नवरात्रि स्पेशल: परिवार ने जिन्हें छोड़ा, उनकी ‘मम्मी’ बनीं सुधा:2016 से दिव्यांगों के लिए कर रही काम, बेसहारा मंदबुद्धि महिलाओं को दिया घर
"रात में खाना खाने बैठती हैं, तो यहां रहने वाली बच्चियां वीडियो कॉल करने लगती हैं। कोई दिनभर की बात बताती है, तो कोई अपनी परेशानी। सब उन्हें ‘मम्मी’ कहती हैं। ये सुधा दीक्षित की अपनी बेटियां नहीं हैं, लेकिन अब उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं।" वाराणसी की 48 वर्षीय सुधा घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ उन महिलाओं और बच्चियों की भी देखभाल कर रही हैं, जिनकी जिम्मेदारी लेने से उनके परिवार वालों ने इनकार कर दिया। सुधा वाराणासी के हरुआ में समर्पण मानसिक मंदता आश्रयगृह चलाती है। उनके आश्रय गृह में अभी 15 महिलाएं है। जिनके दिमाग का विकास ठीक तरीके से नहीं हुआ। ये वो महिलाएं है जिन्हें या तो परिवार ने घर से निकाल दिया है या ये खुद रास्ता भटक कर आ गई है। सुधा बताती है कि उन्हें 12 वीं कक्षा के बाद से ही दिव्यांगों की सेवा में मन लगने लगा था। सुधा 2016 से दिव्यांगों को निशुल्क शिक्षा देने के लिए स्कूल चलाती है। जनवरी 2026 में उन्होंने मंदबुद्धि महिलाओं के लिए आश्रयगृह की स्थापना की। इसका पूरा खर्ज वो अपने बिजनेस से देती है। सड़क किनारे मिली महिला को देखकर लिया फैसला सुधा बताती हैं कि वह पहले भी दिव्यांग लोगों के बीच जाती थीं। कभी किसी संस्था में जाकर मदद करती थीं, लेकिन उन्हें लगता था कि उनका सहयोग बहुत छोटा है। फिर एक घटना ने उनके मन में आश्रयगृह शुरू करने का विचार मजबूत कर दिया। वह बताती हैं, करीब 4 साल पहले एक महिला सड़क किनारे गड्ढे में पड़ी थी। कड़ाके की ठंड थी और उसके शरीर पर कपड़े तक नहीं थे। आसपास लोग थे, लेकिन कोई उसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं दिख रहा था। सुधा और उनकी टीम ने महिला को कपड़े में लपेटा, डॉक्टर की मदद ली और 112 पर पुलिस को सूचना दी। महिला की हालत देखकर सुधा को लगा कि ऐसे लोगों को सिर्फ इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता कि वे अपनी बात नहीं कह पाते या मानसिक परेशानी से जूझ रहे हैं। जनवरी में शुरू किया आश्रयगृह, अब बच्चियां कहती हैं मम्मी हरुआ में जनवरी 2026 में सुधा ने ‘समर्पण मानसिक मंदता आश्रयगृह’ शुरू किया। वह बताती हैं कि यहां ज्यादातर महिलाएं मानसिक चिकित्सालय से आती हैं। कुछ को परिवार ने छोड़ दिया, तो कुछ ऐसी हैं जिन्हें बेसहारा हालत में लाया गया। कई महिलाओं को शुरुआत में अपना नाम तक याद नहीं था। वे अपने परिवार या बीते जीवन के बारे में भी नहीं बता पाती थीं। सुधा के मुताबिक, इलाज, दवाओं और अच्छे माहौल में रहने से कुछ महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है। धीरे-धीरे वे अपनी बातें समझने और पुरानी यादों को साझा करने लगी हैं। वह बताती हैं कि यहां रहने वाली बच्चियां उन्हें मम्मी कहती हैं। रात में खाना खाते समय भी वीडियो कॉल करके बताती हैं कि दिनभर क्या हुआ। सुधा कहती हैं कि अगर वह एक दिन यहां नहीं पहुंचतीं, तो बच्चियां परेशान हो जाती हैं। उनके लिए यह जिम्मेदारी अब केवल आश्रयगृह तक सीमित नहीं रही। वह घर के बच्चों की तरह ही यहां रहने वाली बच्चियों की चिंता करती हैं। सिलाई सेंटर और चादर बनाने के काम से चलाती हैं खर्च सुधा बताती हैं कि आश्रयगृह चलाने के लिए हर महीने खर्च की जरूरत होती है। भोजन, राशन, किराया, इलाज और दूसरी जरूरतों का इंतजाम करना पड़ता है। इसके लिए वह अपना काम भी करती हैं। वह सिलाई सेंटर चलाती हैं और चादर आदि बनाने का काम करती हैं। इन उत्पादों को फ्लिपकार्ट और इंडिया मार्ट जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेचने का भी प्रयास करती हैं। बनारस से भी लोग ऑर्डर देते हैं। सुधा के मुताबिक, इस काम से जो कमाई होती है, उससे आश्रयगृह और दूसरी जिम्मेदारियों को संभालने में मदद मिलती है। वह एक तरफ अपना बिजनेस चलाती हैं, तो दूसरी तरफ यहां रहने वाली महिलाओं की देखभाल और दिव्यांग बच्चों की पढ़ाई का काम भी करती हैं। वह बताती हैं कि खर्च की परेशानी हमेशा बनी रहती है। राशन और दूसरी जरूरतों के लिए उनके साथ कुछ लोग भी मदद करते हैं। उनके सहयोगियों में अरविंद पांडे, रजनेश और प्रदीप जैसे लोग शामिल हैं। सुधा कहती हैं कि अब एक टीम बन गई है, जो जरूरत के हिसाब से काम संभालती है। फिर भी हर महीने की व्यवस्था करना आसान नहीं है। 2016 से दिव्यांग बच्चों को निशुल्क पढ़ा रहीं सुधा दीक्षित साल 2016 से दिव्यांग बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने का काम कर रही हैं। वह बताती हैं कि इस समय उनके पास 35 दिव्यांग बच्चे हैं। बच्चों को पढ़ाने के लिए जगह, वाहन और दूसरी व्यवस्थाएं करनी पड़ती हैं। कई बच्चों को लाने-ले जाने के लिए निजी गाड़ियों की व्यवस्था करनी होती है। स्कूल का किराया और बाकी खर्च भी उठाने पड़ते हैं। सुधा के मुताबिक, आर्थिक परेशानी के कारण कभी-कभी कक्षाएं नियमित रूप से चलाना मुश्किल हो जाता है। इसके बावजूद उनकी कोशिश रहती है कि बच्चों की पढ़ाई न छूटे। उनका कहना है कि दिव्यांग बच्चों को भी पढ़ने और आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। जब काम शुरू कि तो मां ने रोका सुधा बताती है कि 12 वीं क्लास से उन्हें दिव्यांग बच्चों के लिए काम करने में रुचि थी। वो अलग-अलग संस्थानों में जाकर बच्चों के लिए काम करती थी। लेकिन जब मेरे घर में एक दिव्यांग बच्ची आई तो मुझे समझ आया कि एक दिव्यांग के घर में आने से घर कैसे टूटता है। तब मैंने सोच लिया की मैं इनके लिए काम करूंगी। जब उन्होंने शादी के बाद अपने काम को और तेज किया वो बच्चों के साथ रहने लगी। उन्हें पढ़ाना शुरू किया तो घर वालों ने मना भी किया। सुधा बताती थी कि उनकी मां को डर था कि मैं दिव्यांगों के साथ रहती हुं तो इसका असर मेरे पेट मे पल रहे बच्चे पर भी पड़ सकता है। लेकिन जैसे जैसे समय बीता परिवार ने मेरे काम को देखा तो सब मेरा सपोर्ट करने लगे।
बड़े होने पर कंप्यूटर, सिलाई और दूसरे कामों की ट्रेनिंग सुधा बताती हैं कि दिव्यांग बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तो उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कौशल प्रशिक्षण भी दिया जाता है। हरुआ स्थित सेंटर में जरूरत और उपलब्ध प्रोजेक्ट के अनुसार कंप्यूटर, सिलाई और डेटाबेस जैसे कामों की ट्रेनिंग दिलाई जाती है। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद विभाग की मदद से उन्हें रोजगार से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। वह कहती हैं कि दिव्यांगता के कारण परिवारों में कई तरह की मुश्किलें आती हैं। ऐसे में समाज के लोग अगर साथ दें, तो दिव्यांग व्यक्ति भी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ सकता है। उनका प्रयास है कि बच्चों को सिर्फ पढ़ाया न जाए, बल्कि उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने का मौका भी मिले। अपने परिवार और आश्रयगृह, दोनों की जिम्मेदारी सुधा बताती हैं कि उनके पति और परिवार ने उनके काम में सहयोग किया है। उनके पति अतुलानंद स्कूल में शिक्षक हैं। घर में अपने बच्चे हैं और हरुआ में आश्रयगृह की बच्चियां भी। वह कहती हैं कि दोनों जगह उनकी जिम्मेदारी है। कई बार अपने बच्चों को भी उनकी कमी महसूस होती है, लेकिन परिवार उनकी कोशिश को समझता है। सुधा के मुताबिक, यहां रहने वाली बच्चियां भी उनसे बहुत जुड़ गई हैं। वे अपनी छोटी-बड़ी बातें उन्हें बताती हैं और उनके आने का इंतजार करती हैं। स्टाफ भी उनकी देखभाल करता है, लेकिन सुधा खुद भी कोशिश करती हैं कि बच्चियों को किसी चीज की परेशानी न हो। ‘इनके लिए समाज को आगे आना चाहिए’ सुधा कहती हैं कि दिव्यांगता या मानसिक परेशानी से जूझ रहे व्यक्ति को केवल उसके हाल पर नहीं छोड़ देना चाहिए। उन्होंने परिवारों में ऐसी परिस्थितियां देखी हैं, जहां दिव्यांग बच्चे की जिम्मेदारी उठाना मुश्किल हो जाता है। उनका मानना है कि ऐसे समय में समाज को सहयोग करना चाहिए। वह कहती हैं कि महिला सशक्तिकरण की बात तभी पूरी होगी, जब उन महिलाओं को भी सुरक्षा और सहारा मिलेगा जो खुद अपनी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर हैं। सुधा के लिए आश्रयगृह की महिलाएं और दिव्यांग बच्चे अलग नहीं हैं। वह चाहती हैं कि जिन महिलाओं के परिवार मिल सकते हैं, उन्हें परिवार से जोड़ा जाए और जिनके लिए यह संभव न हो, उन्हें सम्मान के साथ रहने और आत्मनिर्भर बनने का मौका मिले। घर, बिजनेस, दिव्यांग बच्चों की पढ़ाई और आश्रयगृह की जिम्मेदारी के बीच सुधा दीक्षित लगातार काम कर रही हैं। वह कहती हैं कि परेशानी आती है, लेकिन कोशिश यही रहती है कि यहां रहने वाली बच्चियों को परेशानी न हो। उनके लिए सबसे जरूरी बात यही है कि जिन्हें अपनों ने छोड़ दिया, उन्हें कम से कम एक ऐसी जगह मिले जहां कोई उन्हें अपना कहकर बुलाए।
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