काशी से 300 विदेशी श्रद्धालुओं ने किया ऑनलाइन पिंडदान:मॉरीशस के स्वामी अरुणानंद गिरी महाराज ने कराया पूजन, राजदूत भी हुए शामिल

Oct 09, 2026 - 06:22
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काशी से 300 विदेशी श्रद्धालुओं ने किया ऑनलाइन पिंडदान:मॉरीशस के स्वामी अरुणानंद गिरी महाराज ने कराया पूजन, राजदूत भी हुए शामिल
पितृ पक्ष के दौरान इस बार काशी के गंगा घाटों से दुनिया भर के सनातन धर्मावलंबी ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। मॉरीशस, इटली, इंग्लैंड, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका और थाईलैंड समेत कई देशों के 300 से अधिक श्रद्धालुओं ने वीडियो कॉल के जरिए अपने पितरों का तर्पण और पिंडदान कराया। काशी में पुरोहितों ने घाट पर बैठकर विधि-विधान से अनुष्ठान संपन्न कराया, जबकि विदेशों में बैठे श्रद्धालुओं ने ऑनलाइन संकल्प लेकर पूजा में सहभागिता की। मॉरीशस से काशी पहुंचे स्वामी अरुणानंद गिरी ने बताया- विदेशों में रहने वाले सनातन धर्मावलंबियों को पितृ कर्म के महत्व की जानकारी करीब 6 माह पहले से दी जाती है। इसके लिए पंजीकरण की व्यवस्था की जाती है, जिसके बाद श्रद्धालुओं को समूहों में विभाजित कर ऑनलाइन माध्यम से पूजा कराई जाती है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष मॉरीशस से करीब 250 श्रद्धालु, इटली के मिलान से 50 और इंग्लैंड से लगभग 20 श्रद्धालु ऑनलाइन जुड़े। इसके अलावा फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका के डरबन और थाईलैंड सहित कई देशों के लोगों ने भी काशी में आयोजित पितृ कर्म में भाग लिया। पहले ली जाती है कर्ता और पितरों की पूरी जानकारी ऑनलाइन पितृ कर्म शुरू होने से पहले कर्ता (श्रद्धालु) का नाम, गोत्र, स्थान, पितर का नाम, उनसे संबंध और श्राद्ध की तिथि जैसी जानकारी ली जाती है। इसके बाद काशी के पुरोहित के साथ Zoom या वीडियो कॉल का समय तय किया जाता है। निर्धारित समय पर विदेश या दूसरे शहर में बैठा परिवार वीडियो कॉल से जुड़ता है। काशी के घाट पर पुरोहित पूजा की व्यवस्था करते हैं और कैमरे के जरिए पूरी प्रक्रिया श्रद्धालुओं को दिखाई जाती है। विदेश में बैठे श्रद्धालु सिर्फ संकल्प और मंत्र दोहराते हैं पूजा के दौरान श्रद्धालु अपने घर से वीडियो कॉल पर जुड़े रहते हैं। उन्हें हाथ जोड़कर पूजा में शामिल होना होता है। काशी के पुरोहित जो मंत्र या संकल्प बोलने के लिए कहते हैं, श्रद्धालु उसे दोहराते हैं। पुरोहित श्रद्धालु का नाम, गोत्र और पितरों का नाम लेकर संकल्प कराते हैं। इस दौरान श्रद्धालु स्वयं अपने पूर्वजों का नाम लेते हैं। इसके बाद काशी में मौजूद पुरोहित विधि-विधान से पिंडदान, तर्पण और अन्य पितृ कर्म कराते हैं। अंत में मां गंगा के जल में तर्पण कराया जाता है। इस तरह पूजा का मुख्य अनुष्ठान काशी में होता है और विदेश में बैठे श्रद्धालु वीडियो कॉल के जरिए उसमें सहभागी बनते हैं। 250 मॉरीशस से, 50 मिलान और 20 इंग्लैंड से जुड़े स्वामी अरुणानंद गिरी के अनुसार, मॉरीशस से करीब 250 श्रद्धालु ऑनलाइन जुड़े। इटली के मिलान से करीब 50 और इंग्लैंड से लगभग 20 श्रद्धालुओं ने भी काशी में हो रहे पितृ कर्म में हिस्सा लिया। इनके अलावा फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड समेत दूसरे देशों से भी श्रद्धालु जुड़े। विदेश में रहने वाले श्रद्धालुओं की ओर से काशी में उनके प्रतिनिधि पितृ तर्पण और पिंडदान की प्रक्रिया पूरी कराते हैं। ऑनलाइन जुड़े परिवार संकल्प और पूजा के निर्धारित हिस्से में खुद शामिल होते हैं। चार प्रमुख तीर्थों में पितृ कर्म का महत्व बताया स्वामी अरुणानंद गिरी ने बताया कि विदेशों में रहने वाले कई लोगों को पितृ कर्म की परंपराओं की पूरी जानकारी नहीं होती। उन्हें बताया जाता है कि धार्मिक परंपरा में हरिद्वार, प्रयागराज, काशी और गया जैसे तीर्थों का पितृ कर्म के लिए विशेष महत्व माना जाता है। इसी परंपरा के तहत विदेशों में रहने वाले श्रद्धालुओं के प्रतिनिधि के रूप में इन तीर्थों में पितृ तर्पण और पिंडदान कराया जाता है। काशी में मां गंगा के तट पर तर्पण के दौरान श्रद्धालु ऑनलाइन अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं। दक्षिण दिशा की ओर मुख कर तर्पण की परंपरा पितृ तर्पण के लिए धार्मिक परंपरा में विशेष विधि बताई गई है। जिस तिथि को किसी परिजन का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है। मृत्यु तिथि की जानकारी न होने पर सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। तर्पण से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तांबे या पीतल के पात्र में जल लिया जाता है। इसमें गंगाजल, गाय का कच्चा दूध, काले तिल, अक्षत, जौ और सफेद फूल मिलाने की परंपरा है। कुश की पवित्री धारण कर अंगूठे के मूल भाग यानी पितृ तीर्थ से जल अर्पित किया जाता है। गोत्र और पूर्वजों का स्मरण करते हुए प्रत्येक पितर के निमित्त तीन बार जलांजलि देने की परंपरा है। पंचबलि के बाद भोजन और दक्षिणा तर्पण के बाद पंचबलि की परंपरा निभाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भोजन के पांच हिस्से अलग कर गाय, कुत्ते, कौए, देवादि और चींटियों के लिए अन्न अर्पित किया जाता है। इसके बाद किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को सात्विक भोजन कराया जाता है। सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र और दक्षिणा देने की भी परंपरा है।

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