मौत के 'समुद्र' से घर लौटे कानपुर के नितिन:21 जिंदगियों को बचाने की सुनाई दर्द भरी दास्तान, पत्नी-बच्चों से मिलकर छलक पड़े आंसू
समुद्र के बीच चार महीने तक फंसे रहने का डर... जहाज पर ड्रोन हमले की दहशत... हर पल मौत से सामना होने का खौफ... इन सबके बीच एक ही उम्मीद किसी तरह अपने परिवार के पास लौटना है... आखिरकार वह दिन आ गया, जिसका इंतजार कानपुर के श्याम नगर में रहने राजेश शुक्ला का परिवार कर रहा था। मर्चेंट नेवी में करीब 20 साल से नौकरी कर रहे चीफ इंजीनियर नितिन शुक्ला शनिवार को सकुशल घर पहुंचे तो परिवार की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। बेटे को सामने देखकर पिता राजेश शुक्ला भावुक हो गए। मां, पत्नी और बच्चों ने नितिन को गले लगाया तो समुद्र में बिताए खौफनाक दिनों का दर्द आंसुओं के रूप में बाहर आ गया। उनकी पत्नी अंकिता ने छह साल की बेटी शानवी और दो साल के बेटे वरदान ने के साथ मिलकर नितिन का जबरदस्त स्वागत किया। नितिन पनामा के झंडे वाले तेल टैंकर 'एमटी जेम नंबर-2' पर तैनात थे। उनका जहाज पिछले चार महीने से होर्मुज क्षेत्र में फंसा हुआ था। 9 अक्टूबर को जहाज पर ड्रोन हमला हुआ। अगले दिन लगातार कई हमलों के बाद जहाज में आग लग गई। हालात ऐसे हो गए कि जहाज पर मौजूद 22 लोगों को अपनी जान बचाने के लिए लाइफबोट का सहारा लेना पड़ा। नितिन ने पहले अपने 21 साथियों को सुरक्षित निकाला, फिर खुद लाइफबोट में सवार होकर मौत के साए से बाहर निकले। दैनिक भास्कर एप से खास बातचीत में नितिन ने उस खौफनाक मंजर को याद किया तो बताया कि मर्चेंट नेवी में 20 साल की नौकरी के दौरान उन्होंने ऐसा भयावह अनुभव कभी नहीं किया था। अटैक के दो दिन पहले दिखा था ड्रोन नितिन ने बताया कि उनकी ड्यूटी इंजन रूम में थी। 7 अक्टूबर को जहाज के आसपास एक ड्रोन दिखाई दिया था। उसे देखकर लगा कि शायद वह निगरानी करने आया है। कुछ देर बाद ड्रोन वहां से चला गया, लेकिन उसके जाने के बाद भी मन में आशंका बनी रही। कंपनी को इसकी जानकारी दी गई, जिसके बाद जहाज पर सुरक्षा के लिए गार्ड भेजे गए। इसके दो दिन बाद यानी 9 अक्टूबर को जहाज पर कुछ कर्मचारी डेक पर काम कर रहे थे। तभी उन्होंने ड्रोन को आते देखा। कुछ ही देर में ड्रोन ने डेक पर हमला कर दिया। अचानक हुए हमले से जहाज पर अफरातफरी मच गई। जहाज पर क्रूड ऑयल होने के कारण आग लगने का खतरा और भी बढ़ गया था। सभी ने सावधानी बरती और फायर फाइटिंग सिस्टम की मदद से आग पर काबू पा लिया। उस समय लगा कि शायद खतरा टल गया है, लेकिन मन में बैठा डर खत्म नहीं हुआ। नितिन और उनकी टीम जहाज की मशीनरी को हुए नुकसान का आकलन करने और रिपोर्ट तैयार करने में जुट गई। कंपनी से जहाज को पोर्ट पर ले जाने को लेकर भी बातचीत चल रही थी। हालांकि, इसके लिए अनुमति और जरूरी औपचारिकताएं पूरी करनी थीं। डैमेज देखने आई टीम, अगले दिन फिर हुए हमले 10 अक्टूबर को जहाज को हुए नुकसान का जायजा लेने के लिए कोस्ट गार्ड और बम निरोधक टीम भी पहुंची। उम्मीद थी कि नुकसान का आकलन होने के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू होगी, लेकिन शाम करीब 5:30 बजे अचानक हालात बदल गए। नितिन ने बताया कि लगातार चार से पांच हमले हुए। इसके बाद जहाज में आग लग गई। आग इतनी तेजी से फैल रही थी कि उसे काबू करना मुश्किल होता जा रहा था। फायर कंट्रोल स्टेशन से सूचना देकर आग बुझाने की कोशिश की गई, लेकिन हालात बिगड़ते चले गए। नितिन बताते हैं कि यह ड्रोन हमला था या मिसाइल हमला, उस समय यह स्पष्ट कर पाना मुश्किल था। सामने जहाज में फैलती आग थी और पीछे जान बचाने की चुनौती। ऐसे में सबसे जरूरी था कि जहाज पर मौजूद सभी लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जाए। पहले 21 साथियों को लाइफबोट में बैठाया, फिर खुद निकले नितिन ने बताया कि जिस जहाज पर लंबे समय से काम कर रहे थे, वही अब खतरा बन चुका था। कुछ ही देर में फैसला लेना था। ऐसे हालात में घबराने के बजाय अपने साथियों को सुरक्षित निकालने की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने बताया कि पहले 21 क्रू मेंबर्स को लाइफबोट के जरिए बाहर निकाला और फिर खुद उसमें सवार हुए। जहाज से दूर निकलते समय पीछे आग और तबाही का मंजर साफ दिख रहा था। ऐसे में लग रहा था कि किसी भी तरह से सुरक्षित घर पहुंच जाए। नितिन के मुताबिक, लाइफबोट से करीब पांच मील का सफर तय करने में लगभग आधा घंटा लगा। इसके बाद सभी लोग सुरक्षित पोर्ट तक पहुंचे। यूएई कोस्ट गार्ड ने उनका रेस्क्यू किया और मिलिट्री बेस पर ले जाया गया। इसके बाद स्थानीय एजेंसी और कंपनी के अधिकारियों की मदद से सभी 22 लोगों को शारजाह के एक होटल में ठहराया गया। मोबाइल, पासपोर्ट और जरूरी कागजात जहाज में छूट गए हमले के दौरान नितिन और उनके साथियों के मोबाइल फोन, लैपटॉप, पासपोर्ट और दूसरे जरूरी दस्तावेज जहाज पर ही छूट गए थे। ऐसे में सुरक्षित जगह पहुंचने के बाद भी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। घर लौटने के लिए जरूरी कागजात जुटाने थे और औपचारिकताएं पूरी करनी थीं। नितिन ने बताया कि कंपनी और वहां के एजेंट ने मदद की। जरूरी दस्तावेज तैयार होने के बाद ही भारत लौटने का रास्ता साफ हो सका। इस पूरी घटना में परिवार की याद लगातार उनके साथ रही। उन्हें बस किसी तरह कानपुर पहुंचना था, ताकि अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों को सामने देखकर कह सकें कि अब सब ठीक है। पति की आवाज सुनने तक बेचैन रहा परिवार नितिन ने बताया कि हमले के बाद मोबाइल फोन बंद हो गए थे। 10 अक्टूबर को उन्होंने कंपनी से संपर्क कर घरवालों को अपनी सलामती की सूचना देने को कहा। उसी रात करीब 12 बजे उनकी पत्नी अंकिता शुक्ला के पास कंपनी के चंडीगढ़ स्थित कार्यालय से फोन आया था। उन्हें बताया गया कि जहाज पर हमला हुआ है, लेकिन नितिन और उनके सभी साथी सुरक्षित हैं। यह खबर सुनकर परिवार ने राहत की सांस ली, लेकिन पति से बात न होने कि वजह से अंकिता की चिंता बनी रही। 11 अक्टूबर को नितिन ने पत्नी को फोन किया और बताया कि जहाज पर हमला हुआ था, लेकिन सभी लोग सुरक्षित हैं और होटल में ठहरे हुए हैं। नितिन ने बताया कि परिवार को परेशान न होने देने के लिए उन्होंने हादसे की कई बातें भी छिपाईं। वह नहीं चाहते थे कि समुद्र से दूर घर पर बैठा परिवार भी उसी डर में जीने लगे, जिससे वह खुद गुजर रहे थे। 'मर्चेंट नेवी के 20 साल में ऐसा हादसा कभी नहीं देखा' नितिन ने बताया कि हमले के बाद बस यही लग रहा था कि किसी तरह अपने-अपने घर पहुंच जाएं। मर्चेंट नेवी में दो दशक के अनुभव के बावजूद ऐसा हादसा कभी नहीं देखा था। उन्होंने बताया कि जब अपने कई सीनियर से इस घटना के बारे में बात की तो उन्होंने भी इसे बेहद खतरनाक अनुभव बताया। चार महीने तक होर्मुज क्षेत्र में फंसे रहने के बारे में नितिन ने कहा कि उस दौरान समझ नहीं आता था कि आखिर कहां फंस गए हैं और दोनों देशों के बीच क्या चल रहा है। उन्होंने बताया कि बिना अनुमति या तय सुरक्षित रास्ते से हटकर होर्मुज पार करने वाले जहाजों पर हमले का खतरा रहता है। लेकिन उनका जहाज तो एक जगह एंकर डालकर खड़ा था। उन्हें अंदाजा तक नहीं था कि इस तरह के हालात में भी हमला हो सकता है। नितिन बोले- दो-तीन रात नहीं आई नींद शनिवार को जब नितिन श्याम नगर स्थित अपने घर पहुंचे तो परिवार के लिए वह पल किसी नई जिंदगी की शुरुआत जैसा था। जहाज पर हमले की दहशत और चार महीने अपनों से दूर रहने का दर्द एक साथ आंखों से बह निकला। पिता राजेश शुक्ला ने बेटे की वापसी को नवरात्र के पावन दिनों में माता रानी का आशीर्वाद बताया। नितिन ने कहा कि हादसे के बाद दो से तीन दिन तक उन्हें नींद नहीं आई। जहाज में हुए अटैक के बीच सुरक्षित निकलने के पल बार-बार याद आते रहे। ऐसे अनुभव को भूलने में समय लगता है। हालांकि, परिवार के बीच लौटकर अब सुकून मिला है। उन्होंने बताया कि माता-पिता, पत्नी और बच्चों को सामने देखकर सुकून मिल रहा है। दोबारा जहाज पर जाने का फैसला अभी मुश्किल करीब 20 साल से मर्चेंट नेवी में काम कर रहे नितिन के सामने अब आगे की नौकरी को लेकर भी सवाल है। परिवार उन्हें दोबारा जहाज पर भेजने के पक्ष में नहीं है। खुद नितिन भी इस हादसे के बाद तुरंत कोई फैसला लेने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अब इससे ज्यादा बुरा क्या हो सकता है। अभी फैसला लेना कठिन है। परिवार मना कर रहा है कि वापस मत जाओ, लेकिन सबसे पहले जरूरी दस्तावेज बनवाने हैं। आखिर हर चीज के अलग-अलग फेज होते हैं। परिवार के साथ नौकरी भी जरूरी है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)