पहले नाम काटो... फिर जोड़ो! चुनाव आयोग का 13 करोड़ वोटर्स के साथ कैसा तमाशा

विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं। अब चुनाव आयोग ने प्रक्रिया पूरी कर चुके 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में छूटे पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू करने का निर्देश दिया है। इस दौरान पुराने और नए आंकड़ों का मिलान किया जाएगा तथा पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के नाम भी जोड़े जाएंगे। इस पूरी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं, जबकि चुनाव आयोग मतदाता सूचियों को अद्यतन करने की प्रक्रिया बता रहा है।

Oct 02, 2026 - 13:14
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पहले नाम काटो... फिर जोड़ो! चुनाव आयोग का 13 करोड़ वोटर्स के साथ कैसा तमाशा

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 2 अक्टूबर 2026

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की प्रारूप मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने के बाद अब उन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया गया है, जहां यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इस अभियान में छूट गए मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने के साथ पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के नाम भी शामिल किए जाएंगे। चुनाव आयोग ने राज्यों को पहले और बाद की मतदाता सूचियों का मिलान कर छूटे हुए मतदाताओं की पहचान करने को कहा है। 

13 करोड़ से ज्यादा नाम हटने के बाद अब नाम जोड़ने का अभियान
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की प्रारूप सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने की बात सामने आई है। अब चुनाव आयोग ने उन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया है, जहां पुनरीक्षण पूरा हो चुका है। इसका उद्देश्य ऐसे पात्र मतदाताओं को फिर से सूची में शामिल करना है, जिनके नाम किसी कारण से छूट गए हैं। आयोग ने यह निर्देश 29 सितंबर को राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भेजा था और बाद में इसे दोहराया गया।

मतदाता सूची तैयार करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनावों की निगरानी और मतदाता सूचियों से संबंधित संवैधानिक जिम्मेदारी मिली है। मतदाता सूची को अद्यतन रखना, मृत व्यक्तियों के नाम हटाना और एक से अधिक स्थानों पर दर्ज नामों की पहचान करना इस व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन विवाद इस बात को लेकर है कि नाम हटाने की प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम भी तो नहीं छूट गए। इसी वजह से पुनरीक्षण के बाद छूटे हुए नामों की पहचान और दोबारा पंजीकरण पर जोर दिया जा रहा है।

एसआईआर में किन कारणों से नाम हटाए गए
विशेष गहन पुनरीक्षण में मतदाताओं के नामों की जांच की गई और जिन मतदाताओं की स्थिति स्पष्ट नहीं थी, उनके नामों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टि जैसी संभावित श्रेणियों से जोड़ा गया। चुनाव आयोग के पुराने निर्देशों में बूथ स्तर के अधिकारियों को ऐसे मामलों में संभावित कारण दर्ज करने और संबंधित सूचियों को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था। इसका उद्देश्य मतदाता सूची में गलत या अपूर्ण प्रविष्टियों की पहचान करना था। हालांकि, प्रक्रिया के दौरान वास्तविक मतदाताओं के नाम छूटने को लेकर राजनीतिक और कानूनी सवाल भी उठे हैं।

अब प्रपत्र छह के जरिए नाम दोबारा जुड़ सकेंगे
चुनाव आयोग ने उन राज्यों में विशेष अभियान शुरू करने को कहा है जहां एसआईआर पूरा हो चुका है। ऐसे मतदाता जिनके नाम सूची में छूट गए हैं, वे निर्धारित प्रपत्र छह के जरिए दोबारा पंजीकरण करा सकेंगे। आयोग ने अधिकारियों को पहले और बाद की मतदाता सूचियों का मिलान करके उन लोगों की पहचान करने को भी कहा है, जिनके नाम प्रक्रिया के दौरान छूट गए। बूथ स्तर के अधिकारी ऐसे मतदाताओं की सहायता करेंगे।

पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के नाम भी जुड़ेंगे
विशेष अभियान केवल पहले से सूची में शामिल रहे मतदाताओं के लिए नहीं है। पहली बार मतदान करने के योग्य युवाओं को भी मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया पर जोर दिया गया है। इससे उन युवाओं को सूची में शामिल करने का रास्ता मिलेगा जो निर्धारित आयु पूरी करने के बाद पहली बार मतदान का अधिकार हासिल कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने राज्यों को इस अभियान के माध्यम से पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करने की प्रक्रिया तेज करने को कहा है।

सर्वोच्च न्यायालय ने बंगाल मामले में अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया
पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से जुड़े मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पात्रता और दस्तावेजों की जांच को लेकर कई निर्देश दिए थे। न्यायालय के आदेश में कहा गया कि बाद में प्रकाशित पूरक सूचियों में शामिल मतदाताओं को भी निर्धारित परिस्थितियों में प्रारंभिक सूची का हिस्सा माना जाएगा। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए यह व्यवस्था दी थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि मतदाता सूची में छूटे लोगों को उचित प्रक्रिया के जरिए शामिल करने का न्यायिक रास्ता भी मौजूद है।

सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर की वैधता पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी
एसआईआर से जुड़े एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग के पुनरीक्षण अधिकार और मतदाता सूची की शुद्धता से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर विस्तार से विचार किया। न्यायालय ने कहा कि लंबे समय से व्यापक पुनरीक्षण नहीं होने की स्थिति में मतदाता सूची में गलतियां जमा हो सकती हैं और व्यापक पुनरीक्षण का उद्देश्य उन्हें दूर करना हो सकता है। साथ ही न्यायालय ने प्रक्रिया में शामिल सुरक्षा उपायों और मतदाताओं को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के अवसरों पर भी विचार किया। इसलिए एसआईआर को लेकर कानूनी स्थिति को केवल नाम हटाने की प्रक्रिया के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल 13 करोड़ नाम हटने की प्रक्रिया पर है
विवाद का प्रमुख केंद्र यह है कि बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद कितने वास्तविक मतदाता सूची से बाहर रह गए। चुनाव आयोग की ओर से नाम हटाने के अलग-अलग कारण बताए गए हैं, जिनमें मृत्यु, स्थानांतरण और दोहरी प्रविष्टि जैसे कारण शामिल हैं। दूसरी ओर विपक्षी दल और नागरिक समूह यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रक्रिया के दौरान सभी पात्र मतदाताओं को पर्याप्त अवसर मिला। इन दावों के बीच अंतिम स्थिति संबंधित राज्य की पुनरीक्षित और अंतिम मतदाता सूची से ही स्पष्ट होगी।

नाम हटाने के बाद नागरिकों पर दोबारा पंजीकरण का बोझ
मतदाता सूची से नाम छूटने की स्थिति में पात्र व्यक्ति को दोबारा आवेदन करना पड़ सकता है। यही वजह है कि चुनाव आयोग ने बूथ स्तर के अधिकारियों को घर-घर जाकर पात्र मतदाताओं की सहायता करने और पहले तथा बाद की सूचियों का मिलान करने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि पुनरीक्षण के दौरान किन मतदाताओं के नाम छूट गए। विशेष अभियान के जरिए ऐसे मतदाताओं को दोबारा सूची में शामिल करने की प्रक्रिया आसान बनाने की कोशिश की जा रही है।

विपक्ष ने उठाए प्रक्रिया पर सवाल
विपक्षी दलों ने एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग की है। उनका सवाल है कि यदि इतने बड़े स्तर पर नाम हटाए गए और अब छूटे हुए नामों को दोबारा जोड़ने का अभियान चलाना पड़ रहा है, तो प्रक्रिया में हुई संभावित गलतियों की जिम्मेदारी किसकी होगी। दूसरी ओर चुनाव आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची को अद्यतन और सही रखना जरूरी है। इसलिए पूरे विवाद में हटाए गए नामों के कारण और बाद में जोड़े गए नामों के आंकड़े महत्वपूर्ण होंगे।

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