भर्ती में कथित अनियमितता के आरोपों से घिरी कुलपति:प्रयागराज की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार और विधि विभागाध्यक्ष को भेजा नोटिस

Sep 29, 2026 - 22:03
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भर्ती में कथित अनियमितता के आरोपों से घिरी कुलपति:प्रयागराज की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार और विधि विभागाध्यक्ष को भेजा नोटिस
प्रयागराज में दो वर्ष पूर्व अस्तित्व में आई डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (RPNLU) में प्रशासनिक घमासान और गहराता जा रहा है। यूनिवर्सिटी की कुलपति डॉ. उषा टंडन पर असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती प्रक्रिया में कथित धांधली व मनमानी के गंभीर आरोप लगे हैं। मामले की जांच तीन प्रमुख सचिवों की उच्चस्तरीय समिति कर रही है। इस जांच के बीच कुलपति ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार और विधि विभागाध्यक्ष को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है, जिसके बाद दोनों अधिकारी मेडिकल लीव (छुट्टी) पर चले गए हैं। दोनों ने कुलपति के खिलाफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (जो विश्वविद्यालय के चांसलर भी हैं) से शिकायत दर्ज कराई है। भर्ती प्रक्रिया से शुरू हुआ विवाद मामला जुलाई में शुरू हुई असिस्टेंट प्रोफेसर के 12 पदों की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। नियमों के अनुसार भर्ती प्रक्रिया रजिस्ट्रार के माध्यम से संचालित होती है, लेकिन आरोप है कि कुलपति डॉ. उषा टंडन ने रजिस्ट्रार को दरकिनार कर पूरी प्रक्रिया खुद संचालित की। 31 जुलाई को बुलाई गई चयन समिति की बैठक में दो सदस्यों ने भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के मानकों का पालन क्यों नहीं किया गया? जब कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला, तो दोनों सदस्यों ने विरोध दर्ज कराया। आरोप है कि इसके बाद कुलपति ने सर्वसम्मति के बजाय वोटिंग कराई और 4-2 के बहुमत से प्रस्ताव पास कराकर उसी रात परिणाम जारी कर दिए। हालांकि, यूजीसी मानकों की अनदेखी और भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए रजिस्ट्रार ने नियुक्ति पत्रों पर हस्ताक्षर करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। शासन स्तर पर जांच और बयानों का दौर विवाद शासन तक पहुंचने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर सीनियर आईएएस एम देवराज की अध्यक्षता में तीन प्रमुख सचिवों की एक विशेष जांच समिति गठित की गई। इस समिति ने 16 और 17 सितंबर को लखनऊ में चयन समिति के सभी 12 सदस्यों को तलब कर उनके विस्तृत बयान दर्ज किए। आरोपों की झड़ी और नोटिस का दौर जांच समिति के समक्ष बयान दर्ज होने के बाद विश्वविद्यालय के भीतर तल्खी और बढ़ गई। 21 सितंबर विधि विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक शर्मा पर दो छात्रों ने जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया। मामला कुलपति से होते हुए हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने दो दिनों के भीतर डॉ. शर्मा को कार्रवाई से स्टे दे दिया। इस विवाद के बीच कुलपति ने डॉ. शर्मा को हॉस्टल वार्डन के पद से हटाकर यह जिम्मेदारी रजिस्ट्रार को सौंपनी चाही। रजिस्ट्रार ने यह कहकर मना कर दिया कि यह पद किसी शिक्षक का है और वह प्रशासनिक पद पर हैं। फिर 26 सितंबर कुलपति ने रजिस्ट्रार को 46 पन्नों का नोटिस थमाया। इसमें नव-चयनित शिक्षकों को नियुक्ति पत्र न जारी करने और वार्डन का चार्ज न लेने का आरोप लगाया गया। रजिस्ट्रार ने इस पर कहा कि जब भर्ती जांच के दायरे में है और मानकों के विपरीत है, तो वे उस पर हस्ताक्षर नहीं कर सकते। 28 सितंबर कुलपति ने विधि विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक शर्मा को 300 पन्नों का भारी-भरकम नोटिस भेजकर 9 बिंदुओं पर जवाब मांगा। इसमें भर्ती से जुड़ी गोपनीय जानकारियां मीडिया में लीक करने और नए अभ्यर्थियों को जॉइन न कराने का आरोप लगाया गया। मुख्यमंत्री और चीफ जस्टिस से शिकायत विधि विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक शर्मा ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जब पूरी भर्ती प्रक्रिया जांच के घेरे में है, तो वे अवैध नियुक्तियों पर कार्यभार ग्रहण कैसे करा सकते हैं? उन्होंने कुलपति पर तानाशाही रवैये और बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं के भी आरोप लगाए हैं। विवाद के चरम पर पहुंचने के बाद रजिस्ट्रार और विभागाध्यक्ष दोनों अवकाश पर चले गए हैं। दोनों अधिकारियों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए विश्वविद्यालय के चेयरमैन व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और चांसलर व इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अरुण भंसाली को पत्र भेजकर सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच की है।

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