवाहों में दो अलग-अलग जातियों के युवक-युवती के बीच हुए थे, जबकि एक विवाह समान जाति के लोगों के बीच हुआ था। इसके बाद गांव के कुछ बुजुर्गों ने बैठक आयोजित कर प्रेम विवाह को लेकर अपना विरोध दर्ज कराया।

ग्रामीणों ने पुरानी सामाजिक परंपराओं का दिया हवाला

बैठक में शामिल ग्रामीणों की ओर से प्रेम विवाह को लेकर सामाजिक और पारंपरिक मान्यताओं का हवाला दिया गया। ग्रामीण भजन लाल ने कहा कि गांव की हर लड़की को बेटी के समान माना जाता है और प्रेम विवाह की बढ़ती घटनाओं को कुछ लोग पुरानी सामाजिक परंपराओं के विपरीत मान रहे हैं।हालांकि, सामाजिक परंपराओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच कानून की स्थिति अलग है। किसी सामाजिक समूह या पंचायत का प्रस्ताव अपने आप में किसी बालिग व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। विवाह से जुड़े व्यक्तिगत फैसलों पर अंतिम कानूनी अधिकार संविधान और लागू कानूनों के आधार पर तय होता है।

पुलिस ने सुरक्षा का भरोसा दिया

हिसार के पुलिस अधीक्षक सिद्धांत जैन ने मामले पर पुलिस की नजर होने की बात कही है। पुलिस की ओर से यह भी कहा गया है कि ऐसे जोड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति के खिलाफ धमकी, दबाव या हिंसा जैसी स्थिति को रोकना है।ऐसे मामलों में कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन और पुलिस की जिम्मेदारी होती है। यदि किसी व्यक्ति को उसके विवाह या व्यक्तिगत फैसले के कारण धमकाया जाता है, परेशान किया जाता है या उसके खिलाफ हिंसा की जाती है, तो संबंधित परिस्थितियों के अनुसार आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है।

क्या बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से विवाह करने का अधिकार है

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि बालिग व्यक्ति के जीवनसाथी चुनने का निर्णय उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है।इसका अर्थ है कि केवल जाति, समुदाय या सामाजिक परंपरा के आधार पर किसी बालिग व्यक्ति को उसकी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने से रोकने का अधिकार किसी सामाजिक पंचायत को नहीं मिलता। विवाह की वैधता संबंधित व्यक्तिगत कानूनों और लागू वैधानिक प्रावधानों के आधार पर तय होती है।

खाप या सामाजिक पंचायत किसी विवाह पर फरमान नहीं लगा सकती

सामाजिक या सामुदायिक पंचायतों को न्यायालय जैसी कानूनी शक्ति प्राप्त नहीं है। वे किसी बालिग युवक-युवती के विवाह को रोकने, उनके खिलाफ दंड घोषित करने या सामाजिक बहिष्कार लागू करने का वैधानिक अधिकार नहीं रखतीं।सर्वोच्च न्यायालय ने शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ मामले में सम्मान के नाम पर होने वाली हिंसा और सामुदायिक हस्तक्षेप के संबंध में महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि किसी व्यक्ति के विवाह के फैसले में इस तरह का गैर-कानूनी सामुदायिक हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।

सामाजिक बहिष्कार के फैसले की कानूनी स्थिति क्या है

किसी व्यक्ति या परिवार को विवाह के कारण समाज से अलग करने, धमकाने या उनका सामाजिक बहिष्कार करने का फैसला अपने आप में कानूनी दंड नहीं बन जाता। यदि ऐसे फैसले के साथ धमकी, जबरदस्ती, हिंसा, उत्पीड़न या अन्य अपराध किए जाते हैं, तो संबंधित लोगों के खिलाफ लागू आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है।इसलिए किसी पंचायत या सामाजिक समूह का प्रस्ताव किसी बालिग व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता। कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी पुलिस, प्रशासन और न्यायालयों की है, न कि किसी अनौपचारिक सामाजिक पंचायत की।

ऐसे प्रस्ताव जारी करने वालों पर क्या कार्रवाई हो सकती है

यदि किसी सामाजिक बैठक में शामिल लोग किसी व्यक्ति को विवाह करने से रोकने के लिए धमकी देते हैं, दबाव बनाते हैं या हिंसा के लिए उकसाते हैं, तो मामले के तथ्यों के आधार पर उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है। केवल सामाजिक दबाव और कानूनी आदेश में भी स्पष्ट अंतर है।सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार, प्रशासन को ऐसे मामलों में संभावित हिंसा और धमकी की स्थिति को गंभीरता से लेना होता है। प्रभावित जोड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और किसी भी गैर-कानूनी गतिविधि पर कार्रवाई करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।

स्थानीय पंचायत को भी कानून का पालन करना होगा

यदि कोई आधिकारिक ग्राम पंचायत या उसका प्रतिनिधि किसी ऐसे सामाजिक फैसले से खुद को अलग बताता है, तो इससे सामाजिक पंचायत के प्रस्ताव को कानूनी मान्यता नहीं मिलती। इसी तरह, किसी चुनी हुई पंचायत को भी संविधान और कानून के दायरे में ही काम करना होता है।किसी भी स्थानीय संस्था को बालिग नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अपनी इच्छा थोपने का अधिकार नहीं है। इसलिए आर्य नगर में सामने आया प्रस्ताव तभी कानूनी रूप से प्रभावी हो सकता है जब वह मौजूदा कानून के अनुरूप हो; किसी व्यक्ति के विवाह पर सामाजिक फरमान अपने आप वैधानिक आदेश नहीं बन जाता।

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