मल्लाह समाज के लोग कराते हैं माता शीतला की पूजा:मन्नत पूरी होने पर बकरी का दान करते हैं श्रद्धालु, दूर-दूर से आते है भक्त
वाराणसी और चुनार के बॉडर पर अदलापुरा में माता शीतला का एक ऐसा मंदिर स्थित है जहां मल्लाह समाज माता की पुजा करता है। मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन और पूजा करने पहुंचते हैं। यहां बच्चों का मुंडन कराने, हलवा-पूरी चढ़ाने और मन्नत पूरी होने पर बकरी का दान करने की परंपरा है। मंदिर से जुड़ी कथा के मुताबिक माता शीतला पहले मानिकपुर में थी वहां मुस्लिम समुदया माता की पूजा करते थे। वहां मांस चढ़ाने की परंपरा थी जिससे परेशान होकर माता गंगा में कुद कर यहां आ गई। गंगा से माता के यहां आने की मान्यता मंदिर के पुजारी राजन के मुताबिक, मान्यता है कि माता शीतला पहले मानिकपुर में थीं। वहां मुस्लिम समुदया माता की पूजा करते थे। वहां माता को मांस चढ़ाया जाता था। इस परंपरा को लेकर नाराजगी के बाद माता अपने बहनों को लेकर गंगा में चली गईं। गंगा के रास्ते आते हुए उन्हें अदलापुर का यह स्थान पसंद आया और वह यहां ठहर गईं। पुजारी के अनुसार, उनके पूर्वज मंगलवा जी को सपने में माता ने दर्शन दिए और उन्हें जाल डालकर गंगा से निकालने के लिए कहा। पहली बार लोग डर गए, लेकिन अगले दिन जाल डाला गया। कथा के मुताबिक, माता ने बाहर आने से पहले वस्त्र मांगे। इसके बाद बनारस से वस्त्र लाकर उन्हें पहनाए गए और फिर जाल से बाहर निकाला गया। पहले छोटा मंदिर बना, फिर भव्य मंदिर की मांग पुजारी बताते हैं कि माता को गंगा से निकालने के बाद घाट के नीचे एक छोटा-सा मंदिर बनाया गया। बाद में मंगलवा जी को फिर सपने में माता के लिए स्थायी स्थान बनाने का संदेश मिला। इसके बाद जमीन देकर मंदिर बनवाया गया। धीरे-धीरे लोगों को इस स्थान के बारे में जानकारी होने लगी और श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने लगी। मल्लाह समाज के लोग संभालते हैं पूजा की जिम्मेदारी मंदिर में पूजा की अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं। पुजारी के मुताबिक, माता को स्नान कराने, वस्त्र पहनाने, आरती और पूजन जैसी व्यवस्थाएं मल्लाह समाज के लोग संभालते हैं। वहीं, हवनकुंड के पास रहने वाले ब्राह्मण पुजारी हवन और मंत्रोच्चार कराते हैं। मंदिर की परंपरा में दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है। बच्चों का मुंडन, हलवा-पूरी और बकरी का दान मंदिर में बच्चों के मुंडन की मन्नत लेकर भी श्रद्धालु आते हैं। मान्यता के अनुसार, बच्चे के जन्म या उसकी सलामती से जुड़ी मन्नत पूरी होने पर परिवार यहां मुंडन कराता है और हलवा-पूरी चढ़ाता है। कुछ श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर बकरी का दान भी करते हैं। पुजारी के अनुसार, यहां बकरी की बलि नहीं दी जाती। श्रद्धालु बकरी लाकर छोड़ देते हैं और माता के दर्शन-पूजन के बाद घर लौट जाते हैं। चार बेटियों के बाद दो बेटे होने पर मांगी थी मन्नत बलिया से आईं शिवकुमारी ने बताया कि वह करीब 30 साल से माता शीतला के मंदिर में आ रही हैं। उनके मुताबिक, शादी के बाद उन्हें चार बेटियां हुई थीं। इसके बाद उन्होंने माता से बेटे की मन्नत मांगी। वह बताती हैं कि बाद में उनके दो बेटे हुए। अब उम्र बढ़ने के साथ वह अक्सर बीमार रहती हैं। इस बार वह अपनी बीमारी दूर होने की मन्नत लेकर माता के दरबार में आई हैं। बेटे की आंखों की रोशनी के लिए चार साल से कर रहीं प्रार्थना मंदिर में दर्शन करने आईं चंद्रा तारा ने बताया कि उनके बेटे की आंखों की रोशनी चली गई है और उनके बेटे के बच्चे भी नहीं हैं। वह पिछले चार साल से माता के दरबार में आ रही हैं। हर साल हलवा-पूरी चढ़ाती हैं। उन्हें उम्मीद है कि माता रानी उनकी मनोकामना पूरी करेंगी और परिवार की परेशानियां दूर होंगी।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)