नवरात्रि स्पेशल:दो बहनों ने मिलकर बनाया अपना आसमान:पहले भिखारियों के हाथ से कटोरा हटवाया, अब 120 बच्चों और महिलाओं की जिंदगी संवार रहीं

Oct 14, 2026 - 07:58
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नवरात्रि स्पेशल:दो बहनों ने मिलकर बनाया अपना आसमान:पहले भिखारियों के हाथ से कटोरा हटवाया, अब 120 बच्चों और महिलाओं की जिंदगी संवार रहीं
बच्चे स्कूल जाते थे, पर स्कूल के बाद फिर परिवार के नक्शेकदम पर चलकर नशे और जुए की ओर बढ़ जाते थे। इसलिए हमने उन बच्चों को शाम में फ्री कोचिंग देना शुरू किया। 11 बच्चों से शुरू हुई हमारी क्लास में आज 120 बच्चे पढ़ते हैं। ये कहना है वाराणसी की रहने वाली रोली सिंह रघुवंशी का, जो 2007 से समाज सेवा कर रही हैं। उन्होंने बताया कि पहले उन्होंने उन महिलाओं और बच्चों के लिए काम किया, जो कटोरा लेकर भीख मांगते थे। अब वह महिलाओं के साथ उन बच्चों के लिए भी काम कर रही हैं, जो स्कूल तो जाते हैं, लेकिन पढ़ते नहीं हैं। रोली उन बच्चों को शाम में कोचिंग देती हैं। रोली के साथ उनकी बहन दीक्षा भी बच्चों को पढ़ाती हैं। दोनों बहनें मिलकर ‘खुला आसमान’ संस्था चलाती हैं। इस संस्था में बच्चों की पढ़ाई और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम होता है। संस्था में बच्चों को पढ़ाने से लेकर खाना बनाने और महिलाओं को रोजगार से जोड़ने तक की जिम्मेदारी महिलाएं ही संभाल रही हैं। बचपन में जाना था अमेरिका, फिर मन बदला और लगने लगी समाजसेवा रोली बताती हैं कि समाज के लिए कुछ करने की इच्छा उनके भीतर बचपन से थी। उनके बाबा जमींदार परिवार से थे। उनका मानना है कि परिवार से मिले संस्कारों ने उन्हें समाज के लिए काम करने की प्रेरणा दी। वह कहती हैं कि जो कुछ उन्हें मिला है, उसे समाज को लौटाना चाहिए। रोली ने बताया कि उनका एक सपना विदेश जाकर वहां की नागरिकता लेने, चुनाव लड़ने और भारत में अनाथालय खोलने का भी था। लेकिन जब वह बीएचयू आईं, तो उनकी सोच में बदलाव आने लगा। वहां छोटे-छोटे बच्चों को भीख मांगते देखकर उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उनके मन में सवाल उठता था कि इन बच्चों को इस स्थिति से बाहर कैसे निकाला जाए। वह अलग-अलग संस्थानों में भी जाती थीं और बच्चों के साथ काम करती थीं। बाद में उन्होंने अपनी बहन दीक्षा सिंह रघुवंशी के साथ बस्तियों में जाकर बच्चों से बातचीत करना शुरू किया। दोनों बहनें बच्चों के साथ-साथ उनकी माताओं से भी मिलती थीं। उनका प्रयास था कि पहले बच्चों के साथ भरोसे का रिश्ता बने, फिर परिवार भी उन्हें पढ़ाने और आगे बढ़ाने के लिए तैयार हो। कटोरा छुड़ाने में लगे कई साल रोली बताती हैं कि शुरुआत में जिन महिलाओं के हाथ से कटोरा छुड़वाने का प्रयास किया जा रहा था, उन्हें काम के लिए तैयार करना आसान नहीं था। उनके बीच जाकर बार-बार बात करनी पड़ती थी। उन्हें समझाना पड़ता था कि वे अपने हुनर से भी कमा सकती हैं। अब संस्था महिलाओं को सिलाई का काम सिखाने और रोजगार से जोड़ने का प्रयास कर रही है। रोली के मुताबिक, उनके साथ करीब 10 से 15 महिलाओं की टीम काम करती है। इनमें कुछ महिलाएं सिलाई करती हैं, कुछ खाना बनाने और बच्चों की देखभाल में सहयोग देती हैं। एक महिला टोटो भी चलाती है। संस्था महिलाओं को सिलाई मशीन उपलब्ध कराने के लिए सरकारी विभागों के साथ मिलकर काम करती है। इसके लिए पहले क्षेत्रों में जाकर जरूरतमंद महिलाओं को चिह्नित किया जाता है। इसके बाद उन्हें मशीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है, ताकि वे अपने घर से या अपने स्तर पर सिलाई का काम करके कमाई कर सकें। रविदास घाट पर शुरू किया काम खुला आसमान की शुरुआत रविदास घाट के पास हुई। रोली बताती हैं कि उस इलाके में नशे से जुड़ी समस्याएं भी थीं और वहां तक लोगों को लाना आसान नहीं था। शुरुआत में बच्चों को संस्था तक लाने के लिए उनके परिवारों को समझाना पड़ता था। कई बार बच्चे नहीं आते थे, तो उनके अभिभावकों से बातचीत करनी पड़ती थी। बच्चों को संस्था से जोड़ने के लिए यहां पढ़ाई के साथ डांस, ड्रामा और दूसरी गतिविधियां भी कराई जाती हैं। रोली और दीक्षा का मानना है कि बच्चों को केवल पढ़ाई के लिए बुलाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें ऐसा माहौल देना भी जरूरी है, जहां वे सहज महसूस करें और अपनी रुचि के अनुसार आगे बढ़ सकें। किसी के घर में नशा, तो कहीं घरेलू हिंसा रोली बताती हैं कि संस्था से जुड़े हर बच्चे की अपनी अलग कहानी है। कई बच्चों के परिवार घरेलू हिंसा या नशे की समस्या से जूझ रहे हैं। कुछ मामलों में माता-पिता बच्चे की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते, तो कहीं माता-पिता अलग-अलग रहते हैं और बच्चा उनके बीच फंसा रहता है। ऐसे बच्चों को पढ़ाई से जोड़ना और उन्हें सुरक्षित माहौल देना बड़ी चुनौती है। उन्होंने एक बच्ची का उदाहरण भी बताया, जिसके परिवार में उसे लेकर गंभीर विवाद है। रोली के अनुसार, बच्ची अपनी मां के साथ रहना चाहती है, लेकिन मां उसे अपने पास नहीं रखना चाहती और पिता को सात लाख रुपये में बेचने की बात कर रही है। यह मामला रोली ने अपने अनुभव के रूप में साझा किया है। बच्ची और उसके परिवार की सुरक्षा को देखते हुए इस तरह के गंभीर आरोपों को प्रकाशित करने से पहले तथ्यों और संबंधित पक्ष की पुष्टि जरूरी होगी। संस्था में बच्चों को पढ़ाई से जुड़ी जरूरी सामग्री, कॉपी-पेंसिल और दूसरी चीजें उपलब्ध कराई जाती हैं। बच्चों की जरूरत और रुचि के अनुसार उन्हें अलग-अलग गतिविधियों में भी शामिल किया जाता है। रोली का कहना है कि बच्चों के साथ समय बिताने पर ही उनकी परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं बच्चे, आगे बढ़ने के लिए मिल रहा सहारा दीक्षा सिंह रघुवंशी भी बच्चों के साथ काम करती हैं। उनके मुताबिक, संस्था से जुड़े अधिकतर बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। स्कूल से आने के बाद वे खुला आसमान में समय बिताते हैं। यहां बच्चों की पढ़ाई के साथ उनकी दूसरी प्रतिभाओं पर भी ध्यान दिया जाता है। कुछ बच्चे क्रिकेट, ताइक्वांडो और दूसरी गतिविधियां सीख रहे हैं। संस्था से जुड़े कुछ बच्चे पेशेवर क्रिकेट खेलने लगे हैं, जबकि कुछ बीएचयू और हरिश्चंद्र कॉलेज में ग्रेजुएशन कर रहे हैं। दीक्षा बताती हैं कि हर बच्चे की रुचि अलग होती है। इसलिए जो बच्चे पढ़ाई के साथ दूसरी गतिविधियों में आगे बढ़ना चाहते हैं, उन्हें भी मौका देने की कोशिश की जाती है। बच्चों की पढ़ाई और गतिविधियों के लिए संस्था अपनी तरफ से जरूरी सामग्री और अवसर उपलब्ध कराने की कोशिश करती है। दो साल पहले तलाक के बाद जिंदगी को नए सिरे से आगे बढ़ाया रोली ने अपनी निजी जिंदगी के संघर्ष का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि शादी के बाद भी अपने काम को आगे बढ़ाने में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। वह करीब पांच साल तक वैवाहिक जीवन में रहीं। उनके मुताबिक, उस दौरान परिस्थितियां ऐसी थीं कि उन्हें लगा कि अब इस तरह आगे बढ़ना संभव नहीं है। करीब दो साल पहले उन्होंने तलाक लिया। रोली के अनुसार, उस दौर में उन्हें ऐसा महसूस होता था कि वह बंद कमरे में हैं और आसमान तक नहीं देख पा रही हैं। इसी अनुभव से ‘खुला आसमान’ नाम का भाव जुड़ा। उनके लिए बाहर निकलने का मतलब केवल अपनी जिंदगी को नए सिरे से शुरू करना नहीं था, बल्कि अपने साथ दूसरी महिलाओं और बच्चों के लिए भी अवसर बनाना था। मां-पिता को भी समझाने में लगा लंबा समय रोली के इस काम को परिवार में स्वीकार किए जाने में भी समय लगा। उनके पिता बैंक में काम करते थे। शुरुआत में उन्हें चिंता रहती थी कि रोली भीख मांगने वाले लोगों और बस्तियों के बीच किस तरह काम कर पाएंगी। रोली के मुताबिक, परिवार को उनके काम की अहमियत समझने और उनका साथ देने में करीब 20 साल लग गए। इसके बावजूद रोली ने महिलाओं और बच्चों के बीच काम जारी रखा। आज संस्था में करीब 10 से 15 महिलाएं अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाती हैं। कोई बच्चों को पढ़ाने में मदद करती है, कोई खाना बनाने या सिलाई का काम करती है। एक महिला ई-रिक्शा भी चलाती है। रोली का प्रयास है कि महिलाओं को उनकी क्षमता के अनुसार काम मिले और वे आर्थिक रूप से मजबूत बन सकें। बच्चों से जुड़कर महिलाओं तक पहुंचा काम दीक्षा बताती हैं कि शुरुआत में उनका मुख्य ध्यान बच्चों को पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों से जोड़ने पर था। धीरे-धीरे जब बच्चे नियमित आने लगे, तो उनकी माताएं भी उन्हें छोड़ने और लेने आने लगीं। इससे महिलाओं के साथ संवाद बढ़ा और उनकी समस्याएं सामने आने लगीं। इसके बाद संस्था ने महिलाओं को सशक्त बनाने और रोजगार से जोड़ने के काम को भी आगे बढ़ाया। अब संस्था में बच्चों को पढ़ाने, खाना बनाने और दूसरे कामों में महिलाएं सक्रिय भूमिका निभाती हैं। रोली का कहना है कि महिलाओं को केवल आर्थिक रूप से मजबूत बनाना ही जरूरी नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसा भरोसेमंद माहौल भी देना जरूरी है, जहां वे अपनी परेशानी खुलकर बता सकें। दोनों बहनों का प्रयास है कि बच्चे शिक्षा और हुनर के जरिए आगे बढ़ें और महिलाएं अपनी कमाई के साथ सम्मान से जीवन जी सकें। 11 बच्चों से शुरू हुई संस्था में अब 120 बच्चे जुड़े हैं। आगे भी वे उन परिवारों तक पहुंचना चाहती हैं, जहां बच्चों और महिलाओं को सहयोग की जरूरत है।

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