डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बुजुर्ग दंपति से 2.20 करोड़ की ठगी

गाजियाबाद में साइबर ठगों ने 84 वर्षीय रिटायर्ड बैंक मैनेजर और उनकी पत्नी को डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर 12 दिनों तक मानसिक दबाव में रखा और 2.20 करोड़ रुपये की ठगी कर ली। आरोपियों ने खुद को पुलिस, प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी और जज बताकर फर्जी जांच का नाटक रचा। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बुजुर्ग दंपति से 2.20 करोड़ की ठगी

दि राइजिंग न्यूज़ | गाजियाबाद | 28 जून 2026

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में साइबर अपराध का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां 84 वर्षीय रिटायर्ड बैंक मैनेजर और उनकी पत्नी साइबर ठगों के जाल में फंसकर अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी गंवा बैठे। आरोपियों ने डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाकर दंपति से करीब 2.20 करोड़ रुपये की ठगी कर ली। इस दौरान उन्हें लगभग 12 दिनों तक लगातार मानसिक दबाव में रखा गया और विभिन्न बहानों से पैसे ट्रांसफर कराए गए।पुलिस के अनुसार ठगों ने खुद को पुलिस अधिकारी, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारी और न्यायिक अधिकारी बताकर पूरे घटनाक्रम को अंजाम दिया। मामले की शिकायत मिलने के बाद साइबर क्राइम थाना पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।

व्हाट्सएप कॉल से शुरू हुआ धोखाधड़ी का खेल

एफआईआर के अनुसार गाजियाबाद की रामप्रस्थ ग्रींस सोसायटी में रहने वाले रिटायर्ड बैंक मैनेजर राम प्रकाश हूरिया को 22 मई को एक व्हाट्सएप कॉल प्राप्त हुई। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को दिल्ली के एक थाने का पुलिसकर्मी बताया।आरोपी ने दावा किया कि वर्ष 2023 के एक कथित बैंक घोटाले में उनके नाम का इस्तेमाल हुआ है और उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है। इसके बाद उन्हें किसी से भी संपर्क न करने और जांच पूरी होने तक गोपनीयता बनाए रखने के निर्देश दिए गए।

फर्जी अदालत और अधिकारियों का बनाया दबाव

पीड़ित के अनुसार अगले दिन उन्हें वीडियो कॉल के माध्यम से कथित ईडी अधिकारियों और एक कथित जज के सामने पेश किया गया। आरोपियों ने जांच का हवाला देते हुए कहा कि उनके बैंक खाते, संपत्तियां और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड सत्यापित किए जाएंगे।ठगों ने दंपति को विश्वास दिलाया कि जांच पूरी होने तक उनकी रकम सरकारी खातों में जमा करानी होगी और जांच समाप्त होने के बाद पैसा वापस लौटा दिया जाएगा। इस दौरान लगातार वीडियो कॉल और संदेशों के माध्यम से उन पर नजर रखी गई।

12 दिनों में कई खातों में ट्रांसफर कराई गई रकम

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार 22 मई से 4 जून के बीच पीड़ित से पांच अलग-अलग बैंक खातों में कुल 2 करोड़ 19 लाख 73 हजार 3 रुपये ट्रांसफर कराए गए।इन लेनदेन में कई बड़ी रकम शामिल थीं, जिन्हें आरटीजीएस के माध्यम से भेजा गया। आरोपियों ने दंपति को यह विश्वास दिलाया कि यह प्रक्रिया जांच का हिस्सा है और पैसा सुरक्षित रहेगा।

उधार लेकर भी भेजे लाखों रुपये

पीड़ित ने पुलिस को बताया कि ठगों के दबाव में आकर उन्होंने न केवल अपनी बचत ट्रांसफर कर दी, बल्कि अतिरिक्त रकम जुटाने के लिए परिचितों से लगभग 70 लाख रुपये उधार भी लिए।ठग लगातार उन्हें गिरफ्तारी, कानूनी कार्रवाई और संपत्ति जब्त होने का भय दिखाते रहे। इसी डर के कारण दंपति आरोपियों की बातों पर भरोसा करते रहे और निर्देशों का पालन करते गए।

डिजिटल सबूत मिटाने की भी कोशिश

शिकायत के अनुसार आरोपियों ने व्हाट्सएप चैट, नोटिफिकेशन और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड भी हटवा दिए ताकि किसी प्रकार का सबूत न बचे। पीड़ितों को लगातार यह कहा जाता रहा कि जांच अत्यंत गोपनीय है और किसी से भी इसकी चर्चा नहीं करनी है।जब काफी समय बीत गया और कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली, तब दंपति को ठगी का एहसास हुआ और उन्होंने साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई।

पुलिस कर रही खातों और नंबरों की जांच

एफआईआर में कई बैंक खातों और तीन व्हाट्सएप नंबरों का उल्लेख किया गया है, जिनका उपयोग कथित तौर पर ठगी के लिए किया गया। पुलिस अब इन खातों के माध्यम से धन के प्रवाह का पता लगाने में जुटी है।जांच एजेंसियां मोबाइल नंबरों, बैंक लेनदेन और डिजिटल गतिविधियों का विश्लेषण कर आरोपियों की पहचान करने का प्रयास कर रही हैं। साथ ही मनी ट्रेल के जरिए यह भी पता लगाया जा रहा है कि ठगी की रकम किन-किन खातों में भेजी गई।

डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं

विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों ने इस मामले के बाद नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह दी है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि भारत में "डिजिटल अरेस्ट" नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया मौजूद नहीं है।कोई भी पुलिस एजेंसी, जांच एजेंसी या अदालत वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं करती और न ही जांच के नाम पर किसी निजी या सरकारी खाते में धन जमा कराने का निर्देश देती है।यदि कोई व्यक्ति स्वयं को पुलिस, ईडी, सीबीआई या अदालत का अधिकारी बताकर धन की मांग करे, तो उसकी सूचना तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 या नजदीकी साइबर पुलिस थाने को देनी चाहिए।

बढ़ते साइबर अपराधों ने बढ़ाई चिंता

देशभर में डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन जांच के नाम पर होने वाली साइबर ठगी के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। अपराधी विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाकर उन्हें कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं और आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं।गाजियाबाद का यह मामला एक बार फिर बताता है कि साइबर अपराधी किस तरह मनोवैज्ञानिक दबाव और तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों की मेहनत की कमाई हड़प रहे हैं। पुलिस ने लोगों से सतर्क रहने और किसी भी संदिग्ध कॉल या संदेश की तुरंत सूचना देने की अपील की है।