कनॉट प्लेस प्रदर्शन पर नेहा बोरा का बड़ा दावा, उच्च न्यायालय में नोटिस को चुनौती
दिल्ली उच्च न्यायालय में छात्र संगठन एआईएसए की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर सुनवाई के दौरान उनके वकील ने विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की ओर से जारी नोटिस को असंवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के विरुद्ध बताया। वकील का दावा है कि नेहा बोरा ने कनॉट प्लेस में प्रदर्शन का आह्वान नहीं किया था, बल्कि उन्होंने मंडी हाउस में बैठक बुलाने की अपील की थी। उन्होंने यह भी कहा कि जांच पूरी होने से पहले व्यक्तिगत मुचलका मांगना उचित नहीं है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 22 अक्टूबर 2026
दिल्ली उच्च न्यायालय में छात्र संगठन एआईएसए की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर सुनवाई हुई। इस याचिका में उन्होंने विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उनसे दस हजार रुपये का व्यक्तिगत मुचलका भरने और शांति बनाए रखने के लिए कहा गया है। सुनवाई के दौरान उनके वकील गोपाल शंकरनारायणन ने नोटिस की वैधानिकता पर सवाल उठाए और इसे असंवैधानिक बताया। उन्होंने अदालत में दलील दी कि नेहा बोरा ने कनॉट प्लेस में प्रदर्शन का आह्वान नहीं किया था।
कनॉट प्लेस प्रदर्शन से नेहा बोरा का संबंध होने पर सवाल
सुनवाई के दौरान नेहा बोरा के वकील ने स्पष्ट किया कि कनॉट प्लेस में आयोजित प्रदर्शन किसी दूसरे संगठन की ओर से बुलाया गया था। उनके अनुसार, नेहा बोरा ने केवल मंडी हाउस में बैठक करने का आह्वान किया था। वकील ने कहा कि उनकी मुवक्किल की ओर से साझा किए गए संदेश में हिंसा भड़काने, कानून तोड़ने या सार्वजनिक शांति भंग करने की कोई अपील नहीं थी। ऐसे में उनके खिलाफ जारी नोटिस के आधार और उसमें लगाए गए आरोपों की जांच जरूरी है।
व्यक्तिगत मुचलके की मांग पर वकील ने उठाए सवाल
नेहा बोरा की ओर से पेश वकील ने अदालत में दलील दी कि किसी व्यक्ति से व्यक्तिगत मुचलका भरवाने की प्रक्रिया शुरू करने से पहले आवश्यक जांच पूरी की जानी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि संबंधित नोटिस बिना पर्याप्त जांच के तैयार किया गया है और उसमें पहले से तैयार सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। वकील ने सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों वाली पीठ के फैसले का हवाला देते हुए अपनी दलील रखी। उनका कहना था कि जांच पूरी होने से पहले मुचलके की मांग करना उचित नहीं है।
अदालत ने मजिस्ट्रेट की भूमिका पर पूछा सवाल
सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने नेहा बोरा के वकील से पूछा कि संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत उठाए गए मुद्दे पर सीधे उच्च न्यायालय में सुनवाई की जरूरत है या संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रक्रिया के तहत बात रखी जानी चाहिए। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या सुनवाई को व्यापक संवैधानिक सवालों तक ले जाने के बजाय दंड प्रक्रिया से संबंधित धारा 126 के तहत जारी नोटिस और उसके आधार तक सीमित रखा जाना चाहिए। न्यायालय ने इस तरह मामले की सुनवाई के दायरे को लेकर सवाल उठाए। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर इस सुनवाई में अंतिम निर्णय की पुष्टि नहीं होती है।
मंडी हाउस की बैठक और तिरंगा फहराने की अनुमति का मुद्दा
वकील गोपाल शंकरनारायणन के अनुसार, नेहा बोरा ने 15 अक्टूबर को प्रेस क्लब में संवाददाता सम्मेलन किया था। इसके बाद 16 अक्टूबर को जंतर-मंतर को अचानक प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के विरोध में उन्होंने मंडी हाउस में बैठक करने का आह्वान किया था। वकील ने दलील दी कि उनके संदेश में किसी तरह की हिंसा या कानून तोड़ने की बात नहीं थी। उन्होंने नोटिस में बिना अनुमति राष्ट्रीय ध्वज फहराने से संबंधित उल्लेख पर भी सवाल उठाए और कहा कि तिरंगा फहराने के लिए हर स्थिति में अनुमति आवश्यक होने का दावा सही नहीं है।
पुलिस अधिकारी के पास मजिस्ट्रेट की भूमिका होने पर भी आपत्ति
नेहा बोरा के वकील ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कार्रवाई वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर शुरू की गई, जबकि नोटिस जारी करने वाले विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट स्वयं सहायक पुलिस आयुक्त के पद पर कार्यरत पुलिस अधिकारी हैं। बचाव पक्ष ने इस प्रक्रिया की वैधानिकता और निष्पक्षता पर आपत्ति जताई। अब मामले में अदालत के सामने मुख्य प्रश्न नोटिस के आधार, व्यक्तिगत मुचलके की मांग और संबंधित कानूनी प्रक्रिया से जुड़े हैं।
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