पाकिस्तान से आते हैं परिवार माई थान में माथा टेकने:रामपुर में 40 साल से जाकिर और सलामत के परिवार के यहां पहुंचते हैं
रामपुर। हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली से करीब 200 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के रामपुर में आस्था की एक ऐसी परंपरा आज भी कायम है, जो भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद भी लोगों को जोड़ रही है। पुराना गंज स्थित माई के थान में पाकिस्तान से कई परिवार माथा टेकने पहुंचते हैं। यहां मां के दरबार में साड़ी, चुनरी और प्रसाद चढ़ाकर अपने वतन पाकिस्तान लौट जाते हैं।माई के थान का गेट डेढ़ कुंतल चांदी से बना है। सोमवार की शाम करीब चार बजे माई थान के महंत सुनील कुमार ने बताया कि जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा नहीं हुआ था, तब रामपुर में रहने वाले कई परिवार बंटवारे के दौरान पाकिस्तान चले गए थे। इसके बावजूद रामपुर के माई के थान से उनकी आस्था का रिश्ता आज भी बना हुआ है।
सुनील कुमार ने बताया कि वह पिछले 40 साल से में खुद देख रहा हूं, कि पाकिस्तान से जाकिर और सलामत के परिवार माई के थान में आते हैं। यहां पहुंचकर माथा टेकते हैं, मां को साड़ी और चुनरी चढ़ाते हैं तथा प्रसाद अर्पित करते हैं। पूजा-अर्चना करने के बाद वे अपने वतन पाकिस्तान लौट जाते हैं। उन्होंने बताया कि करीब दो महीने पहले भी जाकिर और सलामत यहां आए थे। माई के थान के निर्माण से जुड़ी जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि रामपुर के तत्कालीन नवाब ने इसके निर्माण के लिए 2000 रुपये का चंदा दिया था। इसके बाद स्थानीय लोगों और मां के प्रति आस्था रखने वाले श्रद्धालुओं ने करीब डेढ़ कुंतल चांदी से माई के थान का गेट बनवाया है।
मंदिर में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि वे मां के दरबार में सच्चे मन से जो भी मुराद मांगते हैं, मां उसे पूरा करती हैं। यही वजह है कि यहां स्थानीय लोगों के साथ दूर-दराज से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। चैत्र नवरात्र और नवदुर्गा पूजन जैसे अवसरों पर माई के थान में हजारों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। इन अवसरों पर पूरे दिन भंडारे चलते हैं और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सोमवार को भी सुबह से कार्यक्रम चल रहे थे, जबकि रात 12 बजे तक कई कार्यक्रम आयोजित होने थे।
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