दिल्ली में इमारतें या मौत का इंतजार 35 जानें गईं

दिल्ली में इमारत ढहने की घटनाओं ने एक बार फिर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अप्रैल 2025 से अब तक छह बड़े हादसों में 35 लोगों की मौत की बात सामने आई है। सत्य निकेतन हादसे के बाद जर्जर और अनधिकृत इमारतों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

Sep 07, 2026 - 11:35
Updated: 1 month ago
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दिल्ली में इमारतें या मौत का इंतजार 35 जानें गईं

दि राइजिंग न्यूज | नई दिल्ली | 7 सितंबर 2026

दिल्ली को देश की राजधानी होने के साथ-साथ लाखों युवाओं के सपनों का शहर भी माना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र पढ़ाई और रोजगार के लिए यहां आते हैं और किराये के कमरों तथा छात्रावासों में रहते हैं। परिवार अपने बच्चों को बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ दिल्ली भेजते हैं, लेकिन जर्जर इमारतों में रहने वाले लोगों के लिए हर दिन किसी अनहोनी का खतरा बना हुआ है।राजधानी में लगातार सामने आ रहे इमारत ढहने के हादसे यह सवाल खड़ा करते हैं कि आखिर प्रशासन कब जागेगा। अप्रैल 2025 से अब तक कई बड़े हादसों में दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है। इन घटनाओं में कई इमारतों को जर्जर, निर्माणाधीन या नियमों के विपरीत बना हुआ बताया गया। इसके बावजूद समय रहते कार्रवाई नहीं होने से हादसे लगातार सामने आते रहे हैं।

सत्य निकेतन में भरभराकर गिरी इमारत

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार, 6 सितंबर को एक इमारत अचानक भरभराकर गिर गई। इस इलाके में दिल्ली विश्वविद्यालय के अलग-अलग महाविद्यालयों में पढ़ने वाले बड़ी संख्या में छात्र किराये के कमरों और छात्रावासों में रहते हैं। इमारत गिरने के बाद कई लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जताई गई।हादसे के बाद राहत और बचाव अभियान लगातार जारी रहा। करीब 20 घंटे बाद भी मलबे को हटाने और उसमें फंसे लोगों की तलाश का काम चलता रहा। शुरुआती जानकारी के अनुसार इस हादसे में छह लोगों की मौत की खबर सामने आई है, जबकि कई लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका बनी रही।

जर्जर इमारत को लेकर उठे गंभीर सवाल

सत्य निकेतन की घटना को केवल एक सामान्य हादसा मानना मुश्किल है, क्योंकि बताया जा रहा है कि हादसे का शिकार हुई इमारत करीब 30 साल पुरानी थी। इमारत लंबे समय से जर्जर स्थिति में थी और उसके आसपास मौजूद कई अन्य इमारतों की हालत भी खराब बताई गई है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर सुरक्षा जांच और समय रहते कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।बताया गया कि इलाके में कई इमारतों में जरूरत के मुताबिक बदलाव और अतिरिक्त निर्माण किए गए थे। आरोप यह भी है कि व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ाने के लिए इमारतों में अतिरिक्त मंजिलें बनाई गईं, जबकि प्रशासन की ओर से इसकी अनुमति नहीं थी। सवाल यही है कि यदि निर्माण नियमों का उल्लंघन खुले तौर पर हो रहा था तो संबंधित विभागों की नजर इस पर पहले क्यों नहीं पड़ी।

जुलाई में रोहिणी में ढही निर्माणाधीन इमारत

दिल्ली में इमारत ढहने का यह पहला बड़ा हादसा नहीं है। जुलाई 2026 में रोहिणी इलाके में एक चार मंजिला निर्माणाधीन इमारत अचानक ढह गई थी। इस हादसे में तीन मजदूरों की मौत हो गई थी, जबकि एक व्यक्ति घायल हुआ था। घटना ने निर्माण स्थलों पर मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा की थी।8 जुलाई की शाम पुलिस को इमारत गिरने की सूचना मिली थी। मौके पर पहुंची टीम ने देखा कि पूरी निर्माणाधीन इमारत मलबे में बदल चुकी थी और उसका मलबा सड़क पर फैल गया था। स्थानीय लोगों ने बताया कि हादसे के समय कुछ मजदूर वहां काम कर रहे थे और उनके मलबे में दबे होने की आशंका थी। इसके बाद राहत और बचाव अभियान चलाया गया, लेकिन चार मजदूरों में से तीन को बचाया नहीं जा सका।

साकेत के पास सैदुलाजाब में छह लोगों की मौत

30 मई को साकेत और महरौली के पास सैदुलाजाब इलाके में भी एक पांच मंजिला इमारत ढह गई थी। इस हादसे में छह लोगों की मौत हुई थी, जबकि दस लोगों को पुलिस और बचाव दल ने सुरक्षित बाहर निकाला था। हादसे के बाद इमारत के निर्माण और उसकी वैधता को लेकर भी सवाल उठे थे।बताया गया कि इमारत पूरी तरह ढहकर पास में बनी एक भोजनालय जैसी जगह पर जा गिरी थी। वहां उस समय कई लोग मौजूद थे और भोजन कर रहे थे। हादसे की गंभीरता इसलिए भी अधिक थी क्योंकि इमारत में कई कार्यालय भी संचालित होते थे। हालांकि शनिवार होने के कारण कार्यालयों में सामान्य दिनों की तुलना में कम लोग मौजूद थे।

वेलकम इलाके में भी ढही थी जर्जर इमारत

जुलाई 2025 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के वेलकम इलाके में चार मंजिला जर्जर इमारत गिरने की घटना सामने आई थी। बताया गया कि इमारत काफी पुरानी और कमजोर हो चुकी थी। अचानक इमारत के ढहने से उसमें रहने वाले लोगों की जान पर बन आई और कई लोगों की मौत हो गई।यह एक रिहायशी इमारत थी, जिसमें दस से अधिक लोग रहते थे। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल उठाया था कि राजधानी में पुरानी और कमजोर इमारतों की नियमित जांच कितनी गंभीरता से की जाती है। यदि किसी इमारत को रहने के लिए असुरक्षित माना जाता है तो वहां रह रहे लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी है, यह सवाल आज भी महत्वपूर्ण है।

पहाड़गंज में तीन मजदूरों की गई जान

17 मई 2025 को दिल्ली के पहाड़गंज इलाके में निर्माणाधीन इमारत का तहखाना ढहने से तीन मजदूरों की मौत हो गई थी। तेज आंधी और बारिश के कारण निर्माणाधीन ढांचे की दीवार कमजोर होने की बात सामने आई थी। दीवार ढहने के बाद मजदूर उसके नीचे दब गए और उन्हें बचाया नहीं जा सका।इस हादसे के बाद मृत मजदूरों के परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। रोज कमाकर परिवार चलाने वाले मजदूरों की मौत ने उनके पीछे रह गए परिवारों के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर दिए। निर्माण स्थलों पर सुरक्षा मानकों का पालन और मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन तथा निर्माण एजेंसियों की बड़ी जिम्मेदारी है।

मुस्तफाबाद में 11 लोगों की मौत

18 अप्रैल 2025 को मुस्तफाबाद इलाके में चार मंजिला इमारत ढहने से 11 लोगों की मौत हो गई थी। यह हादसा राजधानी में इमारतों की सुरक्षा और अनधिकृत निर्माण को लेकर सबसे गंभीर घटनाओं में शामिल रहा। हादसे के बाद इलाके में अवैध निर्माण को लेकर कार्रवाई की बात भी सामने आई थी।लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई क्षेत्र या इमारत नियमों के खिलाफ विकसित हो रही है तो प्रशासन को इसकी जानकारी पहले क्यों नहीं होती। निर्माण पूरा होने और लोगों के वहां रहने के बाद ही कार्रवाई क्यों शुरू होती है। किसी हादसे के बाद जांच और कार्रवाई की घोषणा करने के बजाय यदि समय रहते निरीक्षण और रोकथाम की व्यवस्था मजबूत हो तो कई जानें बचाई जा सकती हैं।

छह बड़े हादसे, 35 मौतें और कई सवाल

अप्रैल 2025 से सितंबर 2026 के बीच दिल्ली में सामने आए इन बड़े हादसों ने राजधानी की इमारत सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सत्य निकेतन, रोहिणी, सैदुलाजाब, वेलकम, पहाड़गंज और मुस्तफाबाद जैसी घटनाओं में कई परिवारों ने अपने लोगों को खोया। इन घटनाओं को अलग-अलग हादसों के रूप में देखने के बजाय इनके पीछे मौजूद समान कारणों पर ध्यान देना जरूरी है।जर्जर इमारतें, अनधिकृत निर्माण, निर्माण के दौरान सुरक्षा में लापरवाही और समय पर निरीक्षण का अभाव ऐसे मुद्दे हैं जिन पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। यदि किसी इलाके में वर्षों से कमजोर इमारतें खड़ी हैं और उनमें लोग रह रहे हैं तो संबंधित विभागों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। राजधानी में रहने वाले लोगों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि लोगों के जीवन से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण विषय है।

कब जागेगा प्रशासन

दिल्ली में हर बड़े हादसे के बाद जांच, जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई की बातें सामने आती हैं। लेकिन कुछ समय बीतने के बाद वही समस्या दोबारा सामने आ जाती है। ऐसे में जरूरत केवल हादसे के बाद मलबा हटाने की नहीं, बल्कि हादसा होने से पहले खतरे को पहचानने की है।राजधानी में पुरानी और जर्जर इमारतों की व्यापक जांच कराकर उनकी स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। जिन इमारतों में लोगों की जान को खतरा है, वहां समय रहते रहने वालों को सुरक्षित स्थान दिया जाना चाहिए। साथ ही अनधिकृत निर्माण को बढ़ावा देने वाले अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल

दिल्ली में रहने वाले लोगों का सवाल सीधा है—क्या किसी इमारत के गिरने और लोगों की जान जाने का इंतजार किया जाएगा या उससे पहले सुरक्षा के उपाय किए जाएंगे। राजधानी में लगातार हो रही ऐसी घटनाएं केवल इमारतों की कमजोरी की कहानी नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर भी सवाल उठाती हैं।हर हादसे के बाद मुआवजा देना और जांच का आदेश देना जरूरी हो सकता है, लेकिन उससे किसी परिवार का खोया हुआ सदस्य वापस नहीं आता। असली जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें जर्जर और खतरनाक इमारतों की पहचान हादसे से पहले हो। अब देखना यह है कि लगातार हो रही इन घटनाओं के बाद दिल्ली प्रशासन कब ठोस और स्थायी कदम उठाता है।

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