MLC स्नातक सीट पर भाजपा का ‘बैठक वार’:अलीगढ़ के मानवेंद्र सिंह की वापसी के लिए संगठन मैदान में; सजातीय निर्दलीय अंबरीश पाल सिंह और सपा के शशांक यादव से दोहरी चुनौती
आगरा खंड स्नातक एमएलसी सीट पर भाजपा ने जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। पिछले चार दिनों से पार्टी का चुनावी अभियान बैठकों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। सुबह से देर रात तक जातीय समीकरण साधने से लेकर शिक्षक, डॉक्टर, अधिवक्ता और व्यापारी वर्ग को जोड़ने की कवायद चल रही है। प्रदेश उपाध्यक्ष दुर्विजय सिंह शाक्य अलीगढ़ में डेरा डाले हैं। सांसद, विधायक, एमएलसी और संगठन के पदाधिकारी गली-मोहल्लों से गांवों तक बैठकें कर रहे हैं। घर-घर वोटर पर्चियां पहुंचाने और समर्थकों को बूथ तक लाने की रणनीति पर भी काम हो रहा है।
इस सक्रियता के पीछे दो बड़ी चुनौतियां हैं। भाजपा पिछले चुनाव में पहली बार जीती इस सीट पर कब्जा बरकरार रखना चाहती है, वहीं मौजूदा एमएलसी डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह को अपने ही सजातीय राजा अंबरीश पाल सिंह और समाजवादी पार्टी के शशांक यादव से मुकाबला करना पड़ रहा है। पार्टी के लिए यह चुनाव अब प्रतिष्ठा की परीक्षा बन गया है।
जातीय बैठकों से पेशेवर वर्ग तक, हर मोर्चे पर घेराबंदी
भाजपा ने मतदाताओं तक पहुंचने के लिए अलग-अलग स्तर पर बैठकें शुरू की हैं। अधिवक्ताओं, डॉक्टरों, शिक्षकों और व्यापारियों के साथ संवाद किया जा रहा है। जातीय आधार पर भी बैठकें हो रही हैं। जनप्रतिनिधि और संगठन के पदाधिकारी अलग-अलग जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं, जबकि बूथ स्तर पर समर्थकों से संपर्क और वोटर पर्चियां बांटने का अभियान जारी है।
पार्टी का जोर केवल समर्थन जुटाने पर नहीं, बल्कि समर्थक मतदाताओं को मतदान केंद्र तक पहुंचाने पर है। अलीगढ़ में अलग टीम लगाई गई है, जबकि दूसरे जिलों में संगठनात्मक टीमें काम कर रही हैं। भाजपा की रणनीति का केंद्र अलीगढ़ है, जहां मतदाताओं की संख्या इस सीट के अन्य जिलों के मुकाबले सर्वाधिक बताई जा रही है।
पहली जीत दोहराने का दबाव
भाजपा ने पिछले चुनाव में पहली बार आगरा खंड स्नातक सीट जीती थी। इस बार डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह को दोबारा प्रत्याशी बनाकर पार्टी जीत का सिलसिला कायम रखना चाहती है। ऐसे में सीट गंवाना संगठन के लिए राजनीतिक झटका होगा। प्रदेश स्तर के पदाधिकारी की मौजूदगी और जनप्रतिनिधियों की सक्रियता इस चुनाव को पार्टी की प्राथमिकता में होने का संकेत दे रही है।
लेकिन मौजूदा एमएलसी होने का लाभ तभी मिलेगा, जब भाजपा अपने समर्थक मतदाताओं को एकजुट रखकर मतदान भी सुनिश्चित कर सके। यही वजह है कि चुनाव प्रबंधन में संपर्क अभियान और बूथ स्तर की तैयारियों को खास महत्व दिया जा रहा है।
अंबरीश पाल की चुनौती, सजातीय वोटों पर नजर
डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह के सामने सबसे पेचीदा चुनौती अवागढ़ के राजा अंबरीश पाल सिंह की है। निर्दलीय प्रत्याशी अंबरीश पाल सिंह भी उसी सजातीय वर्ग से आते हैं। ऐसे में अलीगढ़, हाथरस, एटा, आगरा और फिरोजाबाद समेत संबंधित जिलों में सजातीय मतदाताओं का समर्थन हासिल करने की होड़ मुकाबले को दिलचस्प बना रही है।
अंबरीश पाल सिंह संसाधनों और संपर्कों के सहारे अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं। भाजपा को आशंका है कि सजातीय वोटों में बंटवारा हुआ तो इसका नुकसान उसके प्रत्याशी को हो सकता है। इसी समीकरण को साधने के लिए पार्टी ने अंबरीश पाल सिंह के भतीजे को अपने साथ जोड़ा है। वह मानवेंद्र प्रताप सिंह के समर्थन में सजातीय और क्षत्रिय समाज के बीच बैठकें कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने हाथरस में बैठकें कीं, जबकि अन्य जिलों में भी संपर्क अभियान चल रहा है।
सपा का पीडीए दांव, कैडर वोट पर भरोसा
समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी शशांक यादव पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं के साथ पार्टी के परंपरागत कैडर वोट को मजबूत करने में जुटे हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़े मतदाताओं को भी इस चुनाव में अहम माना जा रहा है। सपा को उम्मीद है कि पीडीए समीकरण के सहारे वह भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकती है।
मौजूदा एमएलसी के खिलाफ संभावित एंटी-इंकंबेंसी भी विपक्ष के लिए मुद्दा बन सकती है। इस तरह भाजपा को एक ओर सजातीय वोटों में सेंधमारी रोकनी है, तो दूसरी ओर सपा के सामाजिक समीकरण का सामना करना है।
अलीगढ़ के 38-39 हजार वोटों पर बड़ा दांव
आगरा खंड स्नातक सीट पर करीब 1.92 लाख मतदाता हैं। इनमें अलीगढ़ जिले के लगभग 38 से 39 हजार वोट बताए जा रहे हैं। भाजपा की चुनाव प्रबंधन टीम का आकलन है कि स्थानीय प्रत्याशी होने के कारण मानवेंद्र प्रताप सिंह को यहां लाभ मिल सकता है। अलीगढ़ में बेहतर मतदान और अपने समर्थकों के अधिक वोट पड़ने से पार्टी को दूसरे जिलों में मिलने वाले समर्थन के साथ बढ़त बनाने की उम्मीद है।
इसी रणनीति के तहत अलीगढ़ में मतदाता संपर्क तेज किया गया है। आगरा, हाथरस, एटा, कासगंज, फिरोजाबाद, मैनपुरी, कन्नौज और मथुरा समेत दूसरे जिलों में भी संगठनात्मक टीमें सक्रिय हैं। भाजपा के लिए चुनौती इन बैठकों और संपर्क अभियानों को वास्तविक मतदान में बदलने की है।
23 अक्टूबर को मतदान और 29 अक्टूबर को मतगणना होगी। नतीजे तय करेंगे कि भाजपा की संगठनात्मक ताकत और बैठकों का अभियान जीत दोहराने में कितना कारगर रहा, या फिर सजातीय चुनौती और सपा का पीडीए समीकरण आगरा खंड स्नातक सीट का चुनावी गणित बदल देगा।
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