यहां रावण को जलाते नहीं-गांव का बेटा मानकर पूजते हैं:नोएडा के बिसरख में नहीं होती रामलीला, पुतला भी नहीं जलाया जाता

Oct 20, 2026 - 06:45
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यहां रावण को जलाते नहीं-गांव का बेटा मानकर पूजते हैं:नोएडा के बिसरख में नहीं होती रामलीला, पुतला भी नहीं जलाया जाता
नोएडा से करीब 15 किलोमीटर दूर बिसरख गांव में दशहरा बाकी जगहों से अलग होता है। यहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि उसे गांव का बेटा मानकर पूजा की जाती है। स्थानीय मान्यता है कि रावण का जन्म इसी गांव में हुआ था। यहां रावण के पिता ऋषि विश्रव से जुड़ा शिव मंदिर भी है। दशहरे पर गांव में शस्त्र पूजन किया जाएगा। गांव के लोग रामलीला और रावण दहन को अनिष्ट से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि करीब 60 साल पहले रामलीला का मंचन कराया गया था, लेकिन इसके बाद एक व्यक्ति की मौत हो गई। कुछ साल बाद दोबारा रामलीला हुई तो एक पात्र की मौत हो गई और गांव में कई जगह आग लगने की घटनाएं हुईं। हालांकि, इन घटनाओं और रामलीला के बीच किसी संबंध की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। विश्रव ऋषि के नाम पर पड़ा गांव का नाम स्थानीय मान्यता के अनुसार, बिसरख का नाम रावण के पिता ऋषि विश्रव के नाम पर पड़ा। कहा जाता है कि विश्रव ऋषि यहां पूजा-अर्चना करते थे और रावण ने भी इसी गांव में शिक्षा प्राप्त की थी। मंदिर के बाहर बने चित्रों में दस सिर वाले रावण और शिवलिंग पर अपना सिर चढ़ाते हुए दृश्य दिखाए गए हैं। मंदिर के पुजारी विनय भारद्वाज के मुताबिक, यहां स्थापित अष्टभुजी शिवलिंग को रावण के बाबा पुलस्त्य ऋषि से जोड़ा जाता है। शिवपुराण से भी जुड़ी है मान्यता गांव के लोगों के मुताबिक, बिसरख का जिक्र शिवपुराण में मिलता है। मान्यता है कि त्रेता युग में यहां विश्रव ऋषि का जन्म हुआ था और उन्होंने अष्टभुजी शिवलिंग की स्थापना की थी। स्थानीय दावों के अनुसार, गांव में अब तक 25 शिवलिंग मिल चुके हैं। इनमें से एक शिवलिंग की गहराई जानने के लिए खुदाई भी कराई गई थी, लेकिन उसका अंतिम छोर नहीं मिला। स्थानीय जानकारी के मुताबिक, वर्ष 1984 में तांत्रिक चंद्रास्वामी ने मंदिर के शिवलिंग की खुदाई कराई थी। करीब 20 फीट तक खुदाई के बाद भी उसका छोर नहीं मिला। इस दौरान एक गुफा और 24 मुखी शंख मिलने का भी दावा किया जाता है। बताया जाता है कि चंद्रास्वामी शंख अपने साथ ले गए थे। दो बार रामलीला, मौतों के बाद बंद हुआ आयोजन बिसरख में रामलीला नहीं कराने के पीछे गांव की पुरानी मान्यता बताई जाती है। शिव मंदिर के पुजारी महंत रामदास के मुताबिक, करीब 60 साल पहले पहली बार रामलीला का आयोजन हुआ था। जिस व्यक्ति के घर के सामने मंचन हुआ, उसके बेटे की मौत हो गई। गांव के लोगों का दावा है कि बाद में दोबारा रामलीला कराने पर भी एक पात्र की मौत हुई और कई जगह आग लगने की घटनाएं हुईं। इसके बाद से गांव में रामलीला और रावण दहन नहीं कराया जाता। दशहरे पर रावण दहन नहीं, शस्त्र पूजन बिसरख में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन करने के बजाय शस्त्र पूजन किया जाता है। गांव की यह परंपरा इसे आसपास के दूसरे इलाकों से अलग पहचान देती है। यहां रावण को बुराई के प्रतीक के बजाय अपने गांव से जुड़ी धार्मिक मान्यता के रूप में देखा जाता है।

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