सेंट्रल बार लखनऊ अध्यक्ष-महामंत्री का लाइसेंस निलंबित:अगले आदेश तक नहीं कर पाएंगे वकालत, 11 अक्टूबर को अगली सुनवाई

Sep 26, 2026 - 19:49
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सेंट्रल बार लखनऊ अध्यक्ष-महामंत्री का लाइसेंस निलंबित:अगले आदेश तक नहीं कर पाएंगे वकालत, 11 अक्टूबर को अगली सुनवाई
प्रयागराज बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश की अनुशासन समिति ने सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महामंत्री अवनीश दीक्षित के खिलाफ चल रहे मामले में बड़ा आदेश दिया है। समिति ने दोनों अधिवक्ताओं का पंजीकरण लाइसेंस अगले आदेश तक निलंबित रखने और उन्हें किसी भी न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में पेश नहीं होने का निर्देश दिया है। मामले में अगली सुनवाई 11 अक्टूबर 2026 को होगी। बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश की ओर से शनिवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, 23 अगस्त 2026 की सामान्य बैठक में प्रस्ताव पारित कर परमानंद श्रीवास्तव को सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ की एल्डर्स कमेटी का चेयरमैन घोषित किया गया था। साथ ही एक महीने के भीतर चुनाव कराने के निर्देश दिए गए थे। चुनाव की निगरानी के लिए बार काउंसिल के पांच सदस्यों को पर्यवेक्षक भी नियुक्त किया गया था। आरोप है कि बार काउंसिल के इस प्रस्ताव को सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और महामंत्री ने सदन में रखकर खारिज कर दिया। इसके बाद 8 सितंबर को बार काउंसिल की वर्चुअल आपात बैठक में अखिलेश जायसवाल और अवनीश दीक्षित को निलंबित करते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। मामला सुनवाई के लिए अनुशासन समिति को भेजा गया। दोनों पदाधिकारियों ने इस कार्रवाई के खिलाफ बार काउंसिल ऑफ इंडिया में आवेदन किया था। 10 सितंबर को बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने आदेश दिया कि कोई आगे की कार्रवाई करने से पहले दोनों को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाए। इसके बाद बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश ने मामले को दोबारा अनुशासन समिति के समक्ष भेजा। 26 सितंबर को हुई सुनवाई में दोनों अधिवक्ता अपने वकील अनीश कुमार सिंह के साथ समिति के सामने पेश हुए। उनके वकील ने वकालतनामा दाखिल किया और शिकायत की प्रति उपलब्ध कराने के लिए आवेदन दिया। बार काउंसिल के अनुसार, दोनों के खिलाफ आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। आरोपों में बार काउंसिल के प्रस्ताव और अध्यक्ष के आदेश को खारिज करना तथा इसकी जानकारी दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित कराना शामिल है। अनुशासन समिति ने मामले की अगली सुनवाई 11 अक्टूबर को तय करते हुए तब तक दोनों के पंजीकरण लाइसेंस निलंबित रखने का आदेश दिया है। इस अवधि में दोनों किसी न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में उपस्थित नहीं हो सकेंगे।

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