'हरिजन कब्रिस्तान' शब्द पर जनशासन संस्था ने जताई आपत्ति:नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया , पीयूष बोले- राजस्व विभाग नहीं दे रहा है सही आंकड़े

Sep 30, 2026 - 21:21
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'हरिजन कब्रिस्तान' शब्द पर जनशासन संस्था ने जताई आपत्ति:नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया , पीयूष बोले- राजस्व विभाग नहीं दे रहा है सही आंकड़े
लखनऊ में बुधवार को जनशासन संस्था ने प्रेसवार्ता किया। उत्तर प्रदेश के राजस्व अभिलेखों में अनुसूचित जाति के अंतिम संस्कार के लिए आरक्षित भूमि के नाम के साथ दर्ज ‘हरिजन कब्रिस्तान’ शब्द को लेकर सवाल उठाए हैं। प्रेसवार्ता में संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष पीयूष कुमार ने दावा किया कि आजमगढ़ समेत विभिन्न जनपदों के तहसीलों के दर्जनों गांवों की सरकारी खतौनियों में अब भी ‘हरिजन कब्रिस्तान’ शब्द दर्ज है जो उचित नहीं है। जनशासन फाउंडेशन के अध्यक्ष पीयूष मुताबिक, संस्था ने ‘अंतिम सम्मान अभियान’ के तहत राजस्व रिकॉर्ड और जमीन की स्थिति का अध्ययन किया। संस्था का कहना है कि श्रेणी 6-3 (कब्रिस्तान और श्मशान भूमि) में दर्ज अनुसूचित समाज के अंतिम संस्कार के लिए आरक्षित जमीन के नाम में जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है। संस्था ने इसे संवैधानिक गरिमा और सम्मान से जुड़ा मामला बताया। विभाग पर आंकड़े न देने का आरोप पीयूष कुमार ने कहा कि प्रदेश में ऐसी आरक्षित भूमि की वास्तविक स्थिति और रिकॉर्ड में दर्ज नामों की जानकारी के लिए जनशासन फाउंडेशन ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगी थी। संस्था का आरोप है कि राजस्व विभाग ने इस संबंध में अपेक्षित जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। संस्था ने अपने आकलन के आधार पर प्रदेश में करीब 50 हजार बीघा आरक्षित भूमि के नाम और अभिलेखों को लेकर सवाल उठाए हैं। ‘हरिजन’ शब्द पर जताई नाराजगी संस्था ने ‘हरिजन कब्रिस्तान' शब्द को जातिसूचक और अपमानजनक बताते हुए राजस्व रिकॉर्ड से हटाने की मांग की। पीयूष कुमार ने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी 1938 में इस शब्द के इस्तेमाल का विरोध किया था। उन्होंने कहा कि सरकारी दस्तावेजों में किसी समुदाय की पहचान के लिए ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल उसकी गरिमा और सम्मान से जुड़ा विषय है। ‘कब्रिस्तान’ शब्द पर आपत्ति जनशासन फाउंडेशन ने यह भी कहा कि अनुसूचित समाज के अंतिम संस्कार की परंपराओं को ध्यान में रखते हुए राजस्व रिकॉर्ड में ‘कब्रिस्तान’ शब्द के इस्तेमाल की भी समीक्षा होनी चाहिए। संस्था ने सरकार से पूरे प्रदेश के राजस्व अभिलेखों की जांच कर आपत्तिजनक शब्दावली को संशोधित करने और आरक्षित भूमि की स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है।

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