दिव्यांग राजमाला बच्चों को दे रहीं मुफ्त शिक्षा:5 साल की उम्र में तेज बुखार का शिकार हुईं, 100 बच्चों को मुसीबतों से लड़ना सिखा रहीं
महज पांच साल की उम्र में बुखार के बाद एक मासूम बच्ची की जिंदगी बदल दी। जिस उम्र में बच्चे खेलकूद और पढ़ाई में व्यस्त रहते हैं, उस उम्र में राजमाला को शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बुखार के बाद वह दिव्यांग हो गईं। लेकिन जिंदगी की इन मुश्किलों के सामने उन्होंने हार नहीं मानी। 40 साल की राजमाला दूसरे मूक-बधिर और दृष्टि बाधित बच्चों के जीवन में उम्मीद की किरण बन रही हैं। ऐसी स्थिति में जब पुरुष हिम्मत हार जाते हैं लेकिन महिला होने के बाद भी राजमाला ने हिम्मत नहीं हारी। हाथरस के गांव तुरसैन की रहने वाली राजमाला खुद को 100 प्रतिशत दिव्यांग बताती हैं। बचपन से लेकर अब तक उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा है। लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक स्थिति को समाजसेवा के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया। आज वह रावत शिक्षा समिति जलेसर रोड से जुड़कर दिव्यांग बच्चों की शिक्षा में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। दिव्यांग होने के बाद भी नहीं टूटे हौसले वह महज 5 साल की थीं, तब उन्हें बुखार आया था। इसके बाद गंभीर रूप से बीमार हो गई और वह दिव्यांग हो गईं। इतनी छोटी उम्र में शारीरिक परेशानी के साथ जीवन बिताना उनके लिए आसान नहीं रहा। उन्हें जिंदगी में अनेक चुनौतियों और संघर्षों का सामना करना पड़ा। इन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया। अपने जीवन में कठिनाइयां झेलने के कारण वह दूसरे दिव्यांगों की परेशानियों को भी समझती हैं। यही अनुभव उन्हें जरूरतमंदों के लिए काम करने की प्रेरणा देता है। दिव्यांग बच्चों को दे रही नि:शुल्क शिक्षा राजमाला हाथरस के जलेसर रोड स्थित रावत शिक्षा समिति के माध्यम से दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और देखभाल के कार्य से जुड़ी हैं। वह करीब 100 बच्चों को पढ़ाती हैं। उनका प्रयास रहता है कि आर्थिक तंगी या शारीरिक परेशानी के कारण कोई दिव्यांग बच्चा शिक्षा से वंचित न रह जाए। उनका कहना है कि वह चाहती हैं कि दिव्यांग बच्चे पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बनें और सम्मानजनक जीवन जी सकें। वह दिव्यांगजन विकास संगठन की जिलाध्यक्ष भी हैं।
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