530 करोड़ खर्च फिर भी एपी बांध पर खतरा:कुशीनगर में नेपाल से पानी आते ही बढ़ जाता है दबाव

Oct 02, 2026 - 09:18
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530 करोड़ खर्च फिर भी एपी बांध पर खतरा:कुशीनगर में नेपाल से पानी आते ही बढ़ जाता है दबाव
कुशीनगर में तमकुहीराज तहसील क्षेत्र में नारायणी नदी के किनारे करीब 17.06 किलोमीटर लंबे एपी बांध की सुरक्षा पर पिछले 10 साल में करीब 530 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन नेपाल से पानी आने के बाद हर साल बांध पर दबाव बढ़ जाता है। कहीं रिसाव तो कहीं कटान से बांध के कमजोर हिस्से चिंता बढ़ाते हैं और लाखों लोगों का जीवन संकट में पड़ जाता है । बांध की मरम्मत और सुरक्षा पर लगातार करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं निकल सका है। प्राप्त जानकारी के अनुसार एपी बांध पर 2025 में 72.06 करोड़, 2024 में 31.16 करोड़, 2023 में 14.70 करोड़ और 2022 में 26.34 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इन आंकड़ों को मिलाकर पांच साल में बाढ़ बचाव कार्यों पर 176.67 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। इसके अलावा मरम्मत, अनुरक्षण कार्य, नरकट काटने, रेनकट और रेट होल आदि पर भी पांच साल में करीब 250 करोड़ रुपये खर्च किए गए। पिछले दस वर्षों में एपी बांध के रखरखाव, मरम्मत, सुदृढ़ीकरण और बाढ़ सुरक्षा कार्यों पर करीब 530 करोड़ रुपये अलग-अलग परियोजनाओं के माध्यम से खर्च किए गए हैं। इसके बावजूद मानसून में बांध के कमजोर हिस्सों पर खतरा बना रहता है। नारायणी नदी में नेपाल से पानी छोड़े जाने के बाद बांध पर दबाव तेजी से बढ़ता है। 5.43 लाख क्यूसेक तक पहुंच गया आंकड़ों के अनुसार, नदी में 2025 में 4.5 लाख क्यूसेक, 2024 में 3.5 लाख क्यूसेक, 2023 में 3.75 लाख क्यूसेक और 2022 में 4 लाख क्यूसेक तक अधिकतम पानी डिस्चार्ज आंका गया था। मौजूदा परिस्थितियों में अधिकतम डिस्चार्ज 5.43 लाख क्यूसेक तक पहुंच गया था। बांध के कमजोर हिस्सों में रिसाव और कटान की शिकायत मिलने पर अधिकारियों की टीम मौके पर पहुंचती है। संवेदनशील स्थानों पर ठोकर, स्पर और अन्य सुरक्षा कार्य कराए जाते हैं। बांध जहां कमजोर होता है, वहां रिपोर्ट बाढ़ खंड की ओर से शासन को भेजी जाती है। हाई लेवल कमेटी के सर्वे के बाद परियोजना को स्वीकृति मिलती है। बता दें कि एपी बांध पूर्व में 1984, 2002 और 2007 में टूट चुका है। वर्ष 2002 में बांध दो स्थानों पर टूटा था और उस समय सेवरही कस्बे तक पानी पहुंच गया था। सोमवार की रात भी पानी के दबाव के बाद एक बार फिर यह बांध चर्चा में है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि हर साल मरम्मत और बचाव कार्यों पर बड़ी रकम खर्च होती है, लेकिन मानसून आते ही बांध के कमजोर हिस्सों को लेकर चिंता फिर शुरू हो जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, बांध की ऊंचाई, ढाल, पिचिंग और कटान वाले हिस्सों को वैज्ञानिक तरीके से स्थायी रूप से मजबूत किए जाने की जरूरत है। परियोजना को स्वीकृति मिलती डीएम संजय चौहान ने बताया कि बांध जहां कमजोर होता है, उसकी रिपोर्ट बाढ़ खंड की ओर से शासन को भेजी जाती है। हाई लेवल कमेटी के सर्वे के बाद परियोजना को स्वीकृति मिलती है। उन्होंने बताया कि जहां बांध इस बार टूटे हैं, वहां पहले कोई कार्य नहीं हुआ था। स्थानीय लोग बताते हैं कि बाढ़ बचाव के नाम यहां प्रतिवर्ष बड़ा खेल भी होता है । टेंडर लेने वाली बड़ी बड़ी कंपनियों से जुड़े लोग कागजों में ही बचाव कार्य में लगने वाले सामानों की आपूर्ति करके लाखों रुपए का बंदरबांट कर लेते हैं । लोगों का कहना था कि ऐसा इस बार भी हुआ है ।

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