नवरात्रि के चौथे दिन माता कुष्मांडा का दर्शन:मंदिर के बाहर 2KM लंबी लगी लाइन,माता का किया गया है स्वर्ण श्रृंगार
शारदीय नवरात्रि के चौथे दिन बुधवार को काशी में देवी भगवती के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जा रही है। दुर्गाकुंड स्थित मां दुर्गा मंदिर में भोर से ही दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। भक्त मां के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य और मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना कर रहे हैं। मंदिर परिसर में सुबह से ही धार्मिक उत्साह का माहौल है। श्रद्धालु मां को गुड़हल का फूल, नारियल और चुनरी अर्पित कर पूजा कर रहे हैं। कैंट रेलवे स्टेशन से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित दुर्गाकुंड का मां दुर्गा मंदिर काशी के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार मां कूष्मांडा की आराधना से भक्तों को सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। मां कूष्मांडा ने अपनी मुस्कान से की सृष्टि की रचना पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब सृष्टि में चारों ओर अंधकार था और संसार का अस्तित्व नहीं था, तब देवी भगवती के कूष्मांडा स्वरूप ने अपनी दिव्य मुस्कान से सृष्टि की रचना की। इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति के रूप में भी पूजा जाता है। मां कूष्मांडा को प्रकृति और जीवन की ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है। उनकी उपासना को साधना, जप और ध्यान के लिए विशेष फलदायी माना गया है। दुर्गा माता मंदिर के महंत दीपू दुबे के अनुसार, मां कूष्मांडा को गुड़हल का फूल, नारियल और चुनरी अर्पित की जाती है। भक्त 'या देवी सर्वभूतेषु तुष्टि रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः' मंत्र का जाप कर मां की आराधना करते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों पर मां की कृपा बनी रहती है। सब्जी और अन्न का दान माना जाता है फलदायी नवरात्रि के चौथे दिन सब्जी और अन्न का दान करने की भी विशेष धार्मिक मान्यता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी भगवती ने शाकंभरी स्वरूप धारण कर धरती को शाक-सब्जियों से समृद्ध किया था। वहीं, शताक्षी स्वरूप में उन्होंने असुरों का संहार कर संसार की रक्षा की थी। इसी वजह से मां के इस स्वरूप को प्रकृति, पोषण और जनकल्याण से जोड़कर देखा जाता है। 17वीं शताब्दी में रानी भवानी ने कराया था मंदिर का जीर्णोद्धार दुर्गाकुंड स्थित मां दुर्गा मंदिर का उल्लेख काशी खंड में भी मिलता है। लाल पत्थरों से नागर शैली में निर्मित इस मंदिर के एक ओर दुर्गाकुंड स्थित है। मंदिर परिसर में बाबा भैरोनाथ के साथ मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां काली की मूर्तियां भी स्थापित हैं। मंदिर के भीतर विशाल हवन कुंड है, जहां धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, मंदिर का जीर्णोद्धार 18वीं शताब्दी में बंगाल की रानी भवानी ने कराया था। वर्ष 1760 में हुए जीर्णोद्धार का उल्लेख भी मंदिर से जुड़ी परंपराओं में मिलता है। राजा सुबाहु और राजकुमार सुदर्शन से जुड़ी है कथा मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, अयोध्या के राजकुमार सुदर्शन का विवाह काशी नरेश सुबाहु की पुत्री से कराने के लिए मां भगवती ने उनके विरोधी राजाओं का संहार किया था। कथा में रक्त से कुंड भरने का उल्लेख मिलता है, जिसे दुर्गाकुंड से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि देवी ने काशी नरेश को स्वप्न में दर्शन देकर अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार सुदर्शन से कराने का आदेश दिया था। इसके बाद राजा सुबाहु ने यहां मां भगवती का मंदिर बनवाया। मुखौटे और चरण पादुकाओं की होती है पूजा मंदिर की एक खास परंपरा यह भी है कि यहां देवी भगवती के मुखौटे और चरण पादुकाओं की पूजा की जाती है। मंदिर में यांत्रिक पूजा का भी विशेष महत्व है। इसकी स्थापत्य परंपरा को बीसा यंत्र से जोड़कर बताया जाता है, जो बीस कोणों वाली यांत्रिक संरचना है।
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