धौरहरा के पूर्व विधायक पंडित बाला प्रसाद अवस्थी का निधन:भाजपा और बसपा से दो-दो बार विधायक रहे, जिला पंचायत सदस्य से शुरू किया था सियासी सफर
लखीमपुर खीरी की धौरहरा विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में शुक्रवार शाम एक लंबे दौर का अंत हो गया। वरिष्ठ नेता और चार बार विधायक रहे पंडित बाला प्रसाद अवस्थी का 16 अक्टूबर को शाम करीब साढ़े चार बजे निधन हो गया। उनके निधन की खबर से धौरहरा समेत आसपास के इलाकों में शोक छा गया। समर्थकों और परिचितों ने उन्हें नम आंखों से याद किया। राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखने वाले अवस्थी की पहचान केवल एक जनप्रतिनिधि के रूप में नहीं थी। लोग उन्हें ‘दद्दू’ कहकर बुलाते थे। सहज व्यवहार, आत्मीयता और लोगों की बात सुनने के उनके अंदाज ने उन्हें क्षेत्र में अलग पहचान दिलाई। जिला पंचायत सदस्य से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर विधानसभा तक पहुंचा और दशकों तक जिले की राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका रही। 20 जून 1950 को रायपुर गांव में जन्मे बाला प्रसाद अवस्थी ने स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने जिला पंचायत सदस्य के रूप में राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। वर्ष 1991 में भाजपा के टिकट पर पहली बार विधायक चुने गए। वर्ष 1993 में उन्हें भाजपा का जिलाध्यक्ष बनाया गया। राम मंदिर आंदोलन के दौर में भी वह सक्रिय रहे। वर्ष 2005 में भाजपा छोड़कर बसपा में शामिल हो गए। वर्ष 2007 में धौरहरा सीट से विधायक चुने गए। वर्ष 2012 में बसपा ने उन्हें मोहम्मदी विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया और उन्होंने वहां भी जीत दर्ज की। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में लौटे और धौरहरा सीट से जीत हासिल कर चौथी बार विधायक बने। इस तरह उन्होंने भाजपा और बसपा, दोनों दलों से दो-दो बार विधानसभा चुनाव जीता। नाराज होकर आने वालों को भी हंसाकर भेजते थे ‘दद्दू’ बाला प्रसाद अवस्थी का लोगों से मिलने का अंदाज उनकी पहचान बन गया था। क्षेत्र के लोगों के मुताबिक, कोई व्यक्ति नाराज होकर भी उनके पास पहुंचता तो वह उसे मुस्कराकर अपने पास बैठा लेते थे। बातचीत के दौरान ऐसा माहौल बना देते कि सामने वाला अपनी नाराजगी भूल जाता था। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद लोगों से उनके व्यक्तिगत रिश्ते बने रहते थे। उनका एक कथन समर्थकों के बीच अक्सर याद किया जाता है, “आपने मुझे अपना नेता बनाया है, मैं आपका नौकर हूं। आप जो कहेंगे, उसे मैं सहन करूंगा।” इस बात में जनता के प्रति उनकी जवाबदेही और लोगों से जुड़े रहने की सोच झलकती थी। यही वजह रही कि समर्थक उन्हें केवल नेता नहीं, बल्कि अपने परिवार का सदस्य मानते थे।
पारिवारिक रिश्तों और आपसी प्रेम को देते थे अहमियत परिचितों के मुताबिक, बाला प्रसाद अवस्थी पारिवारिक रिश्तों में प्रेम और आपसी सौहार्द बनाए रखने को महत्व देते थे। इसी सोच के चलते उन्होंने रायपुर गांव से कुछ दूरी पर बेलतुआ स्थित अपने फार्म हाउस को निवास बनाया था। वह रिश्तों में मनमुटाव से बचने और परिवार में आपसी प्रेम बनाए रखने के पक्षधर थे। उनके निजी जीवन का यह पहलू भी लोगों के बीच चर्चा में रहा। सार्वजनिक जीवन में व्यस्त रहने के बावजूद वह लोगों से आत्मीयता बनाए रखने के लिए जाने जाते थे। उनके निधन से परिवार के साथ लंबे समय से जुड़े परिचितों और समर्थकों ने भी गहरा दुख जताया। अंतिम यात्रा में उमड़े लोग, तीन पुत्रों को छोड़ गए पीछे बाला प्रसाद अवस्थी की अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। उनके निवास से अंत्येष्टि स्थल तक लोग पैदल और वाहनों से साथ चलते रहे। समर्थकों और परिचितों ने नम आंखों से अपने ‘दद्दू’ को अंतिम विदाई दी। दूर-दराज से पहुंचे पुराने सहपाठियों ने भी उनसे जुड़ी यादें साझा कीं। वह अपने पीछे तीन पुत्रों को छोड़ गए हैं। इनमें भाजपा नेता एवं पूर्व ब्लॉक प्रमुख राजीव अवस्थी (लालू), संजीव अवस्थी और विनीत अवस्थी शामिल हैं। उनके निधन से परिवार, समर्थकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं में शोक है। जिला पंचायत सदस्य से विधायक और भाजपा जिलाध्यक्ष तक का सफर तय करने वाले अवस्थी की राजनीतिक विरासत के साथ उनका सहज व्यवहार और लोगों से जुड़ाव भी लंबे समय तक याद किया जाएगा।
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