मां के मायके आगमन के लिए तैयार दुर्गाबाड़ी:220 साल पुरानी परंपरा के साथ मनेगा दुर्गोत्सव, अष्टमी पर कुमारी पूजा और संधि पूजा रहेगी खास

Oct 13, 2026 - 10:01
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मां के मायके आगमन के लिए तैयार दुर्गाबाड़ी:220 साल पुरानी परंपरा के साथ मनेगा दुर्गोत्सव, अष्टमी पर कुमारी पूजा और संधि पूजा रहेगी खास
मां दुर्गा के मायके आगमन की खुशी में सदर स्थित बंगाली दुर्गाबाड़ी में लगभग तैयारियां पूरी हो गई हैं। यहां 220 साल पुरानी परंपरा के अनुसार दुर्गोत्सव मनाया जाएगा। 16 से 21 अक्टूबर तक चलने वाले उत्सव में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ बंगाली संस्कृति की झलक भी देखने को मिलेगी। मां दुर्गा की प्रतिमा बंगाल से आए कारीगरों ने तैयार की है। इस बार प्रतिमा बनाने में जैविक रंगों और प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया गया है, ताकि विसर्जन के दौरान जल प्रदूषण न हो। समिति के पदाधिकारियों के अनुसार, पूजा की पारंपरिक पद्धति में आज तक कोई बदलाव नहीं किया गया है। जन्माष्टमी पर होती है काठामो की पूजा बंगाली दुर्गाबाड़ी सोसाइटी के अध्यक्ष अमिताभ मुखर्जी ने बताया कि मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए हर साल बंगाल से कारीगर आते हैं। प्रतिमा तैयार करने में करीब 10 से 12 दिन लगते हैं। दुर्गाबाड़ी में एक विशेष मंच है, जिसे काठामो कहा जाता है। जन्माष्टमी के दिन इसकी पूजा की जाती है। इसके बाद इसी ढांचे पर मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार होती है। मां के साथ पूजा कराने वाले पुरोहित भी बंगाल से आते हैं। अष्टमी पर 108 दीपक और कमल के फूलों से होगी पूजा दुर्गोत्सव में रोजाना मां की पूजा-अर्चना होगी। अष्टमी पर कुमारी पूजा और संधि पूजा विशेष आकर्षण रहेंगी। कुमारी पूजा में एक कुंवारी कन्या को मां के स्वरूप में पूजने की परंपरा है। वहीं, अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के शुरुआती 24 मिनट के संधिकाल में संधि पूजा की जाती है। यह पूजा 48 मिनट तक चलती है। इसमें 108 दीपक जलाए जाते हैं और मां को 108 कमल के फूल अर्पित किए जाते हैं। साथ ही 108 जवा फूलों की माला पहनाई जाती है। षष्ठी पर महिलाएं मिलकर बनाएंगी नारियल के लड्डू दुर्गाबाड़ी की परंपराओं में महिलाओं की भागीदारी भी खास है। पूर्व अध्यक्ष और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ीं पापिया ने बताया कि दुर्गा पूजा की तैयारियां करीब डेढ़ महीने पहले शुरू हो जाती हैं। महिलाएं मिलकर पूजा की व्यवस्थाएं संभालती हैं। षष्ठी के दिन सुहागिन महिलाएं एक साथ करीब 100 नारियल के लड्डू तैयार करती हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। मां के आगमन की खुशी में परिवारों में कपड़ों और अन्य तैयारियों का सिलसिला भी कई महीने पहले शुरू हो जाता है। आगमनी गीतों से होगा मां का स्वागत बंगाली परंपरा में मां दुर्गा का अपने मायके आना बेटियों के घर लौटने की खुशी से जुड़ा है। इसी भावना के साथ मां का आह्वान करने की परंपरा को आगमनी कहा जाता है। षष्ठी से धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत होगी। इसमें संस्कृत और बंगाली भाषा में गीत, चंडी पाठ और अन्य प्रस्तुतियां होंगी। सप्तमी से नवमी तक नाटक, गीत और नृत्य के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसके लिए फ्रेंड्स यूनियन ड्रामेटिक क्लब के सदस्य डेढ़ से दो महीने पहले से अभ्यास करते हैं। पांच पीढ़ियों से मेरठ में रह रहे बंगाली परिवार समिति के प्रधान सचिव अभय मुखर्जी ने बताया कि दुर्गाबाड़ी का इतिहास करीब 220 साल पुराना है। बंगाल से मेरठ आए कुछ परिवारों ने यहां दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। बाद में अन्य परिवार भी इससे जुड़ते गए। 1926 में संस्था का पंजीकरण कराया गया और 1931 में वर्तमान भवन का निर्माण हुआ। समय के साथ यहां बंगाली परिवारों की संख्या बढ़ती गई और कई पीढ़ियां मेरठ में ही बस गईं। इसके बावजूद परिवारों ने अपनी भाषा, संस्कृति और पूजा पद्धति को सहेजकर रखा है। सालभर सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां अभय मुखर्जी ने बताया कि दुर्गाबाड़ी सोसाइटी केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। इसकी विभिन्न शाखाएं शिक्षा, साहित्य, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और जरूरतमंदों की सहायता के लिए काम करती हैं। इनमें दुर्गाबाड़ी एबी गर्ल्स इंटर कॉलेज, बंगाली बानी लाइब्रेरी, फ्रेंड्स यूनियन ड्रामेटिक क्लब और सेवा समिति शामिल हैं। नई पीढ़ी भी इन गतिविधियों में भाग ले रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और आधुनिक तकनीक से जुड़ने के बावजूद पारंपरिक रीति-रिवाजों को उसी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।

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