रविदास की वाणी से गूंजा समरसता महोत्सव:पहुंचे हजारों लोग, 30 बालिकाओं और 27 समाजसेवियों का सम्मान

Oct 04, 2026 - 20:31
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रविदास की वाणी से गूंजा समरसता महोत्सव:पहुंचे हजारों लोग, 30 बालिकाओं और 27 समाजसेवियों का सम्मान
संत रविदास के भजनों पर झूमते श्रद्धालु, गूंजते जयकारे और सामाजिक समरसता का संदेश। बीएसएनएल ग्राउंड, तारघर चौराहा पर आयोजित तीन दिवसीय समरसता महोत्सव के अंतिम दिन रविवार को करीब 5 से 6 हजार लोगों की भीड़ उमड़ी। पंडाल खचाखच भर गया, जबकि बड़ी संख्या में लोग बाहर खड़े होकर कार्यक्रम से जुड़े रहे। संत शिरोमणि गुरु रविदास जी महासभा की ओर से संत रविदास महाराज की 650वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित महोत्सव में भक्ति के साथ जातिगत भेदभाव मिटाकर समाज को जोड़ने का संदेश दिया गया। कार्यक्रम में बच्चों से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक ने भागीदारी की। कार्यक्रम की शुरुआत क्षेत्र कार्यवाह, पश्चिमी उत्तर प्रदेश डॉ. प्रमोद शर्मा के बौद्धिक सत्र से हुई। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता केवल मंचों और आयोजनों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे रोजमर्रा के व्यवहार में उतारना जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संत रविदास जी की 650वीं जयंती पर देशभर में सामाजिक समरसता का भाव मजबूत करने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से संदेश दिया जा रहा है। कन्याकुमारी से असम तक अनेक स्थानों पर समरसता के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश में कोई व्यक्ति केवल किसी जाति या समाज का सदस्य नहीं, बल्कि सबसे पहले भारत माता का पुत्र है। जब यह भाव व्यवहार में आएगा, तभी वास्तविक सामाजिक समरसता स्थापित होगी। मुख्य वक्ता भारत के प्रथम राष्ट्र मंदिर विश्व रामायण आश्रम, दिल्ली के संस्थापक भाई जी अजय ने हनुमान चालीसा के पाठ के साथ कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। रामधुन के बीच उन्होंने 'मेरे तो गिरधर गोपाल' और 'पायो जी मैंने राम रतन धन पायो' जैसे भजनों का गायन किया। भजनों की धुन पर श्रद्धालु झूमते और जयकारे लगाते नजर आए। भाई जी अजय ने कहा कि ब्रजभूमि हमारे आराध्य की भूमि है और यहां की संस्कृति का मूल भक्ति है। हर व्यक्ति में परमात्मा के दर्शन करने की दृष्टि विकसित होनी चाहिए। जिसके भीतर यह दृष्टि आ जाती है, वही सच्चे अर्थों में संत कहलाता है। संत रविदास जी प्रेम, भक्ति और निर्मलता की मूर्ति थे। उनके जीवन आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। संत-महात्माओं की वाणी पुष्प की सुगंध की

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