सपा के थप्पड़ कांड से भाजपा में टेंशन:निषाद-ठाकुर आमने-सामने, पूर्वांचल में भाजपा के लिए क्यों बढ़ सकती है मुश्किलें?
गोरखपुर में सपा के दो नेताओं के बीच थप्पड़ कांड ने भाजपा की टेंशन बढ़ा दी है। क्योंकि थप्पड़ मारने वाले नेता ठाकुर बिरादरी से हैं, जबकि मार खाने वाले निषाद हैं। 2027 के चुनाव से पहले भाजपा इन दोनों बिरादरी में किसी को भी नाराज करने का रिस्क नहीं लेना चाहती है। पूर्वांचल में निषाद बनाम ठाकुर की गोलबंदी शुरू हो चुकी है। ये दोनों ही समाज भाजपा के लिए खास हैं। ये घटना 3 अक्टूबर 2026 को गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब में हुई थी। कुर्सी पर आगे बैठने को लेकर विवाद शुरू हुआ। सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष नगीना प्रसाद साहनी को, टिकट के दावेदार नेता अंशुमान सिंह के बेटे कमलेश सिंह ने थप्पड़ जड़ दिया। इसका वीडियो भी वायरल हुआ था। निषाद पार्टी के अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद ने इसे निषाद समाज के अपमान से जोड़ा है। जवाब में क्षत्रिय समाज के लोगों ने बैठकें शुरू कर दीं। विरोध और पलटवार के बीच विवाद गोरखपुर से निकलकर पूर्वांचल के दूसरे जिलों तक पहुंचने के संकेत दे रहा है। अब सवाल है कि पूर्वांचल में ठाकुर और निषाद समाज के आमने-सामने आने से भाजपा की मुश्किलें कितनी बढ़ सकती हैं? अगर विधानसभा चुनाव में दोनों समुदाय एक-दूसरे के खिलाफ वोट करते हैं, तो किसे सबसे ज्यादा नुकसान होगा? पढ़िए पूरी रिपोर्ट… संजय निषाद ने कहा- हाथ काट लिया जाएगा राम नगीना साहनी निषाद समाज से आते हैं। इसलिए निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद उनके समर्थन में उतर आए। उन्होंने एक सभा में अपने समर्थकों से कहा- निषाद पार्टी का झंडा और डंडा लगाइए। कोई आंख दिखाए तो उसकी आंख निकाल लेंगे। अगर कोई हाथ उठाएगा, तो उसका हाथ काट लिया जाएगा। ठाकुर समाज बोला- हाथ के बदले गर्दन होगा संजय निषाद के बयानों के बाद गोरखपुर में अंशुमान सिंह के समर्थन में क्षत्रिय समाज के लोगों की बैठकें होने लगीं। बांसगांव नगर पंचायत अध्यक्ष विजय सिंह उर्फ बबलू ने भी जवाब दिया। इस दौरान हाथ के बदले गर्दन काटने जैसी आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल हुआ। क्षत्रिय समाज के कुछ लोगों ने संजय निषाद के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की। सपा की ओर से रामभुआल निषाद ने संभाला मोर्चा 9 अक्टूबर को ठाकुर समाज की बैठक के जवाब में सपा नेता और सुल्तानपुर के सांसद रामभुआल निषाद ने मोर्चा संभाला। उन्होंने गोरखपुर जिले के रुस्तमपुर स्थित निषादराज मंदिर परिसर में निषाद समाज की महापंचायत बुलाई। इस महापंचायत में पूर्वांचल के कई जिलों से निषाद समाज के लोग जुटे थे। रामभुआल ने कहा कि नगीना प्रसाद साहनी को थप्पड़ मारने वाले व्यक्ति के समाज का कोई भी प्रत्याशी किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ेगा, तो निषाद समाज उसे वोट नहीं देगा। भाजपा के लिए क्यों अहम हैं ठाकुर और निषाद वोट पूर्वांचल में ठाकुर समाज का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव लंबे समय से रहा है। वहीं, गैर-यादव ओबीसी जातियों को अपने साथ जोड़ने की भाजपा की रणनीति में निषाद समाज की अहम भूमिका रही है। 2017 के बाद भाजपा ने छोटी पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने पर जोर दिया। इसी कड़ी में निषाद पार्टी के साथ गठबंधन से ये समीकरण और मजबूत हुआ। निषाद समाज की राजनीतिक अहमियत सिर्फ गोरखपुर तक सीमित नहीं है। पूर्वी यूपी के संतकबीरनगर, बस्ती, देवरिया, कुशीनगर, मऊ, बलिया, गाजीपुर, जौनपुर और वाराणसी समेत कई जिलों में इस समाज की मौजूदगी चुनावी नतीजों पर असर डाल सकती है। वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय के मुताबिक, भाजपा के सामने चुनौती ठाकुर और निषाद, दोनों समाजों को साथ लेकर चलने की है। विवाद बढ़ने पर एक समाज की नाराजगी दूसरे को एकजुट कर सकती है। इसका असर सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि सपा और निषाद पार्टी की रणनीति पर भी पड़ सकता है। जब-जब पूर्वांचल में निषाद समाज भाजपा से दूर हुआ, पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। 2018 के गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में भी निषाद समाज की भूमिका अहम रही। इस चुनाव में निषाद पार्टी के समर्थन से सपा के प्रवीण कुमार निषाद ने भाजपा को हराया था।
भाजपा के लिए आगे 'कुआं, पीछे खाई' जैसी स्थिति पूर्वांचल में भाजपा की चुनावी रणनीति में उच्च जातियों, खासकर ठाकुर समाज और गैर-यादव ओबीसी जातियों का अहम योगदान रहा है। निषाद समाज को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग लंबे समय से उठती रही है। संजय निषाद की राजनीति में भी यह मुद्दा प्रमुख रहा है। भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद यह मांग पूरी नहीं हुई है। ऐसे में निषाद समाज के एक वर्ग की नाराजगी को सिर्फ मौजूदा विवाद से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। अगर थप्पड़ कांड और उसके बाद की बयानबाजी को निषाद समाज के सम्मान के सवाल के रूप में लगातार उठाया जाता है, तो यह पहले से मौजूद असंतोष को हवा दे सकता है। इसमें अभी यह देखना अहम होगा कि संजय निषाद इस मुद्दे को किस हद तक राजनीतिक अभियान में बदलते हैं और भाजपा नेतृत्व इस पर क्या रुख अपनाता है। अब जब दोनों समुदाय आमने-सामने हैं, तो भाजपा के लिए 'कुआं और खाई' जैसी स्थिति बन गई है। किसी एक पक्ष के समर्थन में बोलने पर दूसरे समाज के नाराज होने का सीधा खतरा है, यही वजह है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम पर मौन साधे हुए है। पूर्वांचल की 42 सीटों पर निर्णायक हैं निषाद वोटर्स राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पूर्वांचल की 124 विधानसभा सीटों में से लगभग 42 सीटों पर निषाद समाज निर्णायक भूमिका में है, जहां इनकी आबादी 50 हजार से 80 हजार के बीच है। 2022 विधानसभा चुनाव- भाजपा ने गोरखपुर की सभी 9 सीटें जीती। इनमें निषाद बहुल गोरखपुर ग्रामीण, पिपराइच, कैंपियरगंज, सहजनवा, चौरीचौरा और बांसगांव सीटें शामिल थीं। 2018 उपचुनाव की सीख- 2018 के गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में जब निषाद समाज भाजपा के खिलाफ हुआ था, तब भाजपा को अपनी पारंपरिक सीट गंवानी पड़ी थी। संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद चुनाव जीत गए थे। वहीं, 2017 में भाजपा की बड़ी जीत के बावजूद वह चिल्लूपार सीट हार गई थी। उस समय निषाद पार्टी भाजपा के विरोध में थी। इसी तरह जौनपुर जिले की शाहगंज सीट पर भी निषाद पार्टी ने 2022 में जीत दर्ज की। पार्टी ने यहां ठाकुर प्रत्याशी उतारा था और सपा से ये सीट छीन ली थी। निषाद पार्टी ने सपा की मजबूत मानी जाने वाली भदोही की ज्ञानपुर और महाराजगंज की नौतनवां सीटों पर भी जीत दर्ज की थी। वहीं, निषाद पार्टी के साथ गठबंधन से भाजपा को देवरिया, कुशीनगर और संतकबीरनगर जिलों की कई सीटें जीतने में मदद मिली। अगर आगामी चुनावों में ठाकुर और निषाद समाज एक-दूसरे के प्रत्याशियों के खिलाफ लामबंद होते हैं, तो गोरखपुर सदर, कैम्पियरगंज और गोरखपुर ग्रामीण जैसी उन सीटों पर भाजपा को अपनी रणनीति पूरी तरह बदलनी पड़ सकती है, जहां वर्तमान में ठाकुर विधायक हैं। सपा के लिए क्या है चुनौती? इस विवाद से सपा की मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं। घटना पार्टी के ही कार्यक्रम में हुई, जिससे संगठन के अनुशासन पर सवाल उठे। पार्टी ने अंशुमान सिंह को निष्कासित कर कार्रवाई का संदेश दिया। इसके अलावा, गोरखपुर की जिला और महानगर इकाइयों को भी भंग कर दिया। अगर निषाद समाज में इस घटना को लेकर नाराजगी बनी रहती है, तो भाजपा और निषाद पार्टी इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकती हैं। वे आरोप लगा सकती हैं कि सपा में निषाद समाज का सम्मान नहीं होता।
सपा के सामने निषाद समाज की नाराजगी दूर करने की चुनौती होगी। पार्टी उम्मीदवारों के चयन में निषाद और दूसरी ओबीसी जातियों को कितनी जगह देती है, यह भी अहम हो सकता है। हालांकि, अभी ये कहना मुश्किल है कि सपा इस विवाद के असर को कम करने के लिए टिकट बंटवारे में कोई बदलाव करेगी। --------------- ये भी पढ़ें- राहुल से बिना मिले दिल्ली से लौटे अजय राय:क्या कांग्रेस छोड़ेंगे, अनुप्रिया के साथ सियासी पारी शुरू की तो सीट पर पेंच फंसेगा
यूपी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अजय राय आज, शनिवार को वाराणसी के पिंडरा में मां नकटेश्वरी धाम में शक्ति प्रदर्शन करेंगे। वह पार्टी से नाराज बताए जा रहे हैं। इसकी वजह 11 अक्टूबर को लखनऊ के पार्टी मुख्यालय में ममता चौधरी के साथ हुआ विवाद है। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या अजय राय कांग्रेस छोड़ देंगे? अगर पार्टी छोड़ते हैं, तो क्या पुराने दल में वापसी करेंगे? पढ़िए पूरी स्टोरी…
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