भारत में वैदिक काल से ही रही है लोकतांत्रिक परंपरा:गोरखनाथ मंदिर में आयोजित साप्ताहिक संगोष्ठी में बोले प्रो. योगेंद्र

Sep 26, 2026 - 13:11
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भारत में वैदिक काल से ही रही है लोकतांत्रिक परंपरा:गोरखनाथ मंदिर में आयोजित साप्ताहिक संगोष्ठी में बोले प्रो. योगेंद्र
ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं एवं ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित साप्ताहिक संगोष्ठी के तीसरे "लोकतंत्र की जननी है भारत" पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज के निदेशक प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि पूर्व के इतिहासकारों ने पुस्तकों में अनेक भ्रांतियां प्रस्तुत की हैं। यह पढ़ाया गया कि वास्को-डि-गामा ने भारत की खोज की। अंग्रेजों को लोकतंत्र का जनक बताया गया, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत में वैदिक काल से ही लोकतांत्रिक परंपराएं विद्यमान रही हैं। अंग्रेजों ने भारतीयों मं इस प्रकार की हीनभावना भर दी कि हम अपनी वैदिक संस्कृति को कमतर और पाश्चात्य संस्कृति को श्रेष्ठ मानने लगे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में लोकमत और राजनय (डिप्लोमेसी), दोनों की प्रधानता होती है और यह व्यवस्था भारत में प्राचीन काल से चली आ रही है। भारत में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पूजा-पद्धति और अपने इष्टदेव का चयन करने की स्वतंत्रता रही है। यहां तक कि राजा का चयन भी लोक की इच्छा के अधीन रहा। आज हम समाज को विभिन्न जातियों और संप्रदायों में बांटकर देखते हैं, जबकि रामायण और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करें तो उनमें भी सामाजिक एवं राजकीय व्यवस्था के लोकतांत्रिक स्वरूप के अनेक उदाहरण मिलते हैं। प्रो. सिंह ने कहा कि भारत में हजारों वर्ष पूर्व लिच्छवी गणराज्य जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं विद्यमान थीं। भारत का स्वभाव और प्रकृति ही लोकतांत्रिक रही है। यहां प्रत्येक व्यवस्था में समाज के विभिन्न अंगों की सहभागिता सुनिश्चित की जाती रही है। जब लोकनय कमजोर होता है, तब योगी आदित्यनाथ जैसे योगी महापुरुष राजनेता के रूप में सामने आते हैं। भारत सांस्कृतिक राष्ट्र है और लोकतंत्र उसकी संस्कृति का मूल हिस्सा है। हम राजनीतिक रूप से गुलाम रहे, लेकिन सांस्कृतिक रूप से कभी गुलाम नहीं हुए। हमारे पर्व, त्योहार और संस्कार किसी राजा के अधीन नहीं, बल्कि लोक परंपरा से संचालित होते रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भ्रामक इतिहास की पुस्तकों के अध्ययन से जो दृष्टिदोष उत्पन्न हुआ है, उसे दूर करने का समय आ गया है। जब हम भारत के गौरवशाली अतीत को जानेंगे, तब यह स्पष्ट होगा कि भारत लोकतंत्र की जननी रहा है। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हनुमानगढ़ी, अयोध्या के महंत राजूदास ने कहा कि भारत का लोकतंत्र अन्य देशों से इसलिए विशिष्ट है, क्योंकि यहां जन-जन की भावनाओं का सम्मान किया जाता है। भगवान राम के समय का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब एक सामान्य व्यक्ति अपने घर में अपनी पत्नी को डांटते हुए माता सीता को लेकर टिप्पणी करता है, तो राजा रामचंद्र ने लोकमत की मर्यादा को सर्वोपरि रखते हुए सीता जी का परित्याग किया। इससे बड़ा उदाहरण दुनिया में कहीं नहीं मिलता। इसी आदर्श भावना के कारण लोकतंत्र की मर्यादा हमारे प्राचीन काव्यों में हजारों स्थानों पर दिखाई देती है। वर्तमान में भी देश और प्रदेश की सरकारों में लोकतांत्रिक व्यवस्था को देखा जा सकता है। नीमच, मध्य प्रदेश से पधारे योगी लालनाथ ने कहा कि प्राचीन काल में राजा होने के बावजूद गांवों और क्षेत्रों में छोटी-छोटी पंचायतें होती थीं। वहां के निर्णय जनता की सहमति और सहभागिता पर आधारित होते थे, जिन्हें राजा की मान्यता भी प्राप्त होती थी। अंग्रेजों ने भारत की इस व्यवस्था को देखा और उसका अनुकरण अपने देशों में किया, जबकि भारत को उस व्यवस्था से वंचित रखा गया। स्वतंत्रता के बाद देश में पुनः लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई। संगोष्ठी को अयोध्या से आए महंत रामबालक दास, हिंगवा, राजस्थान से पधारे महंत डॉ. योगी महेंद्रनाथ ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता गोरक्षपीठ के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ ने की।

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