जलालपुर में 30 साल से जीत को तरस रही भाजपा:2027 में रिकॉर्ड बदलने की चुनौती, 2022 में सपा और बसपा से पिछड़ी भाजपा

Oct 16, 2026 - 07:39
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जलालपुर में 30 साल से जीत को तरस रही भाजपा:2027 में रिकॉर्ड बदलने की चुनौती, 2022 में सपा और बसपा से पिछड़ी भाजपा
प्रदेश की सत्ता और संगठन में मजबूत मौजूदगी के बावजूद भाजपा के लिए अम्बेडकरनगर की जलालपुर विधानसभा सीट लंबे समय से सियासी चुनौती बनी हुई है। पार्टी यहां करीब तीन दशक से जीत दर्ज नहीं कर सकी है। भाजपा ने आखिरी बार 1996 में इस सीट पर जीत हासिल की थी। उस चुनाव में शेर बहादुर सिंह विधायक बने थे। इसके बाद चुनाव दर चुनाव समीकरण और प्रत्याशी बदलते रहे, लेकिन भाजपा जीत की दहलीज पार नहीं कर सकी। अब 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के सामने इस पुराने चुनावी रिकॉर्ड को बदलने की चुनौती होगी। भाजपा की राह नहीं हुई आसान जलालपुर का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां मुकाबला केवल पार्टी के नाम पर तय नहीं होता। प्रत्याशी का स्थानीय प्रभाव, जातीय समीकरण और राजनीतिक परिस्थितियां भी नतीजों में अहम भूमिका निभाती रही हैं। वर्ष 2002 में सपा के राकेश पांडेय ने जीत दर्ज की। 2007 में बसपा के शेर बहादुर विधायक बने, जबकि 2012 में उन्होंने सपा के टिकट पर जीत हासिल की। 2017 में बसपा के रितेश पांडेय ने भाजपा के डॉ. राजेश सिंह को 13,030 मतों से हराया। भाजपा मुकाबले में रही, लेकिन जीत उससे दूर रही। 2022 में भी सपा-बसपा से पिछड़ी भाजपा वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा अपनी स्थिति नहीं सुधार सकी। सपा के राकेश पांडेय को 93,668 वोट मिले, जबकि बसपा के डॉ. राजेश सिंह ने 80,038 और भाजपा के सुभाष चंद्र राय ने 71,236 मत हासिल किए। नतीजों में सपा पहले, बसपा दूसरे और भाजपा तीसरे स्थान पर रही। इन आंकड़ों से साफ है कि जलालपुर में सपा और बसपा की चुनावी मौजूदगी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती रही है। हालांकि, चुनावी हार के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। संगठन की ताकत को वोटों में बदलना होगी चुनौती 2027 के चुनाव से पहले भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल संगठन की सक्रियता को चुनावी समर्थन में बदलने का होगा। बूथ स्तर पर मजबूती, स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय, प्रभावी प्रत्याशी का चयन और मतदाताओं के बीच लगातार मौजूदगी पार्टी की रणनीति के अहम हिस्से होंगे। स्थानीय मुद्दों पर निरंतर काम करना भी जरूरी होगा, ताकि पार्टी की पकड़ केवल चुनावी गतिविधियों तक सीमित न रहे। सपा-बसपा की भूमिका भी तय करेगी मुकाबले की दिशा दूसरी ओर, सपा के सामने अपनी मौजूदा पकड़ बनाए रखने की चुनौती होगी, जबकि बसपा का प्रदर्शन भी चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में भाजपा को विपक्षी दलों के साथ-साथ अपने पिछले चुनावी प्रदर्शन को भी ध्यान में रखना होगा। करीब तीन दशक से जीत का इंतजार कर रही पार्टी के लिए 2027 का चुनाव अहम होगा। प्रत्याशी, संगठन की रणनीति और स्थानीय समीकरण तय करेंगे कि जलालपुर में कमल खिलता है या भाजपा का इंतजार और लंबा होता है।

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