UP में BJP की राज्यसभा सूची आते ही बगावत:बरेली में पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप बोले- 'टाटा बाय-बाय'; सपा में जाने की अटकलें, समर्थकों ने उठाया परिवारवाद का मुद्दा
भारतीय जनता पार्टी द्वारा राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची जारी करते ही बरेली के सियासी गलियारों में घमासान मच गया है। पार्टी ने बरेली से झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार और आंवला विधायक व कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह को उच्च सदन का प्रत्याशी बनाया है। एक तरफ जहां समर्थकों में जश्न का माहौल है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के अंदरखाने बगावत के सुर तेज हो गए हैं। आंवला से पूर्व सांसद और कश्यप समाज के कद्दावर नेता धर्मेंद्र कश्यप ने सोशल मीडिया पर मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर महज तीन शब्द लिखे- "टाटा, बाय-बाय..."। इस पोस्ट के बाद सियासी हलकों में हलचल मच गई है और कयास लगाए जा रहे हैं कि पूर्व सांसद जल्द ही भाजपा छोड़ समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं। 3 घंटे में 450 से ज्यादा कमेंट्स, समर्थकों ने लिखा- 'भाजपा में भी परिवारवाद'
धर्मेंद्र कश्यप की इस पोस्ट पर उनके समर्थकों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। पोस्ट पर 450 से अधिक कमेंट आ चुके हैं, जिनमें अधिकांश लोग भाजपा के फैसले पर नाराजगी जता रहे हैं। कार्यकर्ताओं का सीधा आरोप है कि पार्टी में अब समर्पित नेताओं की अनदेखी कर परिवारवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। लोकसभा में हार के बाद राज्यसभा की थी उम्मीद
बीते लोकसभा चुनाव में आंवला सीट से धर्मेंद्र कश्यप को सपा उम्मीदवार नीरज मौर्य के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद से ही राजनीतिक हलकों में चर्चा थी कि कश्यप समाज के बड़े जनाधार को साधने के लिए भाजपा संगठन उन्हें संगठन में कोई बड़ा ओहदा देगा या फिर राज्यसभा भेजेगा।
हालांकि, सूची में नाम न आने से धर्मेंद्र कश्यप और उनके गुट में भारी मायूसी छा गई। इसके अलावा, उनकी बेटी कीर्ति कश्यप भी बदायूं की दातागंज सीट से सक्रिय रहकर राजनीतिक जमीन तलाश रही थीं, लेकिन पार्टी की ओर से परिवार को पूरी तरह नजरअंदाज किए जाने से असंतोष चरम पर पहुंच गया। बरेली से लखनऊ तक के 3 बड़े सियासी मायने
साइकिल पर सवार होने की चर्चा तेज: धर्मेंद्र कश्यप राजनीति के शुरुआती दिनों में समाजवादी पार्टी में ही थे और बाद में भाजपा में शामिल हुए थे। अब चर्चा है कि वे अपनी पुरानी जमीन पर 'घर वापसी' कर सकते हैं। ओबीसी वोट बैंक पर सीधा असर: रुहेलखंड से लेकर पूरे उत्तर प्रदेश में कश्यप बिरादरी का मजबूत वोट बैंक है। धर्मेंद्र कश्यप के छिटकने से भाजपा को इस बड़े पिछड़े वर्ग के नुकसान का खतरा झेलना पड़ सकता है। सपा को मिलेगा मजबूत चेहरा: यदि कश्यप सपा में वापसी करते हैं, तो बरेली-बदायूं बेल्ट में अखिलेश यादव के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को जमीनी स्तर पर बड़ा बूस्ट मिलेगा।
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