भारत में गरीबी घटी, फिर भी करोड़ों लोगों को घर और साफ पानी क्यों नहीं

भारत में गरीबी की दर में गिरावट के बावजूद करोड़ों लोग साफ पानी, शौचालय, पक्के मकान और पर्याप्त आमदनी जैसी बुनियादी जरूरतों से जूझ रहे हैं। जानिए गरीबी के आंकड़ों और आम लोगों की वास्तविक परेशानियों के बीच अंतर।

Oct 16, 2026 - 13:44
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भारत में गरीबी घटी, फिर भी करोड़ों लोगों को घर और साफ पानी क्यों नहीं

दि राइजिंग न्यूज | नई दिल्ली | 16 अक्टूबर 2026

भारत में गरीबी की दर में पिछले वर्षों के दौरान बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन करोड़ों लोगों के जीवन में अब भी बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है। कम आमदनी, बढ़ती महंगाई, अस्थायी रोजगार, कुपोषण और साफ पानी तथा पक्के मकान की कमी गरीब परिवारों की मुश्किलें बढ़ा रही है। ऐसे में गरीबी रेखा से ऊपर आना जरूरी है, लेकिन बेहतर जीवन और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना उससे भी बड़ी चुनौती है।

गरीबी के आंकड़े सुधरे, लेकिन लोगों की मुश्किलें बरकरार

भारत में गरीबी कम होने के दावे के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है कि यदि करोड़ों लोग गरीबी से बाहर आ चुके हैं, तो उनके जीवन में परेशानियां अब भी क्यों बनी हुई हैं। गरीबी का आकलन केवल आमदनी के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसी बुनियादी जरूरतों को भी समझना जरूरी है।संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक के आंकड़ों के अनुसार, भारत में गरीबी के स्तर में उल्लेखनीय कमी आई है। हालांकि, रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े यह भी संकेत देते हैं कि बड़ी आबादी अब भी आवश्यक सुविधाओं से वंचित है और लाखों परिवार दोबारा गरीबी में जाने के जोखिम का सामना कर रहे हैं।

गरीबी में गिरावट के पीछे क्या हैं प्रमुख आंकड़े

भारत में गरीबी कम होने के दावों को समझने के लिए आय आधारित गरीबी, अत्यधिक गरीबी और बहुआयामी गरीबी के आंकड़ों को अलग-अलग देखना आवश्यक है। इन तीनों का आकलन करने के तरीके अलग हैं, इसलिए इनके निष्कर्ष भी एक-दूसरे से भिन्न हो सकते हैं।विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011-12 में भारत की 57.7 प्रतिशत आबादी प्रतिदिन 4.20 डॉलर की अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे थी। वर्ष 2023-24 में यह अनुपात घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया। रिपोर्ट में वर्ष 2026 के लिए 14.2 प्रतिशत और वर्ष 2028 के लिए 12.1 प्रतिशत तक गिरावट का अनुमान भी दिया गया है।अत्यधिक गरीबी के मामले में भी गिरावट दर्ज की गई है। विश्व बैंक की संशोधित अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा के अनुसार, प्रतिदिन तीन डॉलर के मानक पर वर्ष 2022-23 में भारत में अत्यधिक गरीबी का अनुपात 5.3 प्रतिशत था। इसका अर्थ है कि पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में लोग अत्यधिक गरीबी की स्थिति से बाहर आए हैं।नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, भारत में बहुआयामी गरीबी का अनुपात वर्ष 2005-06 के 55.3 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2022-23 में 11.28 प्रतिशत रह गया। इस अवधि में लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। यह बदलाव महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि गरीबी से बाहर आए सभी परिवारों को पर्याप्त आमदनी और बेहतर जीवन की सुविधाएं मिल गई हैं।

गरीबी रेखा तय करने पर क्यों उठ रहे सवाल

गरीबी मापने के लिए निर्धारित सीमा यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि किसी व्यक्ति या परिवार को गरीब माना जाएगा या नहीं। यदि कोई व्यक्ति इस सीमा से थोड़ी अधिक आमदनी प्राप्त करने लगे, तो वह आंकड़ों में गरीबी से बाहर आ सकता है। लेकिन इससे यह जरूरी नहीं कि उसकी भोजन, आवास, शिक्षा और इलाज जैसी जरूरतें भी पूरी होने लगी हों।इसी कारण गरीबी मापने के तरीकों पर चर्चा होती रही है। महंगाई, बदलती जीवनशैली, उपभोग की जरूरतों और अलग-अलग क्षेत्रों में रहने की लागत को ध्यान में रखना जरूरी है। यदि गरीबी की सीमा लोगों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप नहीं है, तो आंकड़ों में सुधार के बावजूद उनकी आर्थिक कठिनाइयां बनी रह सकती हैं।सरकार की ओर से बहुआयामी गरीबी को भी महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। इस पद्धति में आमदनी के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर से जुड़े कई संकेतकों को देखा जाता है। हालांकि, गरीबी की पूरी तस्वीर समझने के लिए यह भी देखना होगा कि परिवारों को नियमित रोजगार, पर्याप्त भोजन और अप्रत्याशित खर्चों से निपटने की आर्थिक क्षमता मिल रही है या नहीं।

कमाई और महंगाई के बीच बढ़ता अंतर

भारत में काम करने वाले लोगों का अनुपात बढ़ा है, लेकिन इससे हर व्यक्ति की आमदनी में समान वृद्धि नहीं हुई है। श्रम बल से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017-18 में काम करने वाले लोगों का अनुपात 46.8 प्रतिशत था, जो वर्ष 2023-24 में बढ़कर 58.2 प्रतिशत हो गया। इसके बावजूद नियमित वेतन पाने वाले और अपना काम करने वाले कई लोगों की वास्तविक आय में खास सुधार नहीं दिखाई दिया।विश्व बैंक के प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, महंगाई के प्रभाव को समायोजित करने के बाद नियमित वेतन पाने वाले कर्मचारियों की दैनिक आय वर्ष 2017-18 और वर्ष 2023-24 में 381 रुपये पर स्थिर रही। इसी अवधि में अपना काम करने वाले लोगों की दैनिक आय 246 रुपये से घटकर 242 रुपये रह गई। हालांकि, दिहाड़ी श्रमिकों की आय 189 रुपये से बढ़कर 227 रुपये हुई।इसका असर आम परिवारों के बजट पर पड़ता है। भोजन, मकान का किराया, बच्चों की पढ़ाई, बिजली और इलाज पर खर्च लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है। जब आमदनी जरूरतों के मुकाबले कम पड़ती है, तो परिवारों को खर्च में कटौती करनी पड़ती है। कई बार इसका सीधा असर बच्चों के पोषण, शिक्षा और परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य पर पड़ता है।

अस्थायी रोजगार और कम वेतन बड़ी चुनौती

भारत में बड़ी संख्या में लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनमें निर्माण श्रमिक, घरेलू कामगार, छोटे दुकानदार, दिहाड़ी मजदूर और कई अन्य प्रकार के कामगार शामिल हैं। इन लोगों के पास अक्सर नियमित रोजगार, सुनिश्चित वेतन, पेंशन और स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाओं का अभाव रहता है। काम बंद होने या बीमारी की स्थिति में उनकी आर्थिक स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है।ई-श्रम पोर्टल से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, पंजीकृत असंगठित श्रमिकों के बड़े हिस्से की मासिक आय 10,000 रुपये से कम बताई गई है। इतनी कम आमदनी में परिवार का किराया, भोजन, बच्चों की शिक्षा और इलाज का खर्च संभालना कठिन हो जाता है। यदि किसी महीने अतिरिक्त खर्च आ जाए, तो परिवार को उधार लेने या जरूरी जरूरतों में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।दूसरी ओर, नए प्रकार के काम और सेवाओं के क्षेत्र में भी रोजगार के अवसर बढ़े हैं। सामान पहुंचाने वाले कर्मचारी, वाहन चालक और अन्य मंच आधारित कामगार इसका उदाहरण हैं। लेकिन काम के अवसर बढ़ने के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि श्रमिकों को उचित भुगतान, नियमित काम और सामाजिक सुरक्षा मिले। केवल रोजगार की संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है, उसकी गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है।

साफ पानी, शौचालय और पक्के मकान की कमी

गरीबी का एक बड़ा पहलू बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता है। किसी परिवार के पास कमाई का साधन होने के बावजूद यदि उसे साफ पीने का पानी, सुरक्षित शौचालय, पक्का मकान, बिजली और स्वच्छ ईंधन उपलब्ध नहीं है, तो उसका जीवन कठिन बना रहता है। ऐसी परिस्थितियां बच्चों की सेहत, महिलाओं की सुरक्षा और पूरे परिवार के जीवन स्तर को प्रभावित कर सकती हैं।उपलब्ध रिपोर्ट में लगभग 23.8 करोड़ लोगों के बुनियादी सुविधाओं से वंचित होने का उल्लेख किया गया है। यह आंकड़ा इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ-साथ आवास, स्वच्छता और पेयजल की उपलब्धता पर भी ध्यान देना आवश्यक है। केवल आय के आधार पर किसी परिवार की वास्तविक स्थिति का आकलन करना अधूरा साबित हो सकता है।ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में समस्याओं का स्वरूप भी अलग हो सकता है। गांवों में सुरक्षित पेयजल, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच चुनौती बन सकती है, जबकि शहरों में महंगा किराया, असुरक्षित बस्तियां और रोजमर्रा के खर्च गरीब परिवारों पर दबाव डाल सकते हैं। इसलिए बुनियादी सुविधाओं की योजनाओं को जरूरतमंद लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना जरूरी है।

गरीबी रेखा से ऊपर आने के बाद भी क्यों बना रहता है खतरा

मान लीजिए कि किसी व्यक्ति की आमदनी पहले प्रतिदिन 3.20 डॉलर थी और बाद में बढ़कर 4.30 डॉलर हो गई। यदि गरीबी मापने की सीमा 4.20 डॉलर है, तो वह व्यक्ति आंकड़ों के अनुसार गरीबी रेखा से ऊपर आ जाएगा। लेकिन उसकी बढ़ी हुई आमदनी से यह अपने आप साबित नहीं होता कि वह परिवार की सभी जरूरतें पूरी कर पा रहा है।यदि उसी व्यक्ति को अगले महीने काम नहीं मिलता या परिवार में किसी सदस्य के इलाज पर अचानक खर्च बढ़ जाता है, तो उसकी आर्थिक स्थिति फिर बिगड़ सकती है। पर्याप्त बचत और सामाजिक सुरक्षा न होने पर ऐसी छोटी-सी परेशानी भी परिवार को कर्ज के बोझ में डाल सकती है। यही कारण है कि गरीबी से बाहर निकलने के साथ आर्थिक स्थिरता हासिल करना भी जरूरी है।इस स्थिति में उन परिवारों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जो गरीबी रेखा से थोड़ा ऊपर हैं, लेकिन जिनकी आमदनी अनियमित है। इनके लिए बेहतर रोजगार, उचित मजदूरी, सस्ता इलाज, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा की सुविधाएं महत्वपूर्ण हैं। इन व्यवस्थाओं के बिना गरीबी में गिरावट का लाभ लंबे समय तक कायम रखना कठिन हो सकता है।

 कुपोषण और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं

गरीबी का असर केवल आमदनी और आवास तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। पर्याप्त भोजन नहीं मिलने, पौष्टिक आहार की कमी और समय पर इलाज न मिल पाने से बच्चों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार कई बार भोजन और दवाइयों के बीच चुनाव करने को मजबूर हो जाते हैं।प्रस्तुत रिपोर्ट में बच्चों में कुपोषण, कम वजन और प्रजनन आयु की महिलाओं में खून की कमी से जुड़े गंभीर आंकड़ों का उल्लेख किया गया है। ये संकेत बताते हैं कि आर्थिक प्रगति के साथ पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर लगातार ध्यान देने की आवश्यकता है। बच्चों को पर्याप्त पौष्टिक भोजन और महिलाओं को उचित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना गरीबी दूर करने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।स्वास्थ्य संबंधी परेशानी किसी परिवार की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर सकती है। बीमारी के कारण काम छूटने, दवाइयों पर खर्च बढ़ने और अस्पताल आने-जाने में पैसा लगने से बचत समाप्त हो सकती है। इसलिए सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं और प्रभावी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं परिवारों को दोबारा गरीबी में जाने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

सामाजिक सुरक्षा का विस्तार, लेकिन अभी और काम जरूरी

भारत में बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा के विस्तार के लिए कई योजनाएं चलाई गई हैं। बिजली, सड़क, स्वच्छता और आवास से जुड़ी सुविधाओं में सुधार ने अनेक परिवारों के जीवन को प्रभावित किया है। प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, सामाजिक सुरक्षा का दायरा वर्ष 2016 के 22 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2025 में 64.3 प्रतिशत हो गया।बहुआयामी गरीबी से करोड़ों लोगों का बाहर निकलना भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे संकेत मिलता है कि सरकारी योजनाओं, बुनियादी ढांचे और सामाजिक सहायता के विस्तार से लोगों की परिस्थितियों में बदलाव आया है। हालांकि, योजनाओं की वास्तविक सफलता इस बात से भी तय होती है कि जरूरतमंद लोगों को समय पर लाभ मिल रहा है या नहीं और उनकी जीवन संबंधी समस्याएं कितनी कम हुई हैं।आगे की चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंचे। लोगों को केवल गरीबी रेखा से ऊपर लाना ही नहीं, बल्कि उन्हें स्थायी रोजगार, पर्याप्त आमदनी, बेहतर शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराना भी जरूरी है। इससे परिवार आर्थिक झटकों का सामना करने में सक्षम होंगे और उनकी स्थिति लंबे समय तक बेहतर बनी रह सकेगी।

आखिर गरीबी घटने के बावजूद मुश्किलें क्यों बनी हुई हैं

भारत में गरीबी के कई मानकों में सुधार हुआ है, लेकिन इन आंकड़ों और आम लोगों के जीवन के अनुभवों के बीच अंतर को समझना जरूरी है। आय में थोड़ी वृद्धि, अस्थायी रोजगार या किसी एक बुनियादी सुविधा का मिलना परिवार की सभी समस्याओं को समाप्त नहीं करता। महंगाई, कम वेतन, अनिश्चित रोजगार और स्वास्थ्य संबंधी खर्च आर्थिक सुरक्षा को कमजोर कर सकते हैं।गरीबी कम करने के लिए आय आधारित आंकड़ों के साथ लोगों के वास्तविक जीवन स्तर का भी आकलन होना चाहिए। नियमित रोजगार, उचित मजदूरी, पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच को प्राथमिकता देना आवश्यक है। जब परिवार अपनी जरूरतें पूरी करने के साथ कुछ बचत भी कर पाएंगे, तभी गरीबी से बाहर निकलने का लाभ अधिक स्थायी होगा।

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