पत्नी की हत्या के आरोप को हाईकोर्ट ने बरी किया:मुरादाबाद कोर्ट की आजीवन कारावस की सजा को रद्द किया

Aug 21, 2026 - 00:45
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पत्नी की हत्या के आरोप को हाईकोर्ट ने बरी किया:मुरादाबाद कोर्ट की आजीवन कारावस की सजा को रद्द किया
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपनी पत्नी को आग लगाकर मारने के आरोप में गैर-इरादतन हत्या के दोषी ठहराए गए पति को सभी आरोपों से बरी कर दिया। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने मुरादाबाद की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा 2018 में दी गई आजीवन कारावास की सजा के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। बयान के आधार पर दोषी नहीं ठहरा सकते उच्च न्यायालय ने माना कि पारिवारिक सदस्यों की मौजूदगी में दर्ज किए गए मृत्युपूर्व बयान पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता और केवल इसके आधार पर आरोपी को दोषी ठहराना उचित नहीं है। मामला 23 दिसंबर 2015 का है, जहाँ अपीलकर्ता जगन पर अपनी पत्नी त्रिवेनी पर केरोसिन छिड़ककर आग लगाने का आरोप लगा था। अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा बयान के लिए स्वस्थ घोषित किए जाने के बाद पीड़िता का मृत्युपूर्व बयान दर्ज किया गया, जिसमें उसने पति पर आग लगाने का आरोप लगाया था। हालाँकि, जिरह के दौरान मृतक के भाई ने यह स्वीकार किया कि जब मजिस्ट्रेट बयान दर्ज कर रहे थे, तब पीड़िता का बेटा, उसकी पत्नी और बुआ सहित परिवार के अन्य सदस्य वहीं मौजूद थे। पीठ ने स्पष्ट किया कि जब मृत्युपूर्व बयान परिजनों की उपस्थिति में दर्ज कराया गया हो, तो उसमें सिखाए-पढ़ाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए इसे कानूनी रूप से कोई विशेष महत्व नहीं दिया जा सकता। जलाने के प्रयास में खुद भी झुलसा, मामला उलझा न्यायालय ने मामले की अन्य परिस्थितियों और चिकित्सीय साक्ष्यों पर भी विशेष ध्यान दिया। साक्ष्यों से यह सिद्ध हुआ कि आरोपी पति ने अपनी पत्नी को बचाने का प्रयास किया था और इस प्रक्रिया में वह स्वयं भी काफी झुलस गया था। बचाव पक्ष के डॉक्टरों की गवाही ने भी इस बात की पुष्टि की कि पति को लगी चोटें जलते हुए व्यक्ति पर पानी डालने और बचाने के प्रयास के दौरान ही संभव हैं। इसके अतिरिक्त, पीड़िता को अस्पताल पहुँचाने का काम भी आरोपी की माँ ने ही किया था। अदालत ने घटना के पीछे के कारणों का विश्लेषण करते हुए पाया कि दोनों की शादी के 18 साल बीत चुके थे और उनके बीच दहेज जैसी कोई मांग नहीं थी। विवाद का मुख्य कारण बच्चे को गोद लेने को लेकर हुआ पारिवारिक झगड़ा था। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आरोपी ने ही आग लगाई थी, और निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए पति को बरी कर दिया।

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