लेखिकाओं ने स्त्री लेखन पर विचार साझा किए:लखनऊ में जनवादी लेखक संघ ने दो दिन की राष्ट्रीय कार्यशाला में किया मंथन
लखनऊ में स्त्री के अनुभव, भाषा और लेखन की पहचान पर दो दिन तक साहित्यकारों ने मंथन किया। जनवादी लेखक संघ की ओर से 3 और 4 अक्टूबर को स्थानीय होटल में ‘स्त्री लेखन: इतिहास, रचना प्रक्रिया और आलोचना’ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला हुई। इसमें आठ राज्यों से आईं 51 लेखिकाओं ने विचार और अनुभव साझा किए। उद्घाटन सत्र में रोहतक की कवयित्री शुभा ने ‘स्त्री लेखन : परंपरा और इतिहास’ पर वक्तव्य दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस की प्रोफेसर और ‘आलोचना’ पत्रिका की संपादक बलवंत कौर ने बीज वक्तव्य रखा। मैं क्यों लिखती हूं... पर चर्चा पहले दिन ‘जीवन स्मृति और साहित्य : मैं क्यों लिखती हूं’ विषय पर रोहतक की दीपा और हिसार की कवयित्री विपिन चौधरी ने विचार रखे। ‘स्त्री दृष्टि : कौन बोल रहा?’ पर गोरखपुर की रंजना जायसवाल और दिल्ली की दिव्या तिवारी ने चर्चा की। ‘गीतों में स्त्री’ पर शीला पांडे और ‘गजल में स्त्री’ पर आगरा की अनामिका सिंह ने विचार साझा किए। अंतिम सत्र में 22 कवयित्रियों ने कविता पाठ किया। कहानियों में स्त्री विमर्श पर मंथन दूसरे दिन ‘स्त्री होकर पढ़ना : पाठ, पाठक और पुनर्पाठ’ विषय पर अलवर की योगमाया सैनी, भोजपुर की लक्ष्मी कुमारी और लखनऊ की अनुजा शुक्ला ने विचार रखे। ‘त्रिशंकु’, ‘हरी बिंदी’, ‘बोलने वाली औरत’, ‘सिक्का बदल गया’, ‘मिशन जंगल’ और ‘गिनीपिग’ जैसी कहानियों को स्त्री विमर्श के नजरिए से देखा गया। ‘भाषा, शिल्प और लेखिकीय पहचान’ पर महाराष्ट्र की कल्पना उबाले, कल्पना दिलीप महापुस्कर, बिहार की रूपम कुमारी और बाराबंकी की अलका तिवारी ने विचार रखे। संवाद सत्र में रायपुर, आगरा और लखनऊ की लेखिकाओं ने भाग लिया। आत्मकथा और रचना के रिश्ते पर चर्चा तीसरे सत्र में ‘वंश वृक्ष’, ‘राकिया की अम्मा’, ‘तमाशेवाली’, ‘तुमने कहा था’ और ‘ड्रामा क्वीन’ जैसी कहानियों के जरिए आत्मकथा और रचना के संबंध पर चर्चा हुई। लेखिकाओं ने स्त्री लेखन की भाषा, अनुभव और रचना प्रक्रिया पर अपने विचार साझा किए।
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