इसरो के पहले चेयरमैन कौन थे और कितनी मिलती थी सैलरी जानिए अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक की कहानी
डॉ. विक्रम साराभाई को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है। उन्होंने इसरो की नींव रखी और केवल एक रुपये वेतन लेने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। उनकी दूरदृष्टि ने भारत को अंतरिक्ष विज्ञान में नई पहचान दिलाई।
दि राइजिंग न्यूज डेस्क | 4 मई 2026
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत जिन महान वैज्ञानिक के प्रयासों से हुई, उनका नाम डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई है। उन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। उन्होंने उस समय देश के लिए बड़ा सपना देखा जब भारत तकनीक और संसाधनों की कमी से जूझ रहा था। उनकी सोच ने ही आगे चलकर इसरो जैसी संस्था को जन्म दिया। आज भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियों की नींव उन्हीं के प्रयासों पर टिकी है।
इसरो की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका
डॉ. विक्रम साराभाई ने वर्ष उन्नीस सौ बासठ में अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़ी एक समिति के गठन में अहम भूमिका निभाई। यही संस्था आगे चलकर इसरो के रूप में विकसित हुई। उनका उद्देश्य था कि भारत भी अंतरिक्ष विज्ञान में आत्मनिर्भर बने। उन्होंने शुरुआत से ही इसे देश के विकास से जोड़कर देखा। उनकी दूरदृष्टि ने भारत को एक नई वैज्ञानिक दिशा दी।
अंतरिक्ष विज्ञान को विकास से जोड़ा
डॉ. साराभाई का मानना था कि अंतरिक्ष विज्ञान केवल रॉकेट या उपग्रह तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग देश के आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में होना चाहिए। उन्होंने मौसम की जानकारी, कृषि सुधार और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों पर जोर दिया। शिक्षा और संचार व्यवस्था को बेहतर बनाने में भी उन्होंने इसकी भूमिका समझाई। उनकी सोच उस समय काफी आगे की मानी जाती थी।
वेतन में लिया ऐतिहासिक निर्णय
डॉ. विक्रम साराभाई ने अपने पद के लिए केवल एक रुपये वेतन लेने का निर्णय लिया था। यह कोई सरकारी नियम नहीं था, बल्कि उनका व्यक्तिगत विचार था। वे मानते थे कि देश सेवा का असली उद्देश्य पैसा नहीं बल्कि योगदान होता है। उनके लिए जिम्मेदारी और मेहनत सबसे महत्वपूर्ण थी। यह निर्णय आज भी प्रेरणा का स्रोत माना जाता है।
वैज्ञानिक संस्थाओं की स्थापना में योगदान
उन्होंने अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना की, जिसे विज्ञान की नींव माना जाता है। इसके अलावा उन्होंने कई शैक्षणिक और वैज्ञानिक संस्थानों के निर्माण में भी योगदान दिया। उनका उद्देश्य भारत में वैज्ञानिक सोच को मजबूत करना था। उन्होंने युवा वैज्ञानिकों को आगे बढ़ने के अवसर दिए। उनके प्रयासों से भारत में वैज्ञानिक आधार मजबूत हुआ।
अंतरिक्ष कार्यक्रम के शुरुआती वर्ष
डॉ. साराभाई ने वर्ष उन्नीस सौ तिरसठ से अंतरिक्ष कार्यक्रम की जिम्मेदारी संभाली। उनके नेतृत्व में भारत ने शुरुआती अंतरिक्ष प्रयोग शुरू किए। केरल के थुंबा क्षेत्र से रॉकेट प्रक्षेपण की शुरुआत की गई। यह भारत के अंतरिक्ष इतिहास का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इन प्रयोगों ने भविष्य की बड़ी उपलब्धियों की नींव रखी।
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक क्यों कहा जाता है
डॉ. विक्रम साराभाई को यह उपाधि उनकी दूरदृष्टि और योगदान के कारण दी गई। उन्होंने भारत को यह विश्वास दिलाया कि देश अंतरिक्ष क्षेत्र में भी आगे बढ़ सकता है। उनकी सोच ने विज्ञान को आम जनता से जोड़ा। उन्होंने अंतरिक्ष तकनीक को विकास का साधन बनाया। आज भी उनकी विरासत भारत के अंतरिक्ष मिशनों में दिखाई देती है
इसरो की नींव और विक्रम साराभाई का योगदान
डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक माना जाता है और उन्होंने इसरो की नींव रखने में सबसे अहम भूमिका निभाई। उस समय भारत के पास सीमित संसाधन थे, फिर भी उन्होंने देश को अंतरिक्ष विज्ञान की दिशा में आगे बढ़ाया। उनकी सोच यह थी कि अंतरिक्ष तकनीक केवल अनुसंधान तक सीमित न रहे, बल्कि इसका सीधा लाभ आम लोगों तक पहुंचे। इसी विचार ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को मजबूत आधार दिया।
विज्ञान को विकास से जोड़ने की दूरदर्शी सोच
डॉ. साराभाई ने अंतरिक्ष विज्ञान को देश के विकास से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने मौसम पूर्वानुमान, कृषि सुधार और संचार व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में इसके उपयोग को बढ़ावा दिया। उनका मानना था कि विज्ञान का असली उद्देश्य समाज को लाभ पहुंचाना है। यह सोच उस समय बेहद आधुनिक और दूरदर्शी मानी जाती थी।
संस्थाओं की स्थापना और वैज्ञानिक आधार का निर्माण
उन्होंने अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना में योगदान दिया। इसके अलावा कई वैज्ञानिक और शैक्षणिक संस्थानों को विकसित करने में भी उनकी भूमिका रही। उनका उद्देश्य भारत में मजबूत वैज्ञानिक आधार तैयार करना था। उन्होंने युवा वैज्ञानिकों को आगे बढ़ने का अवसर भी दिया।
एक रुपये वेतन और निस्वार्थ सेवा का उदाहरण
डॉ. विक्रम साराभाई ने अपने पद के लिए केवल एक रुपये वेतन लेने का निर्णय लिया था। यह उनके देश सेवा के प्रति समर्पण को दर्शाता है। वे मानते थे कि सेवा का असली मूल्य धन नहीं बल्कि योगदान होता है। यह निर्णय आज भी उनके आदर्श व्यक्तित्व की पहचान माना जाता है।
अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआती नींव
उन्होंने 1960 के दशक में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की जिम्मेदारी संभाली और शुरुआती रॉकेट परीक्षणों की शुरुआत करवाई। केरल के थुंबा क्षेत्र से पहले प्रयोगात्मक प्रक्षेपण किए गए। इन प्रयासों ने भारत को भविष्य के बड़े अंतरिक्ष मिशनों के लिए तैयार किया। यह चरण भारतीय अंतरिक्ष इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
डॉ. विक्रम साराभाई केवल एक वैज्ञानिक नहीं बल्कि भारत के वैज्ञानिक भविष्य के निर्माता थे। उन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के देश के लिए काम किया। उनके प्रयासों ने इसरो जैसी विश्वस्तरीय संस्था को जन्म दिया। उनका जीवन आज भी वैज्ञानिकों और युवाओं के लिए प्रेरणा है। भारत की अंतरिक्ष सफलता उनकी दूरदृष्टि का परिणाम है।