रामपुर का हब्शी हलवा बना ग्लोबल ब्रांड:ODOC योजना से यूपी ट्रेड शो में 60 हजार की बिक्री, अब जीआई टैग पर नजर
ऐतिहासिक हब्शी हलवा सोहन अब ‘एक जिला, एक व्यंजन’ (ओडीओसी) योजना के जरिए देश-दुनिया में अपनी पहचान बना रहा है। नवाबी दौर की इस पारंपरिक मिठाई को तैयार करने वाली हकीम जी की तीसरी पीढ़ी कारोबार को आगे बढ़ा रही है। कारोबारी सुहेल खां के मुताबिक, सरकार की मदद से अब छोटे कारोबारियों को बड़े मंचों पर बिना स्टॉल शुल्क के अपने उत्पाद प्रदर्शित करने का अवसर मिल रहा है। सुहेल खां ने बुधवार की दोपहर दो बजे बताया कि पहले अंतरराष्ट्रीय ट्रेड फेयर में स्टॉल लगाने के लिए दो से तीन लाख रुपये तक खर्च करने पड़ते थे, जो छोटे कारोबारियों के लिए मुश्किल था। अब ओडीओसी के तहत मुफ्त स्टॉल मिलने से सीधे खरीदारों तक पहुंच बन रही है। ग्रेटर नोएडा में आयोजित पांच दिवसीय यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में उनके स्टॉल पर रोजाना 40 से 50 किलो हलवे की बिक्री हुई और करीब 60 हजार रुपये प्रतिदिन का कारोबार हुआ। रामपुर के हुनर हाट में भी 10 दिनों में करीब 90 हजार रुपये का कारोबार हुआ। सुहेल के अनुसार हब्शी हलवे का इतिहास नवाबी दौर से जुड़ा है। नवाब हामिद अली खां अफ्रीका से एक कारीगर को रामपुर लाए थे। कारीगर ने जड़ी-बूटियों, मेवे, केसर और देसी घी से यह हलवा तैयार किया। बाद में इसका नुस्खा रामपुर के अब्दुल हकीम खान को दिया गया। उनके दादा ने 1930 में इसे आम लोगों के लिए बनाना शुरू किया था। 15 किलो हलवा तैयार करने में करीब चार किलो शुद्ध देसी घी, दूध, मेवे, केसर और हेजलनट के साथ एक से दो प्रतिशत अंकुरित गेहूं यानी समनक का इस्तेमाल होता है। हलवा करीब तीन घंटे धीमी आंच पर पकाया जाता है। सुहेल के मुताबिक इसकी मांग सऊदी अरब और दुबई तक पहुंच चुकी है। अब जीआई टैग, आधुनिक पैकेजिंग, दिल्ली-मुंबई के बाजारों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुंच बनाने की तैयारी है। साथ ही दुबई के ग्लोबल विलेज फेयर में स्थायी आउटलेट खोलने की योजना है।
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