काशी में 10 हजार अजन्मी बेटियों का पिंडदान:दशाश्वमेध घाट पर गूंजा कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ संदेश,13 साल में किया 1.60 लाख पिंडदान
पितृपक्ष की मातृ नवमी पर काशी के दशाश्वमेध घाट पर ‘आगमन सामाजिक संस्था’ की ओर से कोख में मारी गईं अजन्मी बेटियों की आत्मा की शांति के लिए करीब 10 हजार पिंडों का पिंडदान और तर्पण किया गया। अनुष्ठान का नेतृत्व संस्था के संस्थापक सचिव डॉ. संतोष ओझा ने किया। वैदिक आचार्यों के सानिध्य में वेद मंत्रोच्चार के बीच पिंडदान, तर्पण, पंचबलि और ब्राह्मण भोज कराया गया। गंगा की मिट्टी से बनाई गई वेदी अनुष्ठान के लिए गंगा की मिट्टी से विशेष पिंड वेदी तैयार की गई। गंगाजल, कुशा और अग्नि से भूमि संस्कार के बाद संकल्प और आवाहन की प्रक्रिया पूरी हुई। अजन्मी बेटियों के प्रतीक स्वरूप तैयार किए गए पिंडों का विधिवत पूजन किया गया। पिंड बनाने में जौ का आटा, जौ-तिल, शहद, घी, शक्कर, दूध और गंगाजल का इस्तेमाल किया गया। पिंडों पर चंदन, फूल-माला, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित कर उनकी सद्गति की कामना की गई। इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख कर तर्पण किया गया और अंत में पिंडों को गंगा में विसर्जित किया गया। समाज को जगाना है डॉ. संतोष ओझा ने कहा कि यह आयोजन केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ सामाजिक जागरूकता का अभियान है। उन्होंने कहा, पिंडदान तो एक बहाना है, असल में अंधे मां-बाप और सोए हुए समाज को जगाना है। उन्होंने कहा कि बेटियों को देवी और लक्ष्मी का स्वरूप मानने वाले समाज में कोख में उनकी हत्या गंभीर सामाजिक विडंबना है। 13वां वार्षिक आयोजन, 1.60 लाख से अधिक पिंडदान का दावा आयोजकों के अनुसार, ‘आगमन सामाजिक संस्था’ वर्ष 2001 से महिला सशक्तीकरण और कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ जनजागरण अभियान चला रही है। यह संस्था का 13वां वार्षिक पिंडदान अनुष्ठान था। संस्था का दावा है कि पिछले 12 वर्षों में 1.50 लाख से अधिक अजन्मी बेटियों के लिए तर्पण किया जा चुका है। इस वर्ष 10 हजार पिंडों के साथ यह संख्या 1.60 लाख से अधिक हो गई है।
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