केवट ने प्रभु श्रीराम को पार कराई गंगा, पखारे पैर:धनेसरा तालाब बना पावन गंगा तट, घंडईल से चित्रकूट तक की लीला जीवंत
मोक्षदायिनी और पतित-पावनी मां गंगा एक बार फिर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के पावन वनवास काल की साक्षी बनी हैं। श्री आदि रामलीला लाट भैरव वरुणा संगम काशी की भव्य रामलीला के अंतर्गत गुरुवार की रात 8 बजे राम घंडईल लीला के पावन स्थल धनेसरा तालाब पर अद्भुत दृश्य देखने को मिला। जिसे इस पावन प्रसंग के लिए मां गंगा का स्वरूप प्रदान किया गया था। राम वनवास के इस अत्यंत मार्मिक और भक्तिपूर्ण प्रसंग को देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। जैसे ही प्रभु श्री राम, माता सीता और भईया लक्ष्मण के साथ गंगा तट पर पहुंचे, पूरा माहौल 'जय श्री राम' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। राम-केवट संवाद से सजल हुईं आंखें
गुरुवार के प्रसंग में जब श्री राम ने गंगा पार जाने के लिए केवट से नौका तैयार करने को कहा, तो केवट के परम सौभाग्य की गाथा जीवंत हो उठी। रामचरितमानस के इस दृश्य को मंचित करते हुए कलाकारों ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। ज्ञानी ऋषि-मुनि और तपस्वी जिस परम ब्रह्म के दर्शन और सानिध्य के लिए युगों-युगों तक कठिन तपस्या करते हैं, वह देव-दुर्लभ अवसर केवट के अनुग्रह पर प्रभु श्री राम ने बड़े ही सहज भाव से प्रदान कर दिया। धनेसरा तालाब के घाट पर केवट और राम का संवाद सुन भक्तों की आंखें सजल हो उठीं। ‘कहीं काठ की नैया सुंदर स्त्री न बन जाए…?’
भावातुर केवट ने प्रभु श्री राम के सामने नैया पर बैठाने से पूर्व एक बड़ी ही अनूठी और भोली शर्त रख दी। केवट ने हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु! मैं बिना आपके चरणों को पखारे (धोए) अपनी नाव पर नहीं बैठाऊंगा। मैंने इन चरणों की धूल की महिमा बहुत सुनी है, जिसने एक पत्थर की शिला को सुंदर स्त्री (अहिल्या) बना दिया था। कहीं मेरी यह काठ की नैया भी सुंदर स्त्री बनकर आकाश में उड़ गई, तो मैं अपने परिवार को पालने के लिए दूसरा साधन कहाँ से लाऊँगा?" केवट के इस निश्छल प्रेम और वाक्चातुर्य को देखकर प्रभु श्री राम मंद-मंद मुस्कुराए। इसके बाद केवट ने अत्यंत श्रद्धा से प्रभु के चरण धोए और उस चरणामृत का सपरिवार पान कर भवसागर से पार होने का आशीर्वाद पाया। भरद्वाज आश्रम में लिया आशीर्वाद
गंगा पार करने के बाद लीला का क्रम आगे बढ़ा, जहां श्री राम ने देवाधिदेव महादेव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इसके उपरांत वे महर्षि भरद्वाज मुनि के आश्रम पहुंचे और उनका आशीर्वाद ग्रहण किया। यहां से प्रभु लाट भैरव फर्श के लिए प्रस्थान करते हैं, जिसे लीला की दृष्टि से पावन चित्रकूट धाम का स्वरूप दिया गया था। मार्ग में प्रभु का सामना वहां के मूल निवासी कोल-भील आदि वनवासियों से होता है। वनवासियों और श्री राम के बीच का आत्मीय मिलन देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो गया। इसी क्रम में अयोध्या में राजा दशरथ के मरण की अत्यंत जीवंत और शोकपूर्ण लीला का मंचन भी किया गया, जिसने दर्शकों को रुला दिया। आज भरत मनाएंगे भईया राम को
लीला समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि घंडईल से लेकर चित्रकूट तक की सभी लीलाएं अत्यंत भव्यता के साथ संपन्न हो चुकी हैं। इसी श्रृंखला में शुक्रवार को एक और बेहद भावुक कर देने वाले प्रसंग का मंचन किया जाएगा। शुक्रवार को भईया भरत अपने आराध्य और बड़े भाई श्री राम को मनाने के लिए, उनके राज्याभिषेक की समस्त सामग्रियों और समस्त अयोध्यावासियों के साथ सज-धजकर वन की ओर गमन करेंगे। समिति ने सभी धर्मप्रेमियों से इस अलौकिक दृश्य का साक्षी बनने की अपील की है।
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