काशी के पिशाचमोचन तीर्थ कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध का विधान:पुरोहित बोले-पीपल के पेड़ पर फोटो लगाकर पितरों को 'बैठाया' जाता है
पिशाचमोचन तीर्थ में पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण कराने के लिए रोजाना 25 हजार से अधिक लोग पहुंच रहे हैं। यहां पुरखों की शांति और अकाल मृत्यु से मुक्ति के लिए अलग-अलग विधानों के तहत श्राद्धकर्म कराया जाता है। इनमें नारायण बलि, त्रिपिंडी श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, तर्पण और गया श्राद्ध प्रमुख हैं। अकाल मौत के मामलों में नारायण बलि को सबसे महत्वपूर्ण और महंगा अनुष्ठान माना जाता है। मान्यता है कि यदि परिवार में एक से अधिक लोगों की अकाल मृत्यु हुई है तो प्रत्येक मृतक के लिए अलग-अलग नारायण बलि कराई जाती है। यानी पांच लोगों की अकाल मृत्यु होने पर पांचों के लिए अलग अनुष्ठान कराया जाएगा और प्रत्येक के लिए निर्धारित खर्च देना होगा। अब सबसे अधिक भीड़ 10 अक्टूबर को पितृ विसर्जन के दिन होने वाली है। नारायण बलि से लेकर तर्पण तक, ऐसे होता है श्राद्धकर्म पिशाचमोचन में आने वाले लोगों में बड़ी संख्या उन परिवारों की होती है, जिनके किसी सदस्य की मृत्यु अचानक या असामयिक परिस्थितियों में हुई हो। मान्यता के अनुसार ऐसी मृत्यु के बाद आत्मा को शांति नहीं मिलती और पितृदोष या प्रेत बाधा जैसी समस्याएं बनी रह सकती हैं। इसी मान्यता के तहत यहां विशेष श्राद्धकर्म कराया जाता है। नारायण बलि के साथ त्रिपिंडी श्राद्ध और तर्पण जैसे अनुष्ठान कराए जाते हैं। पंडितों की देखरेख में पिंडदान और तर्पण की प्रक्रिया पूरी की जाती है। एक तर्पण में करीब डेढ़ से दो घंटे तक का समय लग जाता है। श्राद्ध की प्रक्रिया पूरी होने के बाद यहां दो परंपराओं को खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जाता है। पहली परंपरा संजाब नस्ल के शक्ति नामक घोड़े का कान छूना और दूसरी पीपल के पेड़ पर अकाल मृत्यु वाले व्यक्ति की फोटो फ्रेम लगाना है। पीपल के पेड़ पर फोटो लगाकर पितरों को 'बैठाया' जाता है पिशाचमोचन क्षेत्र में करीब 10 से 15 पीपल के पेड़ बताए जाते हैं। इन पर अकाल मौत वाले लोगों की तस्वीरों के फ्रेम लगे दिखाई देते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार फोटो फ्रेम लगाने के बाद मृतक की आत्मा को यहां स्थान दिया जाता है। कई जगह फोटो फ्रेम को पीपल के पेड़ पर कील से लगाया जाता है। यह भी श्राद्ध पूजा के पैकेज में शामिल बताया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार इन पेड़ों पर करीब 500 तस्वीरें लगी हुई हैं। पंडित अमित मिश्रा बताते हैं कि यहां उन लोगों की तस्वीरें लगाई जाती हैं, जिन्हें स्थानीय मान्यता में 'उद्दंड आत्मा' माना जाता है। यानी ऐसे लोग जिनकी मृत्यु अचानक हुई और जिन्हें शांति नहीं मिली। गरीब हो या अमीर, पिंडदान के लिए एक ही जगह पिशाचमोचन में पितृपक्ष के दौरान गरीब और संपन्न परिवार एक ही जगह बैठकर पिंडदान और तर्पण कराते नजर आते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां आम परिवारों के साथ नेता, जज, फिल्म जगत से जुड़े लोग और बड़े कारोबारी परिवार भी श्राद्ध कराने पहुंचते हैं। एक मृतक के श्राद्ध और तर्पण का खर्च सामान्य तौर पर 15 से 20 हजार रुपये तक पहुंचता है। कुछ मामलों में यह खर्च 30 हजार रुपये या उससे अधिक भी हो जाता है। भीड़ इतनी अधिक होती है कि केवल कुंड के आसपास ही नहीं, बल्कि आसपास के पांच-छह भवनों में भी एक साथ श्राद्धकर्म कराया जाता है। घोड़े के साथ भैंस की सींग और गाय की पूंछ छूने की भी परंपरा पिशाचमोचन की श्राद्ध परंपराओं में घोड़े का कान छूने के अलावा भैंस की सींग और गाय की पूंछ छूने की भी मान्यता बताई जाती है। इसके बाद पितरों के नाम पर नियमित दान करने की परंपरा है। मान्यता रखने वाले लोग इसे पितरों की शांति और प्रेत बाधा से मुक्ति की प्रक्रिया का हिस्सा मानते हैं। पिशाचमोचन में मुन्ना पंडा के परिवार को प्रमुख महंत परिवार माना जाता है। पितृपक्ष के 15 दिनों में यहां करीब 400 पंडे अलग-अलग परिवारों का श्राद्ध और तर्पण कराते हैं।
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